प्रयागराज में आज भी मौजूद है नीम करौली बाबा की याद, चर्च लेन का यह घर बना आस्था का केंद्र

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Digital UP News Desk

प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज को सदियों से आस्था, अध्यात्म और धार्मिक परंपराओं की धरती माना जाता है। यहां मंदिरों और घाटों के अलावा कई ऐसे स्थान भी हैं, जिनसे जुड़ी आध्यात्मिक मान्यताएं लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। ऐसा ही एक स्थान शहर की चर्च लेन की शांत गली में स्थित 18/4 नंबर का एक साधारण-सा मकान है। बाहर से देखने पर यह घर आसपास के दूसरे मकानों जैसा ही नजर आता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से इसकी अपनी खास पहचान है। मान्यता है कि इस घर में प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत नीम करौली बाबा (नीब करौरी बाबा) कई बार ठहरे थे।

इस घर की खासियत यह है कि यहां न तो कोई बड़ा मंदिर बना है, न कोई धार्मिक बोर्ड लगा है और न ही किसी तरह का दिखावटी आयोजन होता है। इसके बावजूद शाम होते ही श्रद्धालु यहां पहुंचने लगते हैं। लोग शांतिपूर्वक घर में प्रवेश करते हैं, उस स्थान पर सिर झुकाते हैं जहां बाबा विश्राम और प्रार्थना किया करते थे और फिर प्रसाद ग्रहण करके लौट जाते हैं।

प्रोफेसर सुधीर मुखर्जी से था बाबा का गहरा संबंध

18/4, चर्च लेन स्थित यह मकान कभी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे सुधीर मुखर्जी का निवास था। बताया जाता है कि नीम करौली बाबा और प्रोफेसर मुखर्जी के बीच आध्यात्मिक संबंध कई दशकों पुराना था। बाबा साल में एक-दो बार प्रोफेसर मुखर्जी से मिलने के लिए इस घर में आया करते थे।

यही कारण है कि आज भी इस मकान को बाबा से जुड़ी स्मृतियों के महत्वपूर्ण स्थान के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, घर से जुड़ी चर्चाओं के बीच यह स्पष्ट किया गया है कि फिल्म ‘हनुमान अंश’ की शूटिंग इस मकान में नहीं हुई थी। फिल्म में बाबा के संदर्भ ने जरूर लोगों की उत्सुकता बढ़ाई और उनके जीवन तथा उनसे जुड़े स्थानों को लेकर फिर से चर्चा तेज हुई।

1935 में हुई थी पहली मुलाकात

नीम करौली बाबा और सुधीर मुखर्जी के संबंध की कहानी करीब एक सदी पुरानी बताई जाती है। जानकारी के अनुसार सुधीर मुखर्जी का जन्म ढाका के पास गोमोर गांव में हुआ था। उनकी पहली मुलाकात बाबा से वर्ष 1935 में कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर में हुई थी।

बताया जाता है कि इसी मुलाकात के दौरान बाबा ने सुधीर मुखर्जी को जाप करने के लिए एक मंत्र दिया था। इसके बाद दोनों के बीच आध्यात्मिक संबंध बना रहा। बाद में जब सुधीर मुखर्जी वर्ष 1950 में पढ़ाई के सिलसिले में इलाहाबाद पहुंचे और कर्नलगंज में अपने मामा के घर रहने लगे, तब उनकी बाबा से दोबारा मुलाकात हुई।

संयोग से उस समय बाबा भी उसी घर में ठहरे हुए थे। इस मुलाकात ने दोनों के पुराने संबंध को फिर से जोड़ दिया।

1956 में बनवाया गया था चर्च लेन का मकान

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के तौर पर कार्य शुरू करने के बाद सुधीर मुखर्जी ने वर्ष 1956 में चर्च लेन में इस मकान का निर्माण कराया। बाबा से उनकी आध्यात्मिक निकटता के कारण यह घर आगे चलकर उनके लिए विशेष महत्व रखने लगा।

आज भी इस मकान में वह कमरा सुरक्षित बताया जाता है, जहां बाबा विश्राम किया करते थे और प्रार्थना करते थे। इस कमरे में बाबा से जुड़ा तख्त और तकिया भी सुरक्षित रखा गया है। श्रद्धालुओं के लिए यही स्थान सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र है।

रोज होती है तख्त और तकिए की पूजा

घर की देखभाल करने वाले लोगों के अनुसार बाबा से जुड़े तख्त और तकिए की रोज पूजा की जाती है। वहां फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके अलावा हर मंगलवार को कमरे की चादर बदली जाती है। बाबा के प्रति श्रद्धा रखने वाले लोग इस स्थान को बेहद पवित्र मानते हैं।

हालांकि, यहां किसी तरह का चढ़ावा स्वीकार नहीं किया जाता। श्रद्धालुओं को केवल दर्शन करने की अनुमति होती है। इसके बाद उन्हें प्रसाद के तौर पर लड्डू दिए जाते हैं। घर की देखभाल सत्या पांडे और उनके पति इंद्रेश प्रसाद करते हैं।

शाम 5 से रात 8 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खुलता है घर

यह घर प्रतिदिन शाम 5 बजे से रात 8 बजे तक आगंतुकों के लिए खुला रहता है। इस दौरान श्रद्धालु यहां आकर बाबा से जुड़ी स्मृतियों वाले कमरे के दर्शन कर सकते हैं। यहां किसी बड़े धार्मिक आयोजन या भीड़ जुटाने की व्यवस्था नहीं है। बल्कि पूरे वातावरण में सादगी बनाए रखने की कोशिश की जाती है।

यही सादगी इस स्थान को बाकी धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है। श्रद्धालुओं का कहना है कि यहां पहुंचने पर उन्हें एक अलग तरह की शांति का अनुभव होता है। उनके लिए यह स्थान किसी भव्य मंदिर से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

बाबा को पसंद था लौकी, मूंग दाल और बेसन की रोटी का भोग

नीम करौली बाबा के पसंदीदा भोजन को लेकर भी इस घर से जुड़ी परंपरा कायम है। बताया जाता है कि बाबा को लौकी की सब्जी, मूंग दाल और बेसन की रोटी पसंद थी। इसलिए यही भोजन उन्हें भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।

इस परंपरा के जरिए बाबा से जुड़ी पुरानी स्मृतियों को आज भी जीवित रखने का प्रयास किया जा रहा है। श्रद्धालु इसे केवल भोजन का भोग नहीं, बल्कि संत के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम मानते हैं।

‘बाबा कभी प्रचार नहीं चाहते थे’

घर की देखभाल करने वाली सत्या पांडे बाबा को भगवान हनुमान का अवतार मानती हैं। उनके अनुसार बाबा ने कभी अपने प्रचार की इच्छा नहीं जताई। सत्या पांडे का कहना है कि बाबा लोगों को चमत्कारों की बातों में उलझाने के बजाय सहजता और भक्ति का संदेश देते थे।

उनके मुताबिक बाबा कहा करते थे कि वे चमत्कार नहीं करते, बल्कि चीजें अपने आप होती हैं। सत्या का यह भी कहना है कि बाबा ने प्रोफेसर सुधीर मुखर्जी को हनुमान के रूप में दर्शन दिए थे। हालांकि, बाबा से जुड़ी ऐसी बातें उनकी आस्था और व्यक्तिगत अनुभवों का हिस्सा हैं।

बिना प्रचार के बढ़ रही श्रद्धालुओं की संख्या

प्रयागराज में नीम करौली बाबा से जुड़ा यह मकान किसी बड़े धार्मिक पर्यटन स्थल की तरह प्रचारित नहीं किया जाता। इसके बावजूद यहां आने वाले लोगों की संख्या लगातार लोगों की रुचि का विषय बनी हुई है। खासकर बाबा के जीवन, शिक्षाओं और आध्यात्मिक परंपरा में रुचि रखने वाले लोग इस स्थान के बारे में जानना चाहते हैं।

दरअसल, नीम करौली बाबा का नाम देश और विदेश में आध्यात्मिक जगत से जुड़े लोगों के बीच काफी प्रसिद्ध रहा है। ऐसे में प्रयागराज स्थित यह घर उनके जीवन से जुड़े पुराने अध्याय की याद दिलाता है।

कुल मिलाकर, चर्च लेन का यह साधारण मकान प्रयागराज की उन अनकही आध्यात्मिक विरासतों में शामिल है, जिन्हें किसी भव्य संरचना की जरूरत नहीं है। यहां बाबा की स्मृतियां, उनसे जुड़ी परंपराएं और श्रद्धालुओं की आस्था ही इसकी पहचान हैं। आज भी शाम के समय जब लोग यहां पहुंचते हैं, तो उनके लिए यह केवल एक पुराना मकान नहीं रहता, बल्कि नीम करौली बाबा से जुड़े आध्यात्मिक इतिहास का एक जीवंत स्मृति-स्थल बन जाता है।

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