त्रिपुरा के चावल को मिला अंतरराष्ट्रीय बाजार, जैविक चावल की यूरोप में दस्तक, APEDA की मदद से ऑस्ट्रिया-नीदरलैंड भेजी गई 18 मीट्रिक टन खेप
अगरतला: त्रिपुरा के जैविक और पारंपरिक कृषि उत्पादों को अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान मिल रही है। इसी कड़ी में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) की सहायता से त्रिपुरा से एनपीओपी प्रमाणित 18 मीट्रिक टन पारंपरिक चावल की खेप ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड के लिए रवाना की गई है। यह खेप 2 सितंबर 2026 को निर्यात के लिए भेजी गई।
इस निर्यात को त्रिपुरा के किसानों और किसान उत्पादक कंपनियों (FPC) के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। खास तौर पर जैविक खेती और पारंपरिक चावल की स्थानीय किस्मों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की दिशा में यह कदम अहम है। इससे राज्य के किसानों को नए खरीदारों तक पहुंच बनाने के साथ-साथ अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य हासिल करने का अवसर मिल सकता है।
चार पारंपरिक चावल की किस्में शामिल
ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड भेजी गई चावल की खेप में त्रिपुरा की चार पारंपरिक किस्मों को शामिल किया गया है। इनमें सुगंधित काली खासा चावल, सुगंधित हरिनारायण चावल, बिरोन चावल और मैमी हांगा चावल प्रमुख हैं।
बिरोन को सफेद चिपचिपे चावल के रूप में जाना जाता है, जबकि मैमी हांगा काले चावल की पारंपरिक किस्म है। इन चावल की किस्मों की अपनी विशिष्ट पहचान और स्थानीय कृषि परंपराओं से जुड़ाव है। अब इन्हें यूरोपीय बाजारों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
इन उत्पादों को त्रिपुरा राज्य जैविक कृषि विकास एजेंसी (TSOFDA) के सहयोग से काम कर रही किसान उत्पादक कंपनियों से एकत्र किया गया है। इस व्यवस्था के माध्यम से स्थानीय किसानों को संगठित करके उनके उत्पादों को निर्यात योग्य बाजार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
किसानों को बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद
इस निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण पहलू किसानों की आय से जुड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रमाणित जैविक और पारंपरिक उत्पादों की मांग को देखते हुए संबंधित किसानों को घरेलू बाजार की तुलना में 40 प्रतिशत तक अधिक मूल्य मिलने की उम्मीद जताई गई है।
दरअसल, जैविक उत्पादों के लिए वैश्विक बाजार में गुणवत्ता, प्रमाणन, ट्रेसबिलिटी और खाद्य सुरक्षा जैसे मानकों का विशेष महत्व है। ऐसे में यदि किसान इन मानकों के अनुरूप उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था से जुड़ते हैं, तो उनके लिए बेहतर बाजार और मूल्य की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
इसके अलावा, निर्यात आधारित उत्पादन किसानों को केवल स्थानीय मांग पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर देता है। परिणामस्वरूप, किसान उत्पादक कंपनियों और कृषि संगठनों की भूमिका भी मजबूत हो सकती है।
APEDA की पहल से खुला अंतरराष्ट्रीय बाजार
इस निर्यात को पिछले महीने त्रिपुरा में आयोजित रिवर्स बायर-सेलर मीट (RBSM) से भी जोड़कर देखा जा रहा है। APEDA द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय खरीदारों और स्थानीय उत्पादकों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया था।
इस तरह के आयोजनों का उद्देश्य स्थानीय कृषि उत्पादों को संभावित विदेशी खरीदारों के सामने प्रस्तुत करना और व्यापारिक संपर्क विकसित करना होता है। अब मौजूदा निर्यात खेप को उसी प्रक्रिया का व्यावहारिक परिणाम माना जा रहा है।
यानी, खरीदारों और स्थानीय उत्पादकों के बीच शुरू हुआ संवाद अब वास्तविक व्यापारिक अवसर में बदल रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि पूर्वोत्तर भारत के पारंपरिक और जैविक कृषि उत्पादों में अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए संभावनाएं मौजूद हैं।
यूरोपीय बाजार में गुणवत्ता और प्रमाणन अहम
ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड जैसे यूरोपीय बाजारों में कृषि उत्पादों के लिए गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा के मानकों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसलिए त्रिपुरा से भेजी गई एनपीओपी प्रमाणित चावल की खेप केवल एक निर्यात सौदा नहीं है, बल्कि यह राज्य के कृषि उत्पादों की गुणवत्ता और प्रमाणन व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
एनपीओपी यानी National Programme for Organic Production के तहत प्रमाणन जैविक कृषि उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे प्रमाणन से विदेशी बाजारों में उत्पाद की विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ ही उत्पाद की ट्रेसबिलिटी यानी उत्पादन से लेकर बाजार तक उसकी पूरी प्रक्रिया की जानकारी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए त्रिपुरा के किसानों और FPC को इन व्यवस्थाओं से जोड़ना भविष्य में निर्यात को बढ़ाने में उपयोगी साबित हो सकता है।
कृषि मंत्री ने दिखाई हरी झंडी
त्रिपुरा से चावल की निर्यात खेप को रवाना करने के अवसर पर राज्य के कृषि मंत्री रतन लाल नाथ, APEDA के अध्यक्ष अभिषेक देव और त्रिपुरा सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव अपूर्वा रॉय मौजूद रहे। इन अधिकारियों ने संयुक्त रूप से खेप को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
कार्यक्रम में APEDA की सचिव डॉ. सस्वती बोस, NABARD की महाप्रबंधक तनुश्री भट्टाचार्य, कृषि निदेशक फणीभूषण जमातिया और TSOFDA के मिशन निदेशक राजीव देबबर्मा सहित कई अधिकारी मौजूद रहे।
इसके अलावा निर्यातक कंपनी, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधि और स्थानीय प्रगतिशील चावल किसानों ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। निर्यात का कार्य सोनीपत स्थित मेसर्स प्रथिति ऑर्गेनिक फूड्स द्वारा किया जा रहा है।
त्रिपुरा के कृषि क्षेत्र के लिए नई संभावना
कृषि मंत्री रतन लाल नाथ ने इस अवसर पर कहा कि त्रिपुरा से एनपीओपी प्रमाणित पारंपरिक चावल का अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात राज्य के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने इसे किसानों, किसान उत्पादक कंपनियों और अन्य हितधारकों के सामूहिक प्रयास का परिणाम बताया।
उन्होंने कहा कि त्रिपुरा में जैविक और पारंपरिक कृषि उत्पादों की व्यापक संभावनाएं हैं। ऐसे निर्यात से किसानों को नए बाजारों तक पहुंच बनाने और बेहतर मूल्य प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, इससे किसानों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर भी मजबूत हो सकते हैं।
राज्य सरकार की ओर से जैविक खेती के तंत्र को मजबूत करने और किसानों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उत्पादन में सहायता देने पर भी जोर दिया गया।
पूर्वोत्तर के कृषि उत्पादों को वैश्विक पहचान
वहीं, APEDA अध्यक्ष अभिषेक देव ने कहा कि त्रिपुरा से एनपीओपी प्रमाणित पारंपरिक चावल का निर्यात पूर्वोत्तर क्षेत्र की कृषि क्षमता को दर्शाता है। उनके अनुसार किसान उत्पादक कंपनियों और किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने के साथ प्रमाणन, ट्रेसबिलिटी और गुणवत्ता प्रणालियों को मजबूत करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि APEDA त्रिपुरा सरकार और अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर राज्य के विशिष्ट कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजारों में बढ़ावा देने के लिए प्रयास जारी रखेगा।
आगे बढ़ सकता है जैविक चावल का निर्यात
कुल मिलाकर, त्रिपुरा से ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड भेजी गई 18 मीट्रिक टन चावल की यह खेप राज्य के कृषि निर्यात क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे स्थानीय किसानों और FPC को यह भरोसा मिल सकता है कि पारंपरिक और जैविक उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसर मौजूद हैं।
साथ ही, यदि किसानों को प्रमाणन, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग, ट्रेसबिलिटी और निर्यात प्रक्रियाओं से लगातार जोड़ा जाता है, तो भविष्य में त्रिपुरा से जैविक चावल और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात का दायरा बढ़ सकता है।

