अब तक नहीं पढ़ी होगी रक्षाबंधन की यह पौराणिक कथा: जानिए कब से और क्यों मनाया जाता है राखी का त्यौहार
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रक्षाबंधन भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई धार्मिक और पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं। इनमें भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और दानवेन्द्र राजा बलि से जुड़ी कथा विशेष रूप से प्रचलित है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा बलि की भक्ति, दानशीलता और वचनबद्धता के कारण भगवान विष्णु को उनके साथ रसातल लोक में रहना पड़ा था। इसके बाद माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया और भगवान विष्णु को अपने साथ बैकुंठ ले आईं। इसी प्रसंग को रक्षाबंधन की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
राजा बलि को थी स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा
कथा के अनुसार, दानवेन्द्र राजा बलि अत्यंत पराक्रमी और दानी राजा थे। उन्होंने जब एक सौ यज्ञ पूर्ण कर लिए तो उनके मन में स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा प्रबल हो गई। उनकी इस बढ़ती शक्ति से देवराज इंद्र चिंतित हो गए और उन्हें लगा कि स्वर्ग का सिंहासन संकट में पड़ सकता है।
इसके बाद इंद्र सहित अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता और रक्षा की प्रार्थना की। देवताओं की प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा लेने के लिए वामन अवतार धारण किया।
वामन रूप में राजा बलि के पास पहुंचे भगवान विष्णु
भगवान विष्णु ने वामन यानी छोटे कद के ब्राह्मण का रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचे। उस समय राजा बलि अपने दान और यज्ञ के लिए प्रसिद्ध थे। वामन रूप में भगवान ने राजा बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली।
राजा बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली। हालांकि, उनके गुरु शुक्राचार्य भगवान के वास्तविक स्वरूप को पहचान गए थे। उन्होंने राजा बलि को सावधान किया और दान देने से रोकने का प्रयास किया।
इसके बावजूद राजा बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटे। उन्होंने तीन पग भूमि देने का संकल्प पूरा करने का निर्णय लिया।
दो कदमों में नाप लिए स्वर्ग और पृथ्वी
कथा के अनुसार, जैसे ही राजा बलि ने दान का वचन दिया, वामन भगवान ने विराट स्वरूप धारण कर लिया। इसके बाद उन्होंने अपने पहले कदम में स्वर्ग लोक और दूसरे कदम में पृथ्वी को नाप लिया।
अब भगवान विष्णु के सामने तीसरा कदम रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा था। राजा बलि के सामने भी धर्मसंकट उत्पन्न हो गया। उन्होंने समझा कि यदि वह अपना वचन पूरा नहीं करेंगे तो उनके लिए यह अधर्म होगा।
इसलिए राजा बलि ने अपना सिर भगवान के सामने कर दिया और कहा कि तीसरा कदम उनके सिर पर रखा जाए। वामन भगवान ने राजा बलि के सिर पर तीसरा कदम रखा। कथा के अनुसार, इसके बाद राजा बलि रसातल लोक में चले गए।
भगवान विष्णु बने राजा बलि के द्वारपाल
रसातल लोक में पहुंचने के बाद भी राजा बलि की भक्ति कम नहीं हुई। कथा में बताया गया है कि राजा बलि ने अपनी भक्ति के बल पर भगवान विष्णु से अपने सामने रहने का वचन ले लिया।
भगवान विष्णु ने भी अपने भक्त को दिए वचन का पालन किया और उनके द्वारपाल बनकर रहने लगे। इससे माता लक्ष्मी चिंतित हुईं, क्योंकि उनके पति भगवान विष्णु के रसातल में रहने से बैकुंठ लोक का संचालन प्रभावित हो रहा था।
नारद जी ने बताया उपाय
माता लक्ष्मी ने इस समस्या के समाधान के लिए नारद जी से उपाय पूछा। नारद जी ने उन्हें बताया कि यदि वह राजा बलि को अपना भाई बना लें, तो वह भगवान विष्णु को उनके साथ ले जाने का मार्ग बना सकती हैं।
इसके बाद माता लक्ष्मी राजा बलि के पास पहुंचीं। उन्होंने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई बनाया। राजा बलि ने भी उन्हें बहन के रूप में स्वीकार किया और उपहार देने की इच्छा जताई।
माता लक्ष्मी ने उपहार के रूप में अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने की इच्छा व्यक्त की। राजा बलि ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली। इस प्रकार भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ बैकुंठ लौट आए।
श्रावण पूर्णिमा से जुड़ी रक्षाबंधन की परंपरा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह प्रसंग श्रावण मास की पूर्णिमा से जुड़ा है। इसी कारण रक्षाबंधन को श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।
रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा को केवल भाई-बहन के रिश्ते के रूप में नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, जिम्मेदारी और स्नेह के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
रक्षा सूत्र बांधते समय मंत्र का महत्व
धार्मिक परंपरा में राखी बांधते समय एक प्रसिद्ध मंत्र का उच्चारण किया जाता है। इसे राजा बलि से जुड़ी कथा के संदर्भ में बताया जाता है—
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
इस मंत्र का भावार्थ है कि जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से तुम्हें बांधा जा रहा है। हे रक्षा सूत्र, तुम स्थिर रहो और अपनी रक्षा भावना में अडिग रहो।
प्रेम, विश्वास और जिम्मेदारी का पर्व है रक्षाबंधन
रक्षाबंधन की यह पौराणिक कथा भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम और विश्वास के महत्व को रेखांकित करती है। साथ ही, राजा बलि के चरित्र के माध्यम से वचन निभाने और माता लक्ष्मी के माध्यम से स्नेह एवं पारिवारिक संबंधों की भावना को भी सामने रखा गया है।
आज रक्षाबंधन के अवसर पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई उनकी सुरक्षा, सम्मान तथा सुख-दुख में साथ देने का संकल्प लेते हैं। हालांकि, समय के साथ इस पर्व का स्वरूप भी व्यापक हुआ है और अब यह पारिवारिक प्रेम तथा सामाजिक सद्भाव का संदेश देने वाला पर्व बन चुका है।
कुल मिलाकर, रक्षाबंधन की राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी पौराणिक कथा इस पर्व की धार्मिक परंपराओं को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। श्रावण पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह त्योहार आज भी प्रेम, विश्वास, सम्मान और पारिवारिक रिश्तों की मजबूती का संदेश देता है।

