गोरखपुर में मोबाइल की लत से परेशान परिवार, कक्षा 4 के छात्र ने टीचर की बनाई अश्लील फोटो, प्रिंसिपल ने स्कूल से निकाला

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Digital UP News Desk

गोरखपुर: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से बच्चों में मोबाइल और इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ाने वाला मामला सामने आया है। शाहपुर थाना क्षेत्र के एक परिवार का 11 वर्षीय बच्चा, जो कक्षा 4 में पढ़ता है, कथित तौर पर लंबे समय से मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल की समस्या से जूझ रहा था। परिवार का कहना है कि ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान बच्चे को मोबाइल उपलब्ध कराया गया था, लेकिन धीरे-धीरे उसका स्क्रीन टाइम बढ़ता गया और वह फोन का आदी होता चला गया।

मामला तब सामने आया जब स्कूल प्रशासन ने बच्चे के अभिभावकों को बुलाकर उसके व्यवहार से जुड़ी कुछ गंभीर बातें बताईं। इसके बाद परिवार ने बच्चे को विशेषज्ञ चिकित्सक के पास ले जाना शुरू किया। फिलहाल उसका इलाज और काउंसलिंग चल रही है।

स्कूल में सामने आया बच्चे के व्यवहार का मामला

परिजनों के मुताबिक, एक दिन स्कूल की प्रिंसिपल ने उन्हें बुलाया। वहां उन्हें बताया गया कि बच्चे के बैग से शिक्षक से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री और कुछ स्केच मिले हैं। इसके अलावा, कक्षा के कुछ विद्यार्थियों ने भी बच्चे के अनुचित व्यवहार को लेकर शिकायत की थी।

स्कूल से मिली जानकारी के बाद माता-पिता काफी चिंतित हो गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनका बच्चा इतनी कम उम्र में इस तरह का व्यवहार कैसे करने लगा। परिवार ने जब पिछले कुछ समय की गतिविधियों पर ध्यान दिया तो उन्हें मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल की बात प्रमुख कारणों में से एक नजर आई।

हालांकि, किसी बच्चे के व्यवहार में बदलाव के पीछे केवल मोबाइल फोन को जिम्मेदार मानना उचित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे के व्यवहार को समझने के लिए उसके पारिवारिक वातावरण, भावनात्मक स्थिति, इंटरनेट इस्तेमाल के तरीके, सामाजिक संपर्क और मानसिक स्वास्थ्य जैसे कई पहलुओं का आकलन जरूरी होता है।

ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान शुरू हुआ मोबाइल का अधिक इस्तेमाल

परिवार ने बताया कि कोरोना काल के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई के लिए बच्चे को मोबाइल फोन देना शुरू किया गया था। शुरुआत में फोन का इस्तेमाल पढ़ाई के उद्देश्य से किया जाता था। लेकिन समय के साथ बच्चे की मोबाइल में रुचि बढ़ती चली गई।

अभिभावकों का कहना है कि बच्चा धीरे-धीरे पढ़ाई के अलावा भी काफी समय मोबाइल पर बिताने लगा। उसे फोन से दूर करने की कोशिश की गई, लेकिन वह इसका विरोध करने लगा। कई बार वह अकेले में मोबाइल इस्तेमाल करता था और काफी देर तक फोन अपने पास रखता था।

परिवार के मुताबिक, मोबाइल देने से मना करने पर बच्चे के व्यवहार में चिड़चिड़ापन और गुस्सा दिखाई देने लगा। इस वजह से माता-पिता को महसूस हुआ कि समस्या अब सामान्य स्क्रीन टाइम से आगे बढ़ रही है।

परिवार ने समय रहते विशेषज्ञ की मदद ली

बच्चे के व्यवहार में बदलाव देखने के बाद परिवार ने उसे डांटने या केवल मोबाइल छीन लेने के बजाय विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लेने का फैसला किया। फिलहाल बच्चे का शाहपुर क्षेत्र के एक मनोचिकित्सक से उपचार और काउंसलिंग कराई जा रही है।

परिवार का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उचित उपचार, काउंसलिंग और घर के वातावरण में सकारात्मक बदलाव के जरिए बच्चे की स्थिति में सुधार आएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों में इंटरनेट और मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चे को अचानक पूरी तरह डिजिटल दुनिया से काट देने के बजाय उसके साथ बातचीत करके सीमाएं तय करना अधिक प्रभावी हो सकता है।

डॉक्टर ने मानसिक स्वास्थ्य और काउंसलिंग पर दिया जोर

शहर के मनोचिकित्सक अमित कुमार शाही के हवाले से बताया गया है कि बच्चे के व्यवहार का चिकित्सकीय मूल्यांकन किया जा रहा है। डॉक्टर के अनुसार, कुछ मामलों में बच्चों में कम उम्र में वयस्कों जैसा व्यवहार करने की प्रवृत्ति दिखाई दे सकती है और इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक या सामाजिक कारण हो सकते हैं।

हालांकि, किसी बच्चे को केवल उसके व्यवहार के आधार पर किसी मानसिक बीमारी से ग्रसित बताना उचित नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी किसी भी स्थिति की पहचान विशेषज्ञ द्वारा विस्तृत मूल्यांकन के बाद ही की जानी चाहिए।

डॉक्टर के मुताबिक, उचित उपचार और काउंसलिंग के जरिए ऐसे मामलों में सुधार की संभावना रहती है। इसलिए अभिभावकों को बच्चे के व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखाई देने पर विशेषज्ञ की मदद लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।

बच्चों को इंटरनेट की दुनिया से पूरी तरह अकेला न छोड़ें

आज के दौर में मोबाइल फोन बच्चों की पढ़ाई और सीखने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऑनलाइन क्लास, शैक्षणिक वीडियो और डिजिटल कंटेंट के कारण बच्चों का स्क्रीन से जुड़ना स्वाभाविक है। हालांकि, समस्या तब पैदा होती है जब बच्चा बिना निगरानी के लंबे समय तक इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगे।

विशेषज्ञों की सलाह है कि छोटे बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए। माता-पिता को यह पता होना चाहिए कि बच्चा इंटरनेट पर क्या देख रहा है और किन वेबसाइटों या ऐप का इस्तेमाल कर रहा है।

इसके अलावा, फोन को बच्चे के कमरे में लंबे समय तक अकेले इस्तेमाल करने की अनुमति देने से बचना चाहिए। जहां संभव हो, मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल परिवार के सामान्य क्षेत्र में कराया जा सकता है।

पैरेंटल कंट्रोल और डिजिटल सुरक्षा जरूरी

बच्चों को अनुचित ऑनलाइन सामग्री से बचाने के लिए तकनीकी सुरक्षा उपाय भी अपनाए जा सकते हैं। स्मार्टफोन, ब्राउजर और वीडियो प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध पैरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा, सर्च फिल्टर और उम्र के अनुरूप कंटेंट सेटिंग को सक्रिय रखना भी उपयोगी हो सकता है।

लेकिन केवल तकनीकी नियंत्रण पर्याप्त नहीं है। बच्चों से डिजिटल सुरक्षा को लेकर उम्र के अनुरूप बातचीत करना भी जरूरी है। उन्हें समझाना चाहिए कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाली हर चीज सही या वास्तविक नहीं होती।

साथ ही, यदि बच्चा किसी ऐसी सामग्री को देख ले जिससे वह परेशान, भ्रमित या असहज महसूस कर रहा है, तो उसे डांटने के बजाय माता-पिता से बात करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

बच्चे को डांटने के बजाय समझना जरूरी

मनोवैज्ञानिक समस्याओं या डिजिटल व्यवहार से जुड़ी परेशानियों के मामलों में बच्चे को शर्मिंदा करना स्थिति को और कठिन बना सकता है। इसलिए अभिभावकों को धैर्य के साथ बच्चे की बात सुननी चाहिए।

यदि बच्चा बार-बार मोबाइल मांगता है, फोन हटाने पर अत्यधिक गुस्सा करता है, पढ़ाई और नींद प्रभावित होने लगती है या उसके सामाजिक व्यवहार में बड़ा बदलाव दिखाई देता है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

इसके अलावा, बच्चों के लिए खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियां, परिवार के साथ समय और दोस्तों के साथ स्वस्थ सामाजिक संपर्क बढ़ाना भी जरूरी है। इससे उनका ध्यान केवल डिजिटल दुनिया पर केंद्रित नहीं रहता।

स्कूल और परिवार दोनों की जिम्मेदारी

बच्चों के व्यवहार में बदलाव को पहचानने में स्कूल की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षक यदि किसी विद्यार्थी के व्यवहार में अचानक बदलाव देखते हैं तो अभिभावकों से संवाद करना जरूरी है। वहीं, माता-पिता को भी स्कूल से मिलने वाली ऐसी जानकारी को गंभीरता से लेना चाहिए।

गोरखपुर का यह मामला इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि बच्चों को मोबाइल और इंटरनेट उपलब्ध कराना जितना आसान है, उतना ही जरूरी उनका सुरक्षित डिजिटल इस्तेमाल सुनिश्चित करना भी है।

फिलहाल संबंधित बच्चे का उपचार चल रहा है। परिवार को उम्मीद है कि विशेषज्ञ की सलाह, नियमित काउंसलिंग और घर में बेहतर डिजिटल अनुशासन से बच्चे के व्यवहार में सुधार आएगा। यह मामला अन्य अभिभावकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि बच्चों के स्क्रीन टाइम के साथ-साथ उनकी ऑनलाइन गतिविधियों और मानसिक स्थिति पर भी संवेदनशील नजर रखना जरूरी है।

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