संजय निषाद की माता प्रसाद पांडे से मुलाकात के बाद सियासत गरम, क्या BJP से बढ़ रही दूरी?
Digital UP News Desk
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सियासी समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। निषाद पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद की समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडे से हुई मुलाकात ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है। खास बात यह है कि यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब गोंडा के विनोद कुमार सहनी हत्याकांड को लेकर संजय निषाद अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं।
हालांकि, संजय निषाद ने अभी तक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए से अलग होने की कोई घोषणा नहीं की है। इसके बावजूद उनके हालिया बयानों और गतिविधियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या निषाद पार्टी और भाजपा के बीच सब कुछ ठीक चल रहा है? क्या संजय निषाद 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कोई बड़ा राजनीतिक फैसला ले सकते हैं?
दरअसल, संजय निषाद ने अपने एक बयान में कहा है कि समाजवादी पार्टी ने जब उनके लिए दरवाजा बंद किया था, तब वह भाजपा के साथ गए थे। यदि भाजपा दरवाजा बंद करेगी तो वह भी भविष्य में विचार करेंगे। उनके इस बयान को यूपी की सियासत में महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
विनोद सहनी हत्याकांड के बाद सरकार के खिलाफ दिखाए तेवर
गोंडा में निषाद पार्टी से जुड़े व्यापारी और कार्यकर्ता विनोद कुमार सहनी पर कुछ दिन पहले हमला हुआ था। गंभीर हालत में उनका इलाज लखनऊ के केजीएमयू में चल रहा था, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। घटना के बाद निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जाहिर की।
उन्होंने लखनऊ में केजीएमयू के पोस्टमार्टम हाउस के बाहर धरना दिया। इसके बाद गोंडा में भी सैकड़ों लोगों के साथ कलेक्ट्रेट कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया गया। इस दौरान उन्होंने कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए।
संजय निषाद के साथ इस विरोध प्रदर्शन में विकासशील इंसान पार्टी के नेता मुकेश सहनी सहित अन्य राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी ने भी राजनीतिक चर्चाओं को बढ़ा दिया। क्योंकि मुकेश सहनी बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं और उनकी पार्टी विपक्षी गठबंधन के साथ है।
माता प्रसाद पांडे से मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल
इसी बीच संजय निषाद की समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडे से मुलाकात सामने आई। इसके बाद लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। सवाल उठने लगा कि क्या निषाद पार्टी अब एनडीए से दूरी बनाने की तैयारी कर रही है?
हालांकि, संजय निषाद ने इस मुलाकात को राजनीतिक गठजोड़ के संकेत के तौर पर देखने से इनकार किया है। उनका कहना है कि माता प्रसाद पांडे उनके पुराने परिचित हैं और छात्र जीवन से उनके संबंध रहे हैं। वह बीमार थे, इसलिए उनसे मिलना उनका कर्तव्य था।
संजय निषाद के मुताबिक, दो बड़े नेता जब एक जगह बैठते हैं तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर चर्चा भी हो सकती है। इसलिए केवल मुलाकात की तस्वीर के आधार पर इसके राजनीतिक मायने निकालना उचित नहीं है।
फिर भी, मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में इस मुलाकात को पूरी तरह सामान्य मानना भी आसान नहीं है। खासकर तब, जब 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक है और निषाद समुदाय उत्तर प्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सीटों के बंटवारे को लेकर क्या है नाराजगी?
संजय निषाद की भाजपा से नाराजगी को लेकर एक चर्चा यह भी है कि आगामी विधानसभा चुनाव में एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर उनकी पार्टी की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं। हालांकि, संजय निषाद ने इस बात से इनकार किया है कि उनकी नाराजगी का मुख्य कारण सीटों का बंटवारा है।
उन्होंने निषाद पार्टी को आंदोलन से निकली पार्टी बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी किसी से भीख मांगने वाली पार्टी नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी है।
इस बयान से साफ है कि निषाद पार्टी अपनी राजनीतिक पहचान और सामाजिक मुद्दों को लेकर दबाव बनाए रखना चाहती है। ऐसे में आने वाले महीनों में भाजपा और निषाद पार्टी के बीच बातचीत तथा सीटों के संभावित समीकरण पर सभी की नजर रहेगी।
आरक्षण बना हुआ है सबसे बड़ा मुद्दा
संजय निषाद की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा निषाद और मछुआरा समुदाय को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने की मांग रही है। वह लंबे समय से मछुआरा समाज के लिए आरक्षण और सामाजिक न्याय की मांग करते रहे हैं।
उनका कहना है कि इस मुद्दे पर केंद्र और प्रदेश सरकार के स्तर पर बातचीत हुई है। संजय निषाद लगातार यह मांग कर रहे हैं कि निषाद समाज को ओबीसी की मौजूदा व्यवस्था से अलग करके अनुसूचित जाति के दायरे में शामिल किया जाए और समुदाय को उसका अधिकार मिले।
उनके अनुसार, यह मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हल होना चाहिए। यही वजह है कि आरक्षण का सवाल उनके लिए केवल सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।
2022 और 2024 के चुनावों का भी दे रहे हवाला
संजय निषाद ने अपने बयानों में 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव का भी उल्लेख किया है। उनका दावा है कि मछुआरा समाज से जुड़े आरक्षण के सवाल पर अपेक्षित समाधान नहीं होने का चुनावी प्रभाव देखने को मिला।
अब उनकी कोशिश है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे पर कोई ठोस रास्ता निकले। यदि ऐसा होता है तो निषाद पार्टी इसे अपने सामाजिक आधार के बीच बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकती है।
वहीं, यदि मांग पूरी नहीं होती है तो इसका असर एनडीए के भीतर राजनीतिक रिश्तों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि संजय निषाद भाजपा से अलग होने का फैसला करेंगे।
मुकेश सहनी की सक्रियता भी बढ़ा रही चुनौती
संजय निषाद के सामने एक और राजनीतिक चुनौती बिहार के वीआईपी नेता मुकेश सहनी के रूप में दिखाई दे रही है। मुकेश सहनी भी मछुआरा समुदाय की राजनीति को प्रमुखता देते हैं और उनकी पार्टी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा है।
मुकेश सहनी पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में भी अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रहे हैं। वह मछुआरा समुदाय से जुड़े अधिकारों और आरक्षण के मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं। ऐसे में यदि वह उत्तर प्रदेश में अपना संगठन मजबूत करते हैं तो इसका सीधा असर निषाद पार्टी के सामाजिक आधार पर पड़ सकता है।
इसलिए संजय निषाद के लिए चुनौती केवल भाजपा के साथ रिश्ते बनाए रखने की नहीं है, बल्कि अपने परंपरागत वोट बैंक पर पकड़ मजबूत रखने की भी है।
क्या सपा के साथ जाने का रास्ता खुल सकता है?
फिलहाल संजय निषाद ने समाजवादी पार्टी में जाने की कोई घोषणा नहीं की है। उन्होंने माता प्रसाद पांडे से मुलाकात को भी व्यक्तिगत संबंधों से जोड़कर बताया है। इसके बावजूद उनका यह बयान कि “भाजपा दरवाजा बंद करेगी तो विचार करेंगे” भविष्य की संभावनाओं के लिए राजनीतिक गुंजाइश जरूर छोड़ता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन अक्सर चुनावी परिस्थितियों के आधार पर बदलते रहे हैं। ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले सीटों का बंटवारा, आरक्षण का मुद्दा, निषाद समाज की राजनीतिक भागीदारी और भाजपा के साथ संबंध—ये सभी कारक संजय निषाद के अगले कदम को प्रभावित कर सकते हैं।
फिलहाल निषाद पार्टी एनडीए का हिस्सा है और संजय निषाद सरकार में मंत्री हैं। इसलिए किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की घोषणा के बिना उनके सपा के साथ जाने की अटकलों को केवल राजनीतिक संभावना के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
2027 से पहले क्या होगा अगला कदम?
संजय निषाद के सामने फिलहाल दो बड़ी प्राथमिकताएं दिखाई देती हैं। पहली, निषाद और मछुआरा समुदाय से जुड़े आरक्षण के मुद्दे पर सरकार से ठोस परिणाम हासिल करना और दूसरी, आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की राजनीतिक हिस्सेदारी सुनिश्चित करना।
इसके अलावा, मुकेश सहनी की उत्तर प्रदेश में बढ़ती सक्रियता भी उनके लिए चुनौती है। ऐसे में आने वाले समय में संजय निषाद का राजनीतिक रुख और महत्वपूर्ण हो सकता है।
कुल मिलाकर, माता प्रसाद पांडे से मुलाकात के बाद भले ही संजय निषाद ने सपा के साथ जाने की बात से दूरी बनाई हो, लेकिन भाजपा के लिए उनका संदेश जरूर स्पष्ट है कि सामाजिक न्याय और निषाद आरक्षण जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि 2027 के चुनाव से पहले भाजपा और निषाद पार्टी के बीच संबंध किस दिशा में जाते हैं और संजय निषाद अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर क्या फैसला लेते हैं।

