राजस्थान में अंधविश्वास का जाल: 4 साल में तंत्र-मंत्र के 51 मामले, 66 कथित तांत्रिक गिरफ्तार
Digital UP News Desk
जयपुर: राजस्थान में झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, टोने-टोटके और अंधविश्वास के नाम पर लोगों को गुमराह करने के मामले सामने आते रहे हैं। गंभीर बीमारी, पारिवारिक परेशानी या कथित नकारात्मक शक्तियों से छुटकारा दिलाने का दावा करने वाले कई लोग खुद को तांत्रिक, बाबा या साधक बताकर लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं। कई मामलों में पीड़ितों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा, जबकि कुछ घटनाओं में मानसिक उत्पीड़न, गंभीर चोट और मौत तक की स्थिति सामने आई।
हालांकि, ऐसे मामलों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि पुलिस या प्रशासन तक वही मामले पहुंचते हैं जिनमें पीड़ित या उनके परिवार शिकायत दर्ज कराते हैं। राजस्थान विधानसभा में भाजपा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी की ओर से पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने वर्ष 2022 से 2025 के बीच दर्ज मामलों का आंकड़ा सामने रखा है। इस सरकारी जवाब ने अंधविश्वास के नाम पर होने वाले कथित अपराधों की गंभीरता को उजागर किया है।
चार साल में 51 मामले, 66 कथित तांत्रिक गिरफ्तार
सरकार की ओर से विधानसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, 1 जनवरी 2022 से 31 दिसंबर 2025 तक राजस्थान में झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना और कथित पाखंड से जुड़े 51 मामले दर्ज किए गए। इन मामलों में पुलिस ने कुल 66 कथित तांत्रिकों और बाबाओं को गिरफ्तार किया।
इनमें से 6 आरोपियों को अदालत ने दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। वहीं, 35 आरोपियों के खिलाफ अभियोजन की कार्रवाई की गई। आंकड़े यह भी बताते हैं कि ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई के बावजूद कई प्रकरण अभी न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
इससे स्पष्ट है कि अंधविश्वास के नाम पर होने वाली गतिविधियों को लेकर शिकायत मिलने पर पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया के स्तर पर कार्रवाई की जा रही है। हालांकि, पीड़ितों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रहती है कि वे समय रहते ऐसे लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएं।
आर्थिक ठगी सबसे बड़ी समस्या
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, दर्ज किए गए 51 मामलों में से 40 मामलों में पीड़ितों को आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया। यह तथ्य बताता है कि कथित तांत्रिकों और बाबाओं के लिए अंधविश्वास केवल धार्मिक या आध्यात्मिक विश्वास का विषय नहीं, बल्कि कई मामलों में कथित आर्थिक शोषण का माध्यम भी बन जाता है।
कई बार बीमारी या पारिवारिक संकट से परेशान लोग इलाज के वैज्ञानिक विकल्पों की जगह झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र पर भरोसा करने लगते हैं। ऐसे में कथित बाबा उनसे लगातार अलग-अलग अनुष्ठानों, पूजा या कथित उपचार के नाम पर पैसे मांग सकते हैं। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद इलाज के बजाय ऐसे दावों पर अपनी जमा पूंजी खर्च कर देता है।
इसके अलावा, सरकार के जवाब में 6 मामलों में मानसिक उत्पीड़न की बात सामने आई है। चार मामलों में लोगों की मौत हुई, जबकि एक मामले में गंभीर चोट पहुंचने की जानकारी दर्ज हुई।
पाली में सबसे ज्यादा मामले
जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो पाली जिला सबसे ऊपर है, जहां अंधविश्वास और कथित तंत्र-मंत्र से जुड़े 6 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद जयपुर और सलूंबर में 5-5 मामले सामने आए।
सीकर और कोटा में 4-4 मामले दर्ज हुए। वहीं चित्तौड़गढ़, राजसमंद और श्रीगंगानगर में 3-3 मामले सामने आए। बाड़मेर, बीकानेर और उदयपुर में 2-2 मामले दर्ज किए गए।
इसके अलावा भीलवाड़ा, बूंदी, धौलपुर, डीडवाना-कुचामन, जालोर, झुंझुनूं, खैरथल-तिजारा, नागौर, जोधपुर, करौली, सवाई माधोपुर और अलवर में एक-एक मामला दर्ज किया गया।
इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मामला केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में लोगों को अंधविश्वास के नाम पर कथित तौर पर गुमराह किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।
कई जिलों में एक भी मामला दर्ज नहीं
सरकारी आंकड़ों में राजस्थान के कई ऐसे जिले भी हैं, जहां इस अवधि के दौरान तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक और कथित पाखंड से जुड़ा कोई मामला दर्ज नहीं हुआ।
इन जिलों में अजमेर, ब्यावर, टोंक, दौसा, भिवाड़ी, जैसलमेर, फलौदी, बालोतरा, सिरोही, झालावाड़, बारां, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, भरतपुर, डीग, हनुमानगढ़ और कोटपूतली-बहरोड़ शामिल हैं।
हालांकि किसी जिले में मामला दर्ज नहीं होना यह साबित नहीं करता कि वहां ऐसी घटनाएं बिल्कुल नहीं होतीं। शिकायत दर्ज होने और पुलिस तक मामला पहुंचने के बाद ही आधिकारिक आंकड़ों में उसकी गिनती होती है। इसलिए जागरूकता और शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था दोनों महत्वपूर्ण हैं।
2025 में चार लोगों की मौत का आंकड़ा
सरकार के जवाब में वर्ष 2025 के दौरान ऐसे मामलों में मौत से जुड़े आंकड़े भी सामने आए हैं। अलवर, बीकानेर, खैरथल-तिजारा और नागौर में एक-एक व्यक्ति की मौत का मामला दर्ज हुआ।
इन घटनाओं से यह सवाल उठता है कि गंभीर बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी की स्थिति में लोग किस तरह के उपचार का सहारा ले रहे हैं। विशेषज्ञों का सामान्य मत है कि किसी भी गंभीर बीमारी के लिए योग्य चिकित्सक से जांच और उपचार कराना जरूरी है। केवल कथित झाड़-फूंक या तंत्र-मंत्र के भरोसे इलाज में देरी करना जोखिम बढ़ा सकता है।
अंधविश्वास से बचने के लिए जागरूकता जरूरी
अंधविश्वास का सबसे बड़ा असर उन परिवारों पर पड़ता है जो बीमारी, आर्थिक संकट या व्यक्तिगत परेशानी के समय मानसिक रूप से कमजोर स्थिति में होते हैं। ऐसे समय में किसी चमत्कारी इलाज या कुछ ही समय में समस्या खत्म करने के दावे आकर्षक लग सकते हैं।
इसलिए जरूरी है कि लोग बीमारी की स्थिति में पहले योग्य डॉक्टर से सलाह लें। किसी व्यक्ति द्वारा असाधारण उपचार का दावा किए जाने पर उसकी विश्वसनीयता और प्रमाण की जांच करनी चाहिए। साथ ही, यदि कोई व्यक्ति डर पैदा करके पैसे मांगता है, इलाज के नाम पर लगातार रकम वसूलता है या किसी तरह का दबाव बनाता है, तो परिवार को सतर्क रहना चाहिए।
इसके अलावा, परिवार और समाज में वैज्ञानिक सोच तथा जागरूकता को बढ़ावा देना भी जरूरी है। स्कूलों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन के स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाया जा सकता है कि बीमारी और परेशानी का समाधान प्रमाण आधारित उपचार और कानूनी सहायता के जरिए भी संभव है।
शिकायत करना ही पहला कदम
सरकारी आंकड़े केवल उन मामलों की तस्वीर दिखाते हैं जो पुलिस और कानून व्यवस्था तक पहुंचे हैं। इसलिए विशेषज्ञों और प्रशासन की ओर से लगातार यह संदेश दिया जाना जरूरी है कि किसी भी प्रकार की ठगी, उत्पीड़न या जबरदस्ती की स्थिति में चुप न रहें।
यदि कोई कथित बाबा या तांत्रिक बीमारी ठीक करने, भूत-प्रेत का प्रभाव खत्म करने या किसी समस्या का समाधान करने के नाम पर आर्थिक या मानसिक शोषण करता है, तो पीड़ित परिवार को उपलब्ध कानूनी माध्यमों से शिकायत करनी चाहिए।
राजस्थान में चार वर्षों के दौरान सामने आए 51 मामले इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अंधविश्वास के नाम पर होने वाले कथित शोषण से निपटने के लिए कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी बेहद जरूरी है। वैज्ञानिक सोच, समय पर चिकित्सा सलाह और जरूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई ही लोगों को ऐसे झांसे से बचाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

