SIR विवाद: राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ आरोप से गरमाई सियासत, 14 आपत्तियों की रिपोर्ट पर ECI का जवाब

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Digital UP News Desk

नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को चुनाव आयोग पर तीखा हमला करते हुए ‘वोट चोरी’ के अपने आरोप को दोहराया। उन्होंने इसे भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला बताया। साथ ही राहुल गांधी ने BJP, RSS और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इस मामले में न्याय होगा।

राहुल गांधी की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले करीब 10 महीनों के दौरान चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने, वोटर डेटा के प्रबंधन और SIR से जुड़े विभिन्न फैसलों से था।

14 आपत्तियों की रिपोर्ट से बढ़ा विवाद

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के नाम से लिए गए कुछ फैसलों को लेकर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में Form 6 में बदलाव, मतदाता डेटा और उसके नियंत्रण से जुड़े मुद्दों, पश्चिम बंगाल में मतदाता नाम हटाने से जुड़ी अपीलों तथा गोवा में पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने जैसे मामलों का उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ आपत्तियां इस बात को लेकर भी थीं कि कुछ निर्णय दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए थे। हालांकि, इन दावों पर चुनाव आयोग की ओर से अलग तस्वीर पेश की गई है।

चुनाव आयोग ने असहमति के दावे को खारिज किया

रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं। आयोग का कहना है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से हुए और किसी भी स्तर पर ऐसा कोई संस्थागत मतभेद नहीं था, जैसा रिपोर्ट में बताया गया है।

चुनाव आयोग के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी से ही आयोग के फैसले लिए जाते हैं। इस तरह एक ओर रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों का दावा सामने आया है, वहीं दूसरी ओर ECI ने इन आपत्तियों को आयोग के भीतर औपचारिक असहमति या फैसलों में विभाजन के रूप में देखने से इनकार किया है।

Form 6 में बदलाव भी विवाद का हिस्सा

विवाद का एक अहम हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में बदलाव से जुड़ा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, SIR से संबंधित एक नया घोषणा-पत्र Form 6 में शामिल किया गया था। इसमें नए आवेदकों से उनके या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव को लेकर आपत्ति जताई थी। उनका तर्क बताया गया कि ऐसे बदलाव से पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के लिए प्रक्रिया कठिन हो सकती है। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से पूरे मामले को लेकर यह कहा गया कि उसके सभी निर्णय संस्थागत प्रक्रिया के तहत और सर्वसम्मति से लिए गए।

राहुल गांधी ने लगाए गंभीर आरोप

इसी विवाद के बीच राहुल गांधी ने ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को फिर से उठाया। उन्होंने कहा कि मताधिकार से जुड़ा कोई भी कथित हस्तक्षेप लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान से सीधे जुड़ा विषय है। राहुल गांधी ने BJP, RSS और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए इसे ‘देशद्रोह’ बताया।

हालांकि, राहुल गांधी के ये आरोप राजनीतिक बयान और आरोप हैं। चुनाव आयोग ने SIR से संबंधित अपने फैसलों में किसी प्रकार की संस्थागत असहमति के दावे को खारिज किया है। इसलिए पूरे विवाद में आरोपों और आधिकारिक जवाबों को अलग-अलग देखना महत्वपूर्ण है।

विपक्ष ने भी उठाए सवाल

रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश समेत विपक्ष के अन्य नेताओं ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए आयोग की पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया पर चिंता जताई।

विपक्ष की ओर से यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि दो चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं, तो उन आपत्तियों की प्रकृति क्या थी और बाद में उन पर क्या कार्रवाई हुई। दूसरी तरफ, चुनाव आयोग का कहना है कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे।

SIR को लेकर पहले से चल रही बहस

SIR को लेकर विवाद केवल चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद तक सीमित नहीं है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर भी अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक और कानूनी बहस चलती रही है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नामों जैसी प्रविष्टियों की पहचान करना है। वहीं विपक्षी दलों और कुछ नागरिक समूहों की ओर से यह चिंता जताई जाती रही है कि प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित नहीं होने चाहिए।

दिल्ली में SIR से संबंधित नोटिसों की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाए हैं और मतदाताओं को जवाब देने की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक बनाने के सुझाव दिए हैं।

आगे क्या होगा?

फिलहाल SIR को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष दोनों सामने हैं। एक ओर विपक्ष 14 कथित आपत्तियों की रिपोर्ट को चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जोड़कर सवाल उठा रहा है। दूसरी ओर ECI का कहना है कि SIR सहित उसके सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और इनमें कोई संस्थागत असहमति नहीं थी।

ऐसे में आगे की बहस मुख्य रूप से तीन मुद्दों पर केंद्रित रह सकती है—पहला, कथित आपत्तियों की वास्तविक प्रकृति और उनका रिकॉर्ड; दूसरा, SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया; और तीसरा, चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता। फिलहाल राहुल गांधी के बयान ने इस पूरे विवाद को राजनीतिक रूप से और अधिक चर्चा में ला दिया है, जबकि चुनाव आयोग अपने फैसलों को सर्वसम्मत बता रहा है।

इस पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले राजनीतिक दलों के आरोपों, चुनाव आयोग के आधिकारिक जवाब और उपलब्ध दस्तावेजी रिकॉर्ड—तीनों को अलग-अलग देखना जरूरी होगा।