श्रीप्रकाश शुक्ला की आखिरी चूक: एक फोन कॉल से कैसे STF तक पहुंची गैंगस्टर की लोकेशन?
Digital UP News Desk
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई के इतिहास में वर्ष 1998 का नाम बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दौर में कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम तेजी से सामने आया था। उसके बढ़ते प्रभाव और आपराधिक गतिविधियों ने पुलिस-प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। इसी चुनौती से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश में स्पेशल टास्क फोर्स यानी STF का गठन किया गया।
श्रीप्रकाश शुक्ला की कहानी का सबसे चर्चित हिस्सा उसका आखिरी ऑपरेशन माना जाता है। बताया जाता है कि पुलिस से बचने के लिए वह लगातार मोबाइल फोन, पेजर और अलग-अलग सिम कार्ड का इस्तेमाल करता था। इसके बावजूद एक फोन कॉल उसकी सबसे बड़ी चूक साबित हुई। पुलिस ने उसके संपर्क में रहने वाली एक महिला के फोन और बातचीत से जुड़े सुरागों को सर्विलांस के जरिए जोड़ते हुए उसकी गतिविधियों का पता लगाया।
मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को खतरे के बाद STF का गठन
बीबीसी की रिपोर्ट में पूर्व पुलिस अधिकारी अजय राज शर्मा की किताब Biting the Bullets: Memoirs of a Police Officer का हवाला दिया गया है। वर्ष 2020 में प्रकाशित इस पुस्तक में शर्मा ने उत्तर प्रदेश में अपनी तैनाती और श्रीप्रकाश शुक्ला से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख किया था।
अजय राज शर्मा के मुताबिक, तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उन्हें श्रीप्रकाश शुक्ला से उत्पन्न खतरे के बारे में बताया था। पुस्तक के अनुसार, मुख्यमंत्री की हत्या के लिए कथित तौर पर पांच करोड़ रुपये की सुपारी लिए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद संगठित अपराध से निपटने के लिए एक विशेष और अधिक सक्षम पुलिस बल की आवश्यकता महसूस हुई।
शर्मा ने तत्कालीन सरकार के सामने एक ऐसे बल के गठन का प्रस्ताव रखा, जिसे अपराधियों के खिलाफ विशेष अभियान चलाने की स्वतंत्रता मिले। इसके बाद 1998 में उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स का गठन किया गया। अजय राज शर्मा को इस नई टीम की जिम्मेदारी मिली।
शिक्षक के बेटे से अपराध की दुनिया तक
अजय राज शर्मा की पुस्तक में श्रीप्रकाश शुक्ला की शुरुआती जिंदगी से जुड़े विवरण भी दिए गए हैं। बताया गया कि वह एक शिक्षक का बेटा था। वर्ष 1993 के आसपास एक विवाद के बाद उस पर गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हुआ। गिरफ्तारी से बचने के लिए वह बैंकॉक चला गया और बाद में वापस लौटकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अपराध जगत से जुड़े लोगों के संपर्क में आया।
उस समय गोरखपुर और आसपास के इलाकों में कई प्रभावशाली बाहुबलियों का दबदबा था। इसी वातावरण में श्रीप्रकाश शुक्ला ने अपराध की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू की। कुछ ही समय में उसका नाम हत्या, अपहरण, रंगदारी और सुपारी से जुड़े मामलों में सामने आने लगा।
1997 में तेजी से बढ़ा दबदबा
वर्ष 1997 श्रीप्रकाश शुक्ला के आपराधिक प्रभाव के विस्तार का महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। लखनऊ में लॉटरी कारोबारी विवेक श्रीवास्तव की हत्या और इसके बाद हुई अन्य आपराधिक घटनाओं ने पुलिस के सामने चुनौती बढ़ा दी।
इसके बाद वीरेंद्र शाही की हत्या ने श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम को और चर्चा में ला दिया। इसी दौरान लखनऊ के एक प्रमुख बिल्डर के अपहरण और फिरौती की घटना का भी जिक्र मिलता है। इन घटनाओं के बाद पुलिस रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों में श्रीप्रकाश शुक्ला को उत्तर प्रदेश के बड़े गैंगस्टरों में गिना जाने लगा।
हालांकि, उसके बढ़ते प्रभाव के साथ पुलिस की निगरानी भी तेज होती गई। STF के गठन के बाद उसके नेटवर्क, संपर्कों और आवाजाही पर नजर रखने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल किया जाने लगा।
14 सिम कार्ड और तकनीक से बचने की कोशिश
उस दौर में मोबाइल फोन आज की तरह आम नहीं थे। इसके बावजूद श्रीप्रकाश शुक्ला कई सिम कार्ड इस्तेमाल करता था। अजय राज शर्मा के संस्मरण के अनुसार, वह करीब 14 सिम कार्ड का इस्तेमाल करता था और मोबाइल के अलावा पेजर जैसी संचार तकनीक का भी सहारा लेता था।
पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी लोकेशन का पता लगाना थी। इसी बीच मोबाइल ट्रैकिंग की शुरुआती तकनीकों का इस्तेमाल शुरू हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, आईआईटी कानपुर से पढ़े एक व्यक्ति की मदद से एक ऐसा उपकरण तैयार किया गया, जिससे मोबाइल सिग्नल की दिशा और लोकेशन का पता लगाने में मदद मिली।
यही तकनीकी क्षमता आगे चलकर STF के अभियान में महत्वपूर्ण साबित हुई।
एक फोन कॉल ने खोल दिया रास्ता
श्रीप्रकाश शुक्ला अपनी पहचान और लोकेशन छिपाने को लेकर सतर्क रहता था। बताया जाता है कि वह अलग-अलग स्थानों और फोन का इस्तेमाल करता था। मगर, गोरखपुर की एक महिला से उसका संपर्क पुलिस के लिए अहम सुराग बन गया।
रिपोर्ट के अनुसार, श्रीप्रकाश शुक्ला ने उसे मोबाइल फोन उपहार में दिया था। पुलिस ने उस फोन को सर्विलांस पर रखा। बाद में शुक्ला ने दिल्ली से फोन किया और इसी संपर्क के जरिए उसकी मौजूदगी से जुड़े संकेत पुलिस को मिलने लगे।
इसके बाद STF ने दिल्ली और गाजियाबाद में उसकी गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की। टीम को यह भी जानकारी मिली कि वह एक महिला से मिलने के लिए गाजियाबाद के वसुंधरा क्षेत्र में जा सकता है।
दिल्ली से गाजियाबाद तक STF ने बिछाया जाल
सितंबर 1998 में STF की टीम दिल्ली पहुंची। टीम ने संभावित स्थानों पर निगरानी बढ़ाई। एक समय यह सूचना मिली कि श्रीप्रकाश शुक्ला एयरपोर्ट के रास्ते बाहर जा सकता है। इसके बाद इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के आसपास भी निगरानी की गई।
हालांकि, वह एयरपोर्ट नहीं पहुंचा। इसके बाद उसके फोन संपर्क से यह संकेत मिला कि वह गाजियाबाद की ओर जा सकता है। STF ने उसके संभावित रास्तों पर नजर रखनी शुरू कर दी।
आखिरकार उसकी नीली कार की गतिविधियों पर पुलिस की नजर टिक गई। एनएच-24 के रास्ते इंदिरापुरम की ओर बढ़ते समय STF टीम ने उसका पीछा किया। पुलिस के मुताबिक, उसे शक हो गया कि उसका पीछा किया जा रहा है। इसके बाद उसकी कार मुख्य सड़क से हटकर कच्चे रास्ते की ओर चली गई।
22 सितंबर 1998 को हुआ अंतिम पुलिस ऑपरेशन
रिपोर्टों के मुताबिक, 22 सितंबर 1998 को इंदिरापुरम के पास STF और श्रीप्रकाश शुक्ला के बीच मुठभेड़ हुई। पुलिस का कहना था कि दोनों तरफ से फायरिंग हुई और जवाबी कार्रवाई में श्रीप्रकाश शुक्ला तथा उसके दो साथी मारे गए।
उस समय श्रीप्रकाश शुक्ला की उम्र करीब 24 वर्ष थी। उसके साथ अनुज प्रताप सिंह और सुधीर त्रिपाठी के भी मारे जाने का उल्लेख रिपोर्टों में मिलता है।
इस कार्रवाई के साथ उत्तर प्रदेश में श्रीप्रकाश शुक्ला के गैंग का अध्याय समाप्त हो गया। अजय राज शर्मा के संस्मरण में भी इस ऑपरेशन को STF के शुरुआती महत्वपूर्ण अभियानों में शामिल किया गया है।
एक फोन से शुरू हुई निगरानी बनी निर्णायक कड़ी
श्रीप्रकाश शुक्ला की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिस संचार व्यवस्था को वह पुलिस से बचने के लिए इस्तेमाल करता था, वही अंततः उसके खिलाफ सुराग बन गई।
उस दौर में मोबाइल फोन की तकनीक शुरुआती अवस्था में थी। इसके बावजूद STF ने उपलब्ध तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए संदिग्ध फोन नंबरों और उनके संपर्कों पर निगरानी की। इसी प्रक्रिया में उसके संपर्कों से जुड़े फोन भी जांच के दायरे में आए।
इससे यह साफ होता है कि किसी बड़े आपराधिक नेटवर्क को रोकने में केवल पुलिस बल ही नहीं, बल्कि खुफिया जानकारी, तकनीक, निगरानी और रणनीतिक नेतृत्व भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अजय राज शर्मा की पुलिस सेवा में एक अहम अध्याय
अजय राज शर्मा 1966 बैच के आईपीएस अधिकारी थे। पुलिस सेवा के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों में भूमिका निभाई। इनमें लाल किले पर आतंकी हमला, क्रिकेट मैच फिक्सिंग प्रकरण और दिसंबर 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले की जांच जैसे मामले शामिल रहे।
श्रीप्रकाश शुक्ला के खिलाफ अभियान उनकी पुलिस सेवा के शुरुआती महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक माना जाता है। उनके नेतृत्व में गठित STF ने आगे चलकर उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध के खिलाफ कई अभियानों में भूमिका निभाई।
अजय राज शर्मा का 10 फरवरी 2025 की रात निधन हो गया था। उनके संस्मरणों में दर्ज घटनाएं उत्तर प्रदेश पुलिस और STF के शुरुआती दौर को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
निष्कर्ष
श्रीप्रकाश शुक्ला का अंत केवल एक पुलिस ऑपरेशन की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दौर में बदलती पुलिसिंग और तकनीक के इस्तेमाल की कहानी भी है। एक ऐसा अपराधी जो अपनी पहचान और लोकेशन छिपाने के लिए कई सिम कार्ड और अलग-अलग संचार माध्यमों का इस्तेमाल करता था, आखिरकार उसके संपर्कों से मिले तकनीकी सुराग ही पुलिस के लिए निर्णायक कड़ी बने।
1998 में STF का गठन उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध से निपटने की दिशा में एक बड़ा कदम था। वहीं, श्रीप्रकाश शुक्ला के खिलाफ चलाया गया अभियान इस बात का उदाहरण बना कि खुफिया जानकारी, तकनीकी निगरानी और पुलिस नेतृत्व के तालमेल से कठिन अभियानों को अंजाम दिया जा सकता है।

