आकृति चौधरी पर NSA को किया गया रद्द, हाईकोर्ट ने नोएडा DM पर की सख्त टिप्पणी
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प्रयागराज/नोएडा: नोएडा में अप्रैल 2026 के मजदूर आंदोलन से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत की गई हिरासत की कार्रवाई को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने गौतम बुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी मेधा रूपम और मामले से जुड़े अन्य अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है।
हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि आकृति चौधरी के खिलाफ NSA लगाने के लिए पेश की गई पुलिस रिपोर्ट पर्याप्त ठोस सामग्री पर आधारित नहीं थी। अदालत के अनुसार रिपोर्ट में मुख्य रूप से आरोपों का उल्लेख था, लेकिन उन्हें पुष्ट करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय सामग्री सामने नहीं रखी गई। इसी आधार पर कोर्ट ने प्रशासन द्वारा NSA जैसी कठोर कार्रवाई किए जाने पर सवाल उठाए।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों की विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन हुआ था। इस दौरान न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम और साप्ताहिक अवकाश जैसे मुद्दे प्रमुख थे। आंदोलन के बाद पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए थे। आकृति चौधरी भी इस मामले में गिरफ्तार की गई थीं।
पुलिस की ओर से उन पर आंदोलन के दौरान लोगों को उकसाने और हिंसा से जुड़े आरोप लगाए गए थे। बाद में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया। इस कार्रवाई के बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां आकृति की ओर से NSA के तहत हिरासत को चुनौती दी गई।
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस रिपोर्ट और प्रशासन द्वारा NSA लगाने के आधारों की जांच की। इसके बाद कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर आकृति चौधरी को NSA के तहत हिरासत में रखना उचित नहीं था।
हाईकोर्ट ने DM की भूमिका पर उठाए सवाल
मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने जिलाधिकारी के निर्णय पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करने से पहले प्रशासन को उपलब्ध सामग्री का स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से मूल्यांकन करना चाहिए था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ इतनी कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती। प्रशासन को यह देखना जरूरी है कि सामान्य कानून के तहत कार्रवाई पर्याप्त है या नहीं और NSA लगाने की वास्तविक आवश्यकता क्या है।
अदालत की टिप्पणी प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और अधिकारियों की जवाबदेही से भी जुड़ी रही। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अधिकारी संविधान के प्रति अपनी शपथ के अनुसार काम करने के लिए बाध्य हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई करते समय निष्पक्षता और विवेक का पालन जरूरी है।
पांच लाख रुपये मुआवजे का आदेश
हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि इस राशि की वसूली मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से की जाए। इसमें जिलाधिकारी और पुलिस अधिकारियों समेत NSA की प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों को शामिल किया गया है।
आकृति की ओर से अदालत में अधिक मुआवजे की मांग भी रखी गई थी, लेकिन कोर्ट ने पांच लाख रुपये की राशि को उचित माना। अदालत का यह निर्देश प्रशासनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया है। यानी इस मामले में अदालत की प्रतिकूल टिप्पणी अधिकारियों के सेवा अभिलेख का हिस्सा बनेगी।
‘ब्रिटिश राज’ से जुड़ी टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण?
फैसले में हाईकोर्ट ने प्रशासन और पुलिस की भूमिका को लेकर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जब नौकरशाही और पुलिस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के अनुसार काम करती है तो जनता उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखती है। वहीं, यदि सरकारी शक्तियों का गलत इस्तेमाल होता है तो लोगों में प्रशासन के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है।
कोर्ट ने अधिकारियों को अपनी कार्यप्रणाली पर आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत बताई। अदालत का संदेश स्पष्ट था कि किसी भी कठोर कानून का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि उससे किसी व्यक्ति या समूह पर दबाव बनाया जा सके।
कोर्ट ने ‘मिसाल बनाने’ की कोशिश पर भी जताई नाराजगी
फैसले में अदालत ने यह भी माना कि आकृति चौधरी के खिलाफ NSA की कार्रवाई के पीछे उन्हें आंदोलन से जुड़े अन्य लोगों के लिए एक उदाहरण बनाने की कोशिश की गई। कोर्ट ने इस दृष्टिकोण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून की कठोर धाराओं का इस्तेमाल अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अधिकारियों की शक्तियां असीमित नहीं हैं। प्रशासनिक निर्णय संविधान, कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप होने चाहिए।
करीब पांच महीने की हिरासत के बाद मिली राहत
रिपोर्टों के अनुसार आकृति चौधरी करीब पांच महीने तक हिरासत में रहीं। हाईकोर्ट द्वारा NSA की कार्रवाई रद्द किए जाने के बाद उन्हें इस मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। हालांकि, अदालत का फैसला विशेष रूप से NSA हिरासत से संबंधित है और अन्य लंबित मामलों की स्थिति अलग हो सकती है।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अदालत ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे विशेष कानून के इस्तेमाल में प्रशासनिक विवेक और जवाबदेही पर जोर दिया है। साथ ही, अधिकारियों को यह संदेश दिया गया है कि कठोर कानूनी प्रावधान लागू करने से पहले उसके लिए ठोस आधार और पर्याप्त सामग्री का होना आवश्यक है।
कुल मिलाकर, आकृति चौधरी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला प्रशासनिक शक्तियों, नागरिक अधिकारों और अधिकारियों की जवाबदेही के बीच संतुलन को रेखांकित करता है। अदालत ने NSA के इस्तेमाल को रद्द करने के साथ पांच लाख रुपये मुआवजे का आदेश देकर यह स्पष्ट किया कि सरकारी शक्तियों के प्रयोग में कानून और संविधान की सीमाओं का पालन जरूरी है।

