कानपुर आईआईटी -जीएसवीएम की बड़ी सफलता, 14 दिन में पता चलेगा डिप्रेशन की दवा का असर
रिपोर्ट- हरिशंकर शर्मा
कानपुर। डिप्रेशन के इलाज में दवा के असर का पता लगाने के लिए अब मरीजों और डॉक्टरों को लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। आईआईटी कानपुर और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों एवं डॉक्टरों के संयुक्त शोध में ऐसी महत्वपूर्ण तकनीक सामने आई है, जिसके जरिए इलाज शुरू होने के दूसरे सप्ताह यानी 7 से 14 दिनों के भीतर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मरीज को दी गई दवा आगे असर करेगी या नहीं।
इस शोध को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Frontiers में प्रकाशित किया गया है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इसे कानपुर के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। शोध का उद्देश्य डिप्रेशन के मरीजों में दवा के संभावित प्रभाव को शुरुआती चरण में पहचानना है, ताकि जरूरत पड़ने पर चिकित्सक समय रहते उपचार में बदलाव कर सकें।
दिमाग और पेट के संबंध पर केंद्रित रहा शोध
दरअसल, डिप्रेशन केवल मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि इसका संबंध शरीर की कई अन्य प्रक्रियाओं से भी देखा जाता है। इसी दिशा में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज और आईआईटी कानपुर की संयुक्त टीम ने दिमाग और पेट के बीच होने वाले आपसी संबंध का अध्ययन किया।
शोध जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रो. संजय काला के मार्गदर्शन में पूरा हुआ। वहीं, जीएसवीएम के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी ने अपनी टीम के साथ इस अध्ययन का नेतृत्व किया। टीम में डॉ. आयुषी सिंह और डॉ. कृतिका चावला शामिल रहीं।
आईआईटी कानपुर की ओर से न्यूरोकॉग्निटिव विभाग की फैकल्टी डॉ. प्रगति बालसुब्रमण्यम, अश्विन फ्रांसिस, डॉ. आलोक बाजपेयी और श्री हरि तिवारी ने शोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
EEG और EGG से रिकॉर्ड की गईं तरंगें
शोध में मरीजों के दिमाग और पेट में होने वाली गतिविधियों को समझने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसके लिए EEG यानी इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी के माध्यम से दिमाग की तरंगों को रिकॉर्ड किया गया। वहीं, EGG यानी इलेक्ट्रोगैस्ट्रोग्राफी के जरिए पेट की तरंगों और गतिविधियों को दर्ज किया गया।
इन दोनों प्रकार की रिकॉर्डिंग को अलग-अलग समय पर किया गया और फिर उनके बीच के संबंधों का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन में इस्तेमाल किए गए EEG और EGG मूल्यांकन उपकरण Neuroclinical Innovative Solutions (NCIS) Private Limited द्वारा विकसित किए गए थे।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह समझना था कि दवा शुरू करने के बाद शुरुआती दिनों में दिमाग और पेट की तरंगों में होने वाले बदलाव क्या भविष्य में उपचार के परिणाम का संकेत दे सकते हैं।
तीन चरणों में हुई मरीजों की जांच
शोध के दौरान मरीजों की जांच और रिकॉर्डिंग तीन अलग-अलग चरणों में की गई। पहली जांच दवा शुरू करने से पहले यानी बेसलाइन विजिट के दौरान हुई। इस चरण में मरीज के दिमाग और पेट की शुरुआती तरंगों को रिकॉर्ड किया गया।
इसके बाद दूसरी जांच 7 से 14 दिनों के बीच की गई। यही चरण इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इस दौरान मरीजों की EEG और EGG रिकॉर्डिंग दोबारा की गई। शोधकर्ताओं ने इन शुरुआती बदलावों का विश्लेषण कर यह अनुमान लगाने की कोशिश की कि मरीज को दी गई दवा भविष्य में प्रभावी रहेगी या नहीं।
इसके बाद करीब 30 से 40 दिनों के बीच अंतिम फॉलोअप किया गया। इस चरण में मरीज की स्थिति का दोबारा आकलन किया गया, ताकि उपचार के वास्तविक परिणाम को समझा जा सके।
100 मरीजों से शुरू हुआ अध्ययन
शोध की शुरुआत कुल 100 मरीजों को शामिल करके की गई थी। इनमें से 82 प्रतिभागियों ने शुरुआती EEG और EGG जांच पूरी की। दूसरी विजिट यानी 7 से 14 दिन के बीच 42 मरीज फॉलोअप के लिए पहुंचे।
वहीं, तीसरी और अंतिम विजिट, जो 30 से 40 दिनों के बीच हुई, तक 38 मरीज पहुंचे। सभी चरणों का पूरा क्लीनिकल डेटा उपलब्ध होने के बाद अंतिम विश्लेषण के लिए 22 मरीजों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया।
इस तरह शोधकर्ताओं ने मरीजों की शुरुआती स्थिति, उपचार के बाद शुरुआती बदलाव और अंतिम उपचार परिणाम के बीच संबंध का गहराई से अध्ययन किया।
मशीन विश्लेषण में मिले उत्साहजनक नतीजे
डॉ. धनंजय चौधरी के अनुसार, अंतिम रूप से उपलब्ध 22 मरीजों के डेटा का मशीन आधारित विश्लेषण किया गया। इसमें मशीन ने 22 में से 17 मरीजों के उपचार परिणाम की सही भविष्यवाणी की।
शोध में करीब 80 प्रतिशत specificity और 78 प्रतिशत sensitivity दर्ज की गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये परिणाम इस तकनीक की संभावित उपयोगिता को सामने रखते हैं। हालांकि, इस तरह के निष्कर्षों को व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले बड़े समूहों में आगे के अध्ययन की आवश्यकता होगी।
फिलहाल शोध का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उपचार के शुरुआती चरण में मिलने वाले EEG और EGG संकेत भविष्य में दवा के असर का अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं।
मरीजों के समय और खर्च में हो सकती है बचत
डिप्रेशन के उपचार में कई बार किसी दवा का पूरा असर समझने में कई सप्ताह लग सकते हैं। यदि शुरुआती दवा अपेक्षित परिणाम नहीं देती, तो उपचार में बदलाव करने में भी समय लग सकता है। ऐसे में मरीज को मानसिक, आर्थिक और उपचार संबंधी अतिरिक्त बोझ का सामना करना पड़ सकता है।
इस शोध से उम्मीद जगी है कि भविष्य में चिकित्सक इलाज शुरू होने के 7 से 14 दिनों के भीतर मिलने वाले संकेतों के आधार पर उपचार की दिशा को लेकर बेहतर निर्णय ले सकेंगे। यदि किसी मरीज में दी गई दवा के प्रभावी होने की संभावना कम दिखाई देती है, तो चिकित्सक आवश्यकतानुसार आगे की उपचार रणनीति पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मशीन अपने आप दवा बदलने का निर्णय करेगी। दवा में बदलाव का फैसला हमेशा मरीज की चिकित्सकीय स्थिति, लक्षणों और विशेषज्ञ चिकित्सक के आकलन के आधार पर ही किया जाएगा।
कानपुर के शोध को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान
आईआईटी कानपुर और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज का यह संयुक्त अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें इंजीनियरिंग, न्यूरोसाइंस और चिकित्सा विज्ञान को एक साथ जोड़ा गया है। एक ओर जहां मेडिकल विशेषज्ञों ने मरीजों के उपचार और क्लीनिकल मूल्यांकन पर काम किया, वहीं दूसरी ओर तकनीकी विशेषज्ञों ने EEG और EGG से मिले आंकड़ों के विश्लेषण में योगदान दिया।
इसके परिणामस्वरूप डिप्रेशन के उपचार को अधिक व्यक्तिगत और डेटा आधारित बनाने की दिशा में नई संभावना सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Frontiers में अध्ययन का प्रकाशित होना इस संयुक्त प्रयास को वैश्विक वैज्ञानिक मंच पर पहचान मिलने का संकेत भी है।
आगे बड़े स्तर पर शोध की जरूरत
शोध के शुरुआती परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन इसे व्यापक चिकित्सा व्यवस्था में लागू करने से पहले बड़े स्तर पर और अधिक मरीजों के साथ अध्ययन करना जरूरी होगा। अलग-अलग आयु वर्ग, डिप्रेशन की गंभीरता और विभिन्न प्रकार की दवाओं के साथ इस तकनीक की उपयोगिता को आगे जांचना महत्वपूर्ण रहेगा।
फिर भी, मौजूदा अध्ययन ने डिप्रेशन के उपचार में एक महत्वपूर्ण संभावना जरूर दिखाई है। यदि भविष्य के बड़े अध्ययनों में भी इसी तरह के परिणाम सामने आते हैं, तो उपचार की शुरुआती अवस्था में दवा की संभावित प्रभावशीलता पहचानने की दिशा में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

