मोबाइल EMI नहीं चुका पाया तो बंधक बनाकर निकलवाया खून, अपहरण कर की गई मारपीट
Digital UP News Desk
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। निगोहां थाना क्षेत्र के राजाराम खेड़ा पुरहिया गांव के रहने वाले एक युवक को मोबाइल की कथित तौर पर बकाया 2,799 रुपये की EMI के मामले में बंधक बनाए जाने का आरोप लगा है। परिवार का आरोप है कि रिकवरी एजेंसी से जुड़े लोगों ने युवक को जबरन अपने साथ ले जाकर करीब चार दिनों तक बंधक बनाकर रखा और उससे मजदूरी कराई। इस दौरान उसके साथ मारपीट करने तथा खून निकालने का भी आरोप लगाया गया है।
मामले की जानकारी सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। पीड़ित परिवार का कहना है कि घटना के बाद जब वे शिकायत लेकर निगोहां थाने पहुंचे तो कथित तौर पर उनकी शिकायत पर तत्काल मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। परिवार का आरोप है कि कई दिनों तक थाने के चक्कर लगाने के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद पीड़ित के परिजन पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के पास पहुंचे, जिसके बाद मामले में मुकदमा दर्ज किया गया।
2,799 रुपये की EMI को लेकर विवाद का आरोप
परिवार के मुताबिक, युवक ने मोबाइल फोन खरीदा था और उसकी EMI की करीब 2,799 रुपये की राशि बकाया थी। इसी बकाया रकम की वसूली के लिए कुछ लोग युवक के संपर्क में आए। आरोप है कि इसके बाद मामला सामान्य रिकवरी प्रक्रिया से आगे बढ़ गया और युवक को कथित तौर पर जबरन अपने साथ ले जाया गया।
परिवार का दावा है कि युवक को करीब चार दिनों तक एक स्थान पर रखा गया। इस दौरान उससे मजदूरी कराने का भी आरोप लगाया गया है। परिजनों के अनुसार, युवक को तब तक रिहा नहीं किया गया, जब तक उसके बड़े भाई ने कथित तौर पर पैसे नहीं दिए।
हालांकि, घटना में वास्तव में कौन-कौन लोग शामिल थे, युवक को कहां रखा गया और उसके साथ क्या-क्या हुआ, इसकी पूरी तस्वीर पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
परिवार का आरोप-शिकायत के बाद भी नहीं हुई तत्काल कार्रवाई
पीड़ित परिवार का कहना है कि युवक के लापता होने और कथित तौर पर बंधक बनाए जाने की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने निगोहां पुलिस से संपर्क किया। परिवार के मुताबिक, वे कई बार थाने पहुंचे और घटना की शिकायत की, लेकिन शुरुआती तौर पर उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई।
परिजनों का आरोप है कि करीब चार दिनों तक वे पुलिस से कार्रवाई की मांग करते रहे। इसके बाद उन्होंने मामले की शिकायत पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी यानी DCP के समक्ष की। वरिष्ठ स्तर पर शिकायत पहुंचने के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया और मुकदमा दर्ज किया गया।
यह आरोप पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। हालांकि, पुलिस की ओर से मामले में क्या कार्रवाई की गई और शिकायत दर्ज करने में देरी क्यों हुई, इसका आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
पैसे देने के बाद युवक की रिहाई का दावा
परिवार के अनुसार, युवक को कथित तौर पर तभी छोड़ा गया जब उसके बड़े भाई ने पैसे दिए। परिजनों का दावा है कि बकाया EMI के नाम पर युवक को कई दिनों तक बंधक बनाकर रखना और उससे काम कराना बेहद गंभीर मामला है।
यदि जांच में परिवार द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल EMI की वसूली का मामला नहीं रहेगा, बल्कि इसमें जबरन बंधक बनाने, धमकी देने और अन्य आपराधिक कृत्यों की भी जांच हो सकती है। पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि युवक को किसने अपने साथ ले जाया था और इस पूरी घटना के पीछे किसकी भूमिका थी।
रिकवरी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
इस घटना ने कर्ज और EMI की वसूली से जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी भी वित्तीय बकाया की वसूली के लिए निर्धारित कानूनी और नियामकीय प्रक्रियाओं का पालन किया जाना जरूरी है। किसी व्यक्ति को धमकाना, जबरन ले जाना, बंधक बनाना या उसकी इच्छा के विरुद्ध काम कराना सामान्य रिकवरी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकता।
इसी वजह से इस मामले की निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। जांच में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि संबंधित लोग वास्तव में किसी रिकवरी एजेंसी से जुड़े थे या नहीं। यदि वे किसी कंपनी या एजेंसी के प्रतिनिधि थे, तो उनकी पहचान, नियुक्ति और वसूली की प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज भी जांच का हिस्सा हो सकते हैं।
परिवार ने वरिष्ठ अधिकारियों से लगाई गुहार
स्थानीय पुलिस से कथित तौर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं मिलने के बाद पीड़ित परिवार ने वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया। परिवार की शिकायत के बाद मुकदमा दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। अब पुलिस के सामने घटना की पूरी कड़ी को जोड़ने की चुनौती है।
जांच के दौरान पुलिस को पीड़ित युवक के बयान के अलावा उसके परिवार के सदस्यों के बयान भी दर्ज करने होंगे। साथ ही, मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड, संबंधित व्यक्तियों के संपर्क और घटना से जुड़े अन्य साक्ष्यों की जांच की जा सकती है। यदि युवक को किसी स्थान पर रखा गया था, तो वहां उपलब्ध CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्य भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
पुलिस जांच के बाद साफ होगी पूरी तस्वीर
फिलहाल इस मामले में परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। इसलिए किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने से पहले पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार करना जरूरी है।
मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि विवाद की शुरुआत कथित तौर पर महज 2,799 रुपये की EMI से हुई थी। यदि किसी व्यक्ति को इतनी छोटी राशि की वसूली के लिए कथित तौर पर चार दिनों तक बंधक बनाया गया, तो यह वसूली के तरीकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
वहीं, परिवार का यह भी आरोप है कि पुलिस से शिकायत करने के बावजूद तत्काल मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। ऐसे में जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी होगा कि शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने क्या कदम उठाए और FIR दर्ज करने में कथित देरी क्यों हुई।
क्या कहता है यह मामला?
यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि किसी भी प्रकार के कर्ज या EMI विवाद का समाधान कानून के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए। बकाया रकम की वसूली के लिए संबंधित संस्थाओं के पास निर्धारित कानूनी रास्ते मौजूद हैं। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति कानून अपने हाथ में लेकर दबाव बनाने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ शिकायत और कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुला रहता है।
फिलहाल निगोहां के राजाराम खेड़ा पुरहिया से जुड़े इस मामले में पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ कई सवालों के जवाब सामने आने की उम्मीद है। पीड़ित युवक के परिवार को अब पुलिस जांच से न्याय की उम्मीद है। साथ ही, इस मामले में आरोपित पक्ष का बयान और पुलिस की विस्तृत जानकारी सामने आने के बाद ही घटना की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

