TET से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवा सुरक्षा की मांग, राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने सांसद देवेंद्र सिंह भोले को सौंपा ज्ञापन- जानिए पूरा मामला
रिपोर्ट : विक्की रघुवंशी
कानपुर: राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश (प्राथमिक संवर्ग), कानपुर नगर इकाई ने टीईटी (Teacher Eligibility Test) लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवा सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने की मांग को लेकर अकबरपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद देवेंद्र सिंह भोले को ज्ञापन सौंपा।
संगठन ने आग्रह किया कि लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों के सेवा अधिकार, वरिष्ठता, पदोन्नति तथा अन्य वैधानिक लाभों की रक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकार आवश्यक नीतिगत एवं विधायी कदम उठाए।
महासंघ का कहना है कि टीईटी लागू होने से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों की नियुक्तियां उस समय लागू नियमों और निर्धारित शैक्षिक योग्यताओं के अनुरूप हुई थीं।
इसलिए बाद में लागू की गई पात्रता शर्तों का प्रभाव पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर पड़ना न्यायसंगत नहीं माना जाना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर संगठन ने सांसद के माध्यम से सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास किया है।
टीईटी लागू होने से पहले की नियुक्तियों का दिया गया हवाला
ज्ञापन में बताया गया कि 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने टीईटी को शिक्षक नियुक्ति के लिए न्यूनतम शैक्षिक अर्हता घोषित किया था।
इससे पहले उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्तियां तत्कालीन नियमों, चयन प्रक्रिया और निर्धारित योग्यता के आधार पर विधिवत संपन्न हुई थीं।
महासंघ ने कहा कि उस समय नियुक्त हुए शिक्षकों ने सभी निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए सरकारी सेवा प्राप्त की थी।
वर्षों से वे विद्यालयों में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं तथा राज्य की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं।
संगठन का मत है कि नियुक्ति के समय प्रभावी नियमों के आधार पर चयनित शिक्षकों की सेवा शर्तों का सम्मान किया जाना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद बढ़ी चिंता
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने अपने ज्ञापन में उल्लेख किया कि 29 मई 2026 को आए सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय के बाद टीईटी लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों के बीच अपने भविष्य को लेकर चिंता का वातावरण बना है।
महासंघ के अनुसार, निर्णय के बाद अनेक शिक्षकों में यह आशंका उत्पन्न हुई है कि कहीं उनके सेवा अधिकार, वरिष्ठता या अन्य वैधानिक लाभ प्रभावित न हों।
इसी कारण संगठन ने समय रहते सरकार का ध्यान इस विषय की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया है।
हालांकि, संगठन ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य किसी न्यायिक प्रक्रिया पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि पूर्व नियुक्त शिक्षकों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नीति स्तर पर समाधान की मांग करना है।
न्याय और विधिक निश्चितता के सिद्धांतों का किया उल्लेख
महासंघ ने अपने ज्ञापन में यह भी कहा कि किसी भी कर्मचारी की नियुक्ति उस समय लागू नियमों और योग्यता के आधार पर होती है। यदि बाद में नए पात्रता मानक लागू किए जाते हैं, तो उन्हें पूर्व में नियुक्त कर्मचारियों पर लागू करना न्याय, समानता और विधिक निश्चितता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
संगठन का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान जिन शिक्षकों ने सभी निर्धारित शर्तों को पूरा किया था, उन्हें बाद में लागू हुए नियमों के आधार पर किसी प्रकार की असुरक्षा का सामना नहीं करना चाहिए।
महासंघ ने यह भी कहा कि शिक्षा व्यवस्था में वर्षों तक योगदान देने वाले शिक्षकों के अनुभव और सेवाओं का सम्मान किया जाना आवश्यक है।
सांसद से संसद और सरकार के समक्ष मुद्दा उठाने का किया आग्रह
ज्ञापन के माध्यम से महासंघ ने सांसद देवेंद्र सिंह भोले से अनुरोध किया कि वे इस विषय को भारत सरकार तथा उत्तर प्रदेश सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से उठाएं।
इसके साथ ही संगठन ने यह भी मांग की कि संसद में इस विषय पर आवश्यक विधायी पहल की जाए, ताकि टीईटी लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों के सेवा अधिकारों को स्पष्ट रूप से संरक्षित किया जा सके।
महासंघ ने कहा कि यदि आवश्यक हो तो नीति स्तर पर ऐसे प्रावधान किए जाएं, जिनसे पूर्व नियुक्त शिक्षकों की वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतन संबंधी लाभ और अन्य सेवा अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रह सकें।
शिक्षा व्यवस्था में वर्षों से दे रहे योगदान
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने कहा कि टीईटी लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षक लंबे समय से सरकारी विद्यालयों में कार्यरत हैं। इन शिक्षकों ने शिक्षा के प्रसार, विद्यालयी व्यवस्था को मजबूत बनाने और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
संगठन का कहना है कि वर्षों की सेवा के बाद यदि शिक्षकों के भविष्य को लेकर किसी प्रकार की अनिश्चितता उत्पन्न होती है, तो इसका असर केवल शिक्षकों पर ही नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
इसी कारण संगठन ने सरकार से इस विषय पर संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है।
सरकार से संवेदनशील और न्यायपूर्ण निर्णय की अपेक्षा
महासंघ ने विश्वास व्यक्त किया कि केंद्र और राज्य सरकार लाखों शिक्षकों तथा उनके परिवारों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर संतुलित और न्यायपूर्ण निर्णय लेंगी।
संगठन का कहना है कि सेवा सुरक्षा केवल शिक्षकों का व्यक्तिगत विषय नहीं है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता और प्रशासनिक स्पष्टता से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए इस मुद्दे पर समयबद्ध और सकारात्मक पहल आवश्यक है।
इसके अलावा महासंघ ने उम्मीद जताई कि सरकार शिक्षकों की वर्षों की सेवाओं और उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए ऐसा समाधान निकालेगी, जिससे किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या कानूनी अनिश्चितता समाप्त हो सके।
बड़ी संख्या में शिक्षक रहे उपस्थित
ज्ञापन सौंपने के दौरान राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश (प्राथमिक संवर्ग) के कई पदाधिकारी और शिक्षक उपस्थित रहे। इनमें जिलाध्यक्ष चंद्र दीप सिंह यादव, डॉ. शैलेंद्र द्विवेदी, डॉ. राहुल मिश्रा, उमेश सिंह, डॉ. पवन मिश्रा, रचना अवस्थी, धीरेंद्र सिंह, स्वतंत्र शर्मा, संगम साहू, आशुतोष निगम, राकेश पाल, रजनीश कुमार, दीपक वर्मा, आदित्य द्विवेदी, साकेत सिंह, कौशल किशोर, अंबरीश शुक्ला, अल्का गौड़ा, अनुपम त्रिवेदी, अनिल राय, अखिलेश साहू, विवेक कटियार सहित बड़ी संख्या में शिक्षक शामिल रहे।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित शिक्षकों ने एक स्वर में पूर्व नियुक्त शिक्षकों के सेवा अधिकारों की सुरक्षा की आवश्यकता पर बल दिया तथा उम्मीद जताई कि सरकार और जनप्रतिनिधि इस विषय पर सकारात्मक पहल करेंगे।
टीईटी लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवा सुरक्षा का मुद्दा शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना हुआ है।
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ का कहना है कि नियुक्ति के समय प्रभावी नियमों के आधार पर चयनित शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा करना प्रशासनिक स्थिरता और न्यायसंगत व्यवस्था के लिए आवश्यक है।
अब इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर होने वाली आगे की पहल पर शिक्षकों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों की नजर बनी रहेगी।

