यूपी में ओवैसी की सक्रियता बढ़ी, सपा-कांग्रेस से गठबंधन की चाहत पर ‘वोट कटवा’ की बहस तेज

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Digital UP News Desk

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की राजनीतिक सक्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है। जून 2026 से अब तक ओवैसी यूपी में पांच सभाएं कर चुके हैं। बहराइच, बिजनौर, सहारनपुर और मुरादाबाद के बाद 20 सितंबर को उन्होंने कानपुर में रैली की। इन सभाओं में उन्होंने अपनी पार्टी के विस्तार और राजनीतिक भागीदारी से जुड़े मुद्दे उठाए हैं।

हालांकि, ओवैसी की सक्रियता के साथ ही उत्तर प्रदेश की सियासत में गठबंधन और मुस्लिम मतदाताओं के बीच संभावित वोट बंटवारे को लेकर चर्चा भी तेज हो गई है। एक तरफ AIMIM की ओर से विपक्षी दलों के साथ व्यापक राजनीतिक तालमेल की इच्छा के संकेत दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से जुड़े नेताओं की ओर से AIMIM की चुनावी भूमिका को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

यूपी में लगातार सभाएं कर रहे ओवैसी

AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी पिछले कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश में लगातार राजनीतिक कार्यक्रम कर रहे हैं। उनकी सभाओं का उद्देश्य पार्टी के संगठन को मजबूत करना और राज्य की चुनावी राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना बताया जा रहा है।

बहराइच, बिजनौर, सहारनपुर और मुरादाबाद के बाद कानपुर में हुई रैली ने यह संकेत दिया कि AIMIM यूपी में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कानपुर जैसे बड़े शहरी क्षेत्र में सभा के जरिए पार्टी ने अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का प्रयास किया।

ओवैसी के भाषणों पर समर्थकों की ओर से उत्साह देखने को मिला। वहीं, कुछ स्थानों पर उनके राजनीतिक रुख का विरोध भी सामने आया। यही वजह है कि AIMIM की गतिविधियां अब केवल पार्टी के कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि प्रदेश की विपक्षी राजनीति में भी चर्चा का विषय बन रही हैं।

गठबंधन की राजनीति पर क्या है सवाल?

यूपी की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि AIMIM आगामी विधानसभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरती है या किसी गठबंधन का हिस्सा बनती है। ओवैसी की ओर से विपक्षी दलों के साथ राजनीतिक तालमेल की इच्छा की बात सामने आती रही है। दूसरी ओर, सपा और कांग्रेस के नेताओं की ओर से AIMIM को लेकर अलग-अलग समय पर ‘वोट कटवा’ जैसे आरोप लगाए गए हैं।

यह आरोप मुख्य रूप से इस आशंका से जुड़ा है कि यदि AIMIM मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारती है, तो विपक्षी उम्मीदवारों के समर्थन में पड़ने वाले वोटों का एक हिस्सा उसके पक्ष में जा सकता है। हालांकि, किसी चुनाव में इसका वास्तविक प्रभाव क्षेत्र, उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं के रुझान पर निर्भर करता है।

इसलिए AIMIM को लेकर ‘वोट कटवा’ की बहस को एक राजनीतिक आरोप और रणनीतिक तर्क के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि हर सीट पर तय परिणाम के रूप में।

मुस्लिम वोटों को लेकर क्यों बढ़ी चर्चा?

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता कई विधानसभा सीटों पर महत्वपूर्ण चुनावी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में अलग-अलग दल इस वर्ग के बीच अपना समर्थन मजबूत करने की कोशिश करते हैं। सपा लंबे समय से खुद को भाजपा के प्रमुख विपक्षी विकल्प के तौर पर पेश करती रही है, जबकि कांग्रेस भी विपक्षी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

ऐसे माहौल में AIMIM की सक्रियता विपक्षी खेमे के लिए एक अतिरिक्त राजनीतिक चुनौती के रूप में देखी जा रही है। AIMIM यदि बड़ी संख्या में सीटों पर उम्मीदवार उतारती है, तो उसका असर स्थानीय चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि पार्टी किसी गठबंधन का हिस्सा बनती है, तो सीट बंटवारे और राजनीतिक हिस्सेदारी जैसे सवाल महत्वपूर्ण होंगे।

ओवैसी के सामने क्या हैं विकल्प?

आगामी चुनाव को देखते हुए AIMIM के सामने मोटे तौर पर दो राजनीतिक रास्ते दिखाई देते हैं। पहला, पार्टी अपने संगठन का विस्तार करते हुए बड़ी संख्या में सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़े। दूसरा, विपक्षी दलों के साथ सीटों और साझा राजनीतिक कार्यक्रम को लेकर बातचीत की संभावनाएं तलाशे।

हालांकि, किसी गठबंधन का फैसला केवल बयानबाजी से नहीं होता। इसके लिए सीटों की स्थिति, संगठनात्मक ताकत, स्थानीय नेतृत्व और सहयोगी दलों की स्वीकार्यता जैसे कई पहलुओं पर बातचीत जरूरी होती है।

इसके अलावा, सपा और कांग्रेस की ओर से AIMIM को लेकर अपनाया जाने वाला रुख भी महत्वपूर्ण रहेगा। यदि दोनों दल AIMIM के साथ किसी तरह के तालमेल से दूरी बनाए रखते हैं, तो पार्टी को अपने दम पर राजनीतिक विस्तार करना पड़ सकता है।

कानपुर की रैली के बाद बढ़ी सियासी चर्चा

20 सितंबर को कानपुर में हुई ओवैसी की रैली के बाद यूपी की राजनीति में AIMIM की भूमिका को लेकर चर्चा और तेज हुई है। कानपुर क्षेत्र की राजनीतिक अहमियत को देखते हुए पार्टी की गतिविधि पर राजनीतिक दलों की नजर रहना स्वाभाविक है।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि AIMIM आगामी विधानसभा चुनाव में कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी या किसी दल के साथ औपचारिक गठबंधन करेगी। इसलिए अभी किसी अंतिम राजनीतिक रणनीति का दावा करना जल्दबाजी होगी।

फिर भी, जून से लगातार हो रही सभाएं यह जरूर दिखाती हैं कि AIMIM उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक मौजूदगी को सक्रिय रूप से बढ़ाने की कोशिश कर रही है। आने वाले महीनों में पार्टी के संगठन विस्तार, उम्मीदवार चयन और गठबंधन संबंधी बयानों से उसकी रणनीति की दिशा और स्पष्ट हो सकती है।