सोनिया गांधी वोटर लिस्ट मामले में दिल्ली कोर्ट का बड़ा आदेश, मजिस्ट्रेट का फैसला रद्द कर जांच पर फिर सुनवाई के निर्देश
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से जुड़े मतदाता सूची मामले में दिल्ली की अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। मामला आरोप से जुड़ा है कि सोनिया गांधी का नाम वर्ष 1980 की मतदाता सूची में उस समय शामिल किया गया, जब वह भारतीय नागरिक नहीं बनी थीं। शिकायतकर्ता की ओर से इसी आधार पर कथित अनियमितता और जाली दस्तावेजों की जांच की मांग की गई थी। अब सेशन कोर्ट ने मामले को दोबारा मजिस्ट्रेट के पास भेजते हुए कानून के अनुसार नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।
सेशन कोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश क्यों रद्द किया?
रिपोर्टों के अनुसार, राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज ने 21 सितंबर 2026 को मामले में अपना आदेश सुनाया। अदालत ने सितंबर 2025 में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) की ओर से पारित आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उस आदेश में मामले से जुड़े तथ्यों और आरोपों पर पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए गए थे। कोर्ट के मुताबिक, मजिस्ट्रेट का आदेश मामले के तथ्यों के संदर्भ में पर्याप्त रूप से कारणयुक्त नहीं था।
अदालत ने मामले को फिर से मजिस्ट्रेट कोर्ट के पास भेज दिया है। साथ ही निर्देश दिया गया है कि शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई की जाए और सभी संबंधित पहलुओं पर विचार करने के बाद कारणों सहित आदेश पारित किया जाए। इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि सोनिया गांधी के खिलाफ आरोप साबित हो गए हैं। फिलहाल अदालत ने केवल पहले दिए गए मजिस्ट्रेट आदेश को निरस्त कर मामले पर दोबारा विचार का रास्ता खोला है।
क्या है सोनिया गांधी की वोटर लिस्ट से जुड़ा मामला?
यह मामला वर्ष 1980 की मतदाता सूची में सोनिया गांधी के नाम के कथित रूप से शामिल होने से जुड़ा है। शिकायतकर्ता वकील विकास त्रिपाठी ने अदालत में आरोप लगाया कि सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में उस समय शामिल था, जब उन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल नहीं की थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सोनिया गांधी ने अप्रैल 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल की थी, जबकि शिकायत वर्ष 1980 की मतदाता सूची में उनके नाम के होने को लेकर है।
शिकायतकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि यदि किसी ऐसे व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में दर्ज किया गया, जो उस समय भारतीय नागरिक नहीं था, तो इस प्रक्रिया में इस्तेमाल दस्तावेजों और घोषणा की जांच आवश्यक है। इसी आधार पर FIR दर्ज कराने और कथित जालसाजी की जांच की मांग की गई थी।
हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि ये आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। अदालत का मौजूदा आदेश भी आरोपों की पुष्टि नहीं करता, बल्कि मामले को दोबारा सुनने के लिए मजिस्ट्रेट कोर्ट में भेजता है।
2025 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
इस मामले में सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली शिकायत पर अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने 11 सितंबर 2025 को आदेश पारित किया था। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने शिकायत पर आपराधिक कार्रवाई का आदेश देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सेशन कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दाखिल की।
दिसंबर 2025 में सेशन कोर्ट ने सोनिया गांधी और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। इसके बाद मामले में दोनों पक्षों की ओर से अदालत के सामने दलीलें रखी गईं।
सोनिया गांधी की ओर से क्या कहा गया?
मामले की सुनवाई के दौरान सोनिया गांधी की ओर से मजिस्ट्रेट के आदेश का बचाव किया गया। फरवरी 2026 में दाखिल जवाब में उनकी ओर से शिकायत को राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित और कानूनी आधार से रहित बताया गया था। उनकी ओर से यह भी कहा गया कि शिकायत में उनके खिलाफ कथित हेराफेरी या जालसाजी से जोड़ने वाला पर्याप्त दस्तावेजी आधार नहीं है।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि मतदाता सूची में नाम शामिल होने से जुड़े पुराने दस्तावेजों की जांच जरूरी है। सुनवाई के दौरान अदालत ने भी मामले से जुड़े पुराने रिकॉर्ड और मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने की परिस्थितियों को लेकर सवाल किए थे।
अब आगे क्या होगा?
सेशन कोर्ट के आदेश के बाद अब मामला फिर मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने जाएगा। वहां शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई होगी। अदालत को उपलब्ध दस्तावेजों, आरोपों और संबंधित पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए कारणों सहित नया आदेश पारित करना होगा।
इसलिए फिलहाल यह कहना उचित नहीं होगा कि सोनिया गांधी के खिलाफ कोई आपराधिक मामला साबित हो गया है या FIR दर्ज हो गई है। मौजूदा घटनाक्रम का मुख्य बिंदु यह है कि सेशन कोर्ट ने पहले मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत पर दिए गए आदेश को रद्द कर दिया है और मामले की दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया है।
गौरतलब है कि यह मामला करीब चार दशक पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जुड़ा है। इसी वजह से सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पुराने दस्तावेजों, रिकॉर्ड की उपलब्धता और कथित तौर पर मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने की परिस्थितियों का मुद्दा भी आया था। अब मजिस्ट्रेट कोर्ट की आगे की कार्यवाही इस मामले की अगली दिशा तय करेगी।

