पद्म विभूषण तीजन बाई का हुआ निधन: पंडवानी गायन की अमर स्वर-साधिका ने दुनिया को कहा अलविदा
Digital UP News Desk
रायपुर: भारतीय लोककला जगत के लिए एक अत्यंत दुखद समाचार सामने आया है। छत्तीसगढ़ की विश्व विख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उनका उपचार AIIMS रायपुर में चल रहा था। उनके निधन से न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक और लोक कलात्मक दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई है।
तीजन बाई ने अपनी सशक्त आवाज़, प्रभावशाली मंच प्रस्तुति और महाभारत की कथाओं को अनोखे अंदाज़ में प्रस्तुत करने की कला के माध्यम से पंडवानी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई। उनका जाना भारतीय लोककला की एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
लोककला की एक युग प्रवर्तक हस्ती थीं तीजन बाई
तीजन बाई का नाम भारतीय लोक संगीत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। उन्होंने अपने जीवन को लोककला के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित कर दिया। विशेष रूप से पंडवानी गायन शैली, जो महाभारत की कथाओं पर आधारित लोकगायन की एक विशिष्ट परंपरा है, उसे उन्होंने नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
उनकी प्रस्तुति केवल गायन तक सीमित नहीं रहती थी। बल्कि वह अभिनय, संवाद, भाव-भंगिमा और मंच संचालन का ऐसा अद्भुत संगम प्रस्तुत करती थीं, जिससे श्रोता पूरी तरह कथा में डूब जाते थे। यही कारण रहा कि उनकी कला को देश-विदेश में भरपूर सराहना मिली।
संघर्षों के बीच तय किया सफलता का सफर
तीजन बाई का जीवन संघर्ष और प्रेरणा की मिसाल रहा। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर एक अलग पहचान बनाई। ऐसे समय में जब पंडवानी गायन में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम थी, उन्होंने सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए इस कला को अपनाया।
इसके बाद उन्होंने लगातार अपने हुनर को निखारा और धीरे-धीरे राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचीं। उनकी मेहनत और समर्पण ने यह साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी भी परिस्थिति की मोहताज नहीं होती।
दुनियाभर में पहुंचाई भारतीय लोककला की पहचान
तीजन बाई ने भारत के अलावा कई देशों में भी अपनी प्रस्तुतियां दीं। उनकी कला ने विदेशी दर्शकों को भारतीय लोक संस्कृति और महाभारत की कथाओं से परिचित कराया। यही वजह रही कि पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिली।
उनके कार्यक्रमों में केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और नैतिक मूल्यों की झलक भी देखने को मिलती थी। इसलिए उन्हें भारत की सांस्कृतिक दूत के रूप में भी सम्मान मिला।
कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुईं सम्मानित
भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें समय-समय पर कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और बाद में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से भी अलंकृत किया गया।
इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत, रंगमंच और लोक संस्कृति के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। ये सम्मान उनके लंबे और समर्पित कलात्मक जीवन की उपलब्धियों का प्रमाण हैं।
पंडवानी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में निभाई अहम भूमिका
तीजन बाई का सबसे बड़ा योगदान केवल मंचीय प्रस्तुतियां नहीं थीं, बल्कि उन्होंने नई पीढ़ी को भी पंडवानी सीखने और अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अनेक युवा कलाकारों का मार्गदर्शन किया और लोककला के संरक्षण की दिशा में निरंतर प्रयास किए।
उनका मानना था कि यदि पारंपरिक कलाओं को नई पीढ़ी तक नहीं पहुंचाया गया तो आने वाले समय में इनकी पहचान कमजोर पड़ सकती है। इसलिए उन्होंने जीवन भर इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई।
AIIMS रायपुर में चल रहा था इलाज
जानकारी के अनुसार, तीजन बाई पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थीं। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें AIIMS रायपुर में भर्ती कराया गया था, जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उनका उपचार चल रहा था। हालांकि, तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों ने गहरा शोक व्यक्त किया। सोशल मीडिया पर भी बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके योगदान को याद किया।
देशभर में शोक की लहर
तीजन बाई के निधन से देशभर के कलाकारों, साहित्यकारों और संस्कृति प्रेमियों में गहरा दुख है। अनेक सांस्कृतिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों ने उन्हें भारतीय लोककला की अमूल्य धरोहर बताते हुए श्रद्धांजलि दी है।
वहीं, उनके प्रशंसकों का कहना है कि तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनकी आवाज, उनकी प्रस्तुतियां और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेंगी।
भारतीय संस्कृति के लिए अमिट विरासत
तीजन बाई ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि लोक कलाएं केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक पहचान भी हैं। उन्होंने पंडवानी को गांवों की चौपाल से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।
आज उनका निधन भारतीय संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। हालांकि, उनकी कला और उनका योगदान हमेशा जीवित रहेगा। आने वाली पीढ़ियां उन्हें एक ऐसी लोक गायिका के रूप में याद करेंगी, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, समर्पण और अथक मेहनत से भारतीय लोक संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाई।
तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साधना और सांस्कृतिक समर्पण की प्रेरणादायक कहानी है। उन्होंने न केवल पंडवानी गायन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि भारतीय लोककलाओं के सम्मान और सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके निधन से कला जगत ने एक अनमोल रत्न खो दिया है। उनकी विरासत सदैव कलाकारों और संस्कृति प्रेमियों को प्रेरित करती रहेगी और भारतीय लोक संगीत के इतिहास में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा।

