बाबा रामदेव ने शिक्षा व्यवस्था में बदलाव को बताया जरूरी, वंदे मातरम-आंदोलनों पर भी रखी बात
DigitalUP News Desk
करनाल: योग गुरु बाबा रामदेव ने करनाल दौरे के दौरान विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर अपनी राय रखी। इस दौरान उन्होंने पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह और अभिनेत्री कंगना रनौत के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह ऐसे लोगों के बयानों पर टिप्पणी करना उचित नहीं समझते, जिनकी सोच उनके अनुसार निम्न स्तर की हो। इसके साथ ही उन्होंने योग, आयुर्वेद और स्वदेशी उत्पादों के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों का उल्लेख किया।
बाबा रामदेव ने कहा कि पतंजलि के उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर लगातार मानकों का पालन किया जाता है और उत्पादों की जांच आधुनिक एवं विश्वस्तरीय प्रयोगशालाओं में कराई जाती है। उन्होंने कहा कि उनका मुख्य उद्देश्य योग, आयुर्वेद और स्वदेशी के माध्यम से लोगों को स्वस्थ जीवनशैली तथा देशी उत्पादों के प्रति जागरूक करना है। उन्होंने यह भी कहा कि ऊंचे स्तर के कार्यों में लगे व्यक्ति को हर बयान का जवाब देने की आवश्यकता नहीं होती।
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव को बताया सबसे बड़ा आंदोलन
बाबा रामदेव ने देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सबसे बड़ा आंदोलन शिक्षा व्यवस्था को बेहतर और अधिक प्रभावी बनाने के लिए होना चाहिए। उनके अनुसार, देश की शिक्षा नीति ऐसी होनी चाहिए, जिसमें आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और मूल्यों को भी उचित स्थान मिले।
उन्होंने ‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ की अवधारणा का समर्थन करते हुए कहा कि देश में शिक्षा के क्षेत्र में समानता और एकरूपता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि बच्चों को केवल किताबी ज्ञान देने के बजाय उन्हें भारतीय संस्कृति, परंपरा और ज्ञान प्रणाली से भी परिचित कराया जाना जरूरी है।
इसके अलावा बाबा रामदेव ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के विचार का भी समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों के कारण सरकारी तंत्र और शिक्षकों सहित विभिन्न वर्गों का काफी समय चुनावी प्रक्रिया में लग जाता है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था और अन्य विकास कार्यों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा का हिस्सा बनाने पर जोर
योग गुरु ने शिक्षा के माध्यम के साथ-साथ पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा को शामिल करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति और ज्ञान परंपरा काफी समृद्ध रही है। इसलिए विद्यार्थियों को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ भारतीय दर्शन, योग, आयुर्वेद, संस्कृत और पारंपरिक ज्ञान से भी परिचित कराया जाना चाहिए।
उन्होंने अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा व्यवस्था पर भी अपनी राय रखी और कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल किसी एक भाषा को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को बेहतर ज्ञान उपलब्ध कराना होना चाहिए। इसी तरह उन्होंने चिकित्सा व्यवस्था में भी भारतीय पद्धतियों और आयुर्वेद के महत्व को रेखांकित किया।
उनके मुताबिक, देश में भारतीय संस्कृति और स्वदेशी सोच को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीय दृष्टिकोण को उचित स्थान देने की आवश्यकता है।
आंदोलनों को लेकर बाबा रामदेव ने कही बड़ी बात
जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों और आंदोलनों के संदर्भ में बाबा रामदेव ने कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन आंदोलन संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल हंगामा या अराजकता के जरिए सत्ता हासिल नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा कि देश संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार चलता है। किसी भी व्यक्ति को प्रधानमंत्री या किसी अन्य संवैधानिक पद तक पहुंचने के लिए जनता के बीच जाना होगा और चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से समर्थन हासिल करना होगा।
बाबा रामदेव ने बच्चों को आंदोलनों में शामिल करने के विषय पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कम उम्र के बच्चों को अधिकारियों के घेराव या राजनीतिक गतिविधियों में शामिल करना उचित नहीं है। उनके अनुसार, बच्चों की प्राथमिकता शिक्षा और उनके समग्र विकास पर होनी चाहिए।
उन्होंने दोहराया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति के लिए संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं। इसलिए किसी भी आंदोलन को शांतिपूर्ण, व्यवस्थित और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
वंदे मातरम को लेकर भारत माता का किया उल्लेख
वंदे मातरम से जुड़े मुद्दे पर भी बाबा रामदेव ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत माता उनके लिए सर्वोच्च स्थान रखती हैं। भारतीय संस्कृति में भारत माता को राष्ट्र की शक्ति, ज्ञान, विद्या, धर्म और भक्ति के विभिन्न प्रतीकों से जोड़ा गया है।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में देवी के विभिन्न स्वरूपों के माध्यम से ज्ञान और शक्ति की अवधारणाओं को समझाया गया है। इसी क्रम में भारत माता को भी राष्ट्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
बाबा रामदेव ने कहा कि भारतीय संस्कृति और संस्कृत की गहरी समझ रखने वाले लोग इन विषयों को अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। उनके मुताबिक, देश की सांस्कृतिक विरासत को समझना आवश्यक है, ताकि राष्ट्रीय प्रतीकों और परंपराओं को लेकर होने वाली चर्चाओं को व्यापक संदर्भ में देखा जा सके।
योग और स्वदेशी को लेकर भी दिया संदेश
करनाल दौरे के दौरान बाबा रामदेव ने योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि योग को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपनाया जा रहा है और भारतीय जीवन पद्धति के प्रति लोगों की रुचि बढ़ रही है।
उन्होंने स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही। साथ ही पतंजलि के उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर कहा कि उत्पादों की जांच निर्धारित मानकों और प्रयोगशाला परीक्षणों के आधार पर की जाती है। उनका कहना था कि उपभोक्ताओं का विश्वास बनाए रखना किसी भी संस्था के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
कुल मिलाकर, बाबा रामदेव के करनाल दौरे के दौरान शिक्षा सुधार, भारतीय ज्ञान प्रणाली, लोकतांत्रिक आंदोलनों, वंदे मातरम, योग, आयुर्वेद और स्वदेशी जैसे कई विषय चर्चा के केंद्र में रहे। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में बदलाव को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई और कहा कि देश की प्रगति के लिए आधुनिक ज्ञान के साथ भारतीय संस्कृति और परंपरा को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

