औरैया दोहरे हत्याकांड में कमलेश पाठक समेत 10 दोषियों को उम्रकैद

WhatsApp Image 2026-08-19 at 4.15.51 PM

रिपोर्ट-अंजुमन तिवारी 

औरैया: औरैया के बहुचर्चित मंजुल चौबे और उनकी बहन सुधा चौबे दोहरे हत्याकांड में एमपी-एमएलए कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने समाजवादी पार्टी के पूर्व विधान परिषद सदस्य (MLC) कमलेश पाठक, उनके दो भाइयों संतोष पाठक और राम पाठक समेत कुल 10 आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। करीब छह साल पुराने इस मामले में अदालत के फैसले के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद मजबूत हुई है।

मंजुल चौबे पेशे से वकील थे, जबकि उनकी बहन सुधा चौबे शिक्षिका थीं। दोनों की 15 जनवरी 2020 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद औरैया समेत पूरे क्षेत्र में काफी चर्चा हुई थी। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया और बाद में अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया।

छह साल चली मुकदमे की सुनवाई

इस दोहरे हत्याकांड की सुनवाई करीब छह साल तक चली। इस दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से कुल 72 गवाह अदालत के सामने पेश हुए। इनमें पीड़ित पक्ष की ओर से 33 गवाहों ने अपनी गवाही दर्ज कराई, जबकि कमलेश पाठक की ओर से 39 लोगों को गवाह के रूप में पेश किया गया।

अदालत ने सभी साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और मामले से जुड़े दस्तावेजों पर विचार करने के बाद बुधवार को कमलेश पाठक सहित 10 आरोपियों को दोषी करार दिया। इसके बाद अदालत ने सभी दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस फैसले को छह साल से चल रहे मामले में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

एक बीघा जमीन से शुरू हुआ था विवाद

बताया जाता है कि इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में मंदिर की करीब एक बीघा जमीन को लेकर विवाद था। कभी कमलेश पाठक और मंजुल चौबे के बीच अच्छे संबंध बताए जाते थे। हालांकि, समय के साथ दोनों के बीच मतभेद बढ़ते गए। बाद में विवादित जमीन को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए।

आरोपों के मुताबिक, कमलेश पाठक इस जमीन पर अपना दावा कर रहे थे, जबकि मंजुल चौबे इसका विरोध कर रहे थे। इसी विवाद ने धीरे-धीरे दोनों परिवारों के बीच तनाव बढ़ा दिया। इसके बाद दोनों पक्षों के संबंध पूरी तरह खराब हो गए।

15 जनवरी 2020 को हुआ था दोहरा हत्याकांड

पुलिस के अनुसार, 15 जनवरी 2020 को कमलेश पाठक विवादित जमीन के पास कुर्सी पर बैठे थे। इसी दौरान मंजुल चौबे के पिता वहां पहुंचे और उन्होंने कमलेश पाठक के वहां बैठने पर आपत्ति जताई। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हो गई।

कुछ ही देर में विवाद बढ़ गया और परिवार के अन्य लोग भी मौके पर पहुंच गए। कमलेश पाठक के भाई संतोष पाठक और उनका गनर भी वहां पहुंच गया। आरोप है कि इसी दौरान दोनों पक्षों में तनाव बढ़ा और मारपीट की स्थिति बन गई।

पुलिस के मुताबिक, विवाद के दौरान कमलेश पाठक के गनर ने मंजुल चौबे के पिता के साथ मारपीट की। इसके बाद कमलेश पाठक और उनके भाई संतोष पाठक पर फायरिंग करने का आरोप लगा। इस घटना में मंजुल चौबे और उनकी बहन सुधा चौबे की मौत हो गई।

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची। शुरुआती कार्रवाई में कमलेश पाठक, उनके भाई संतोष पाठक और राम पाठक समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद जांच आगे बढ़ी और अगले दिन भी कुछ अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी की गई।

11 लोगों के खिलाफ दाखिल हुई थी चार्जशीट

पुलिस ने इस मामले की जांच पूरी करने के बाद कुल 11 लोगों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था। इनमें से 10 आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की गई थी। एक आरोपी नाबालिग था, इसलिए उसे किशोर न्यायालय भेज दिया गया।

वहीं, कमलेश पाठक के गनर अवनीश प्रताप सिंह को गैंगस्टर एक्ट से जुड़े मामले में राहत मिली थी। जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों पर भी कार्रवाई की थी।

प्रशासन के अनुसार, कमलेश पाठक की करीब 36.15 करोड़ रुपये, संतोष पाठक की करीब 9.75 करोड़ रुपये और रामू पाठक की करीब 7.51 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई थी। इस कार्रवाई को मामले में प्रशासन की बड़ी कार्रवाई के तौर पर देखा गया था।

1990 में बने थे विधान परिषद सदस्य

कमलेश पाठक का राजनीतिक सफर भी काफी चर्चित रहा है। औरैया के भड़ारीपुर गांव से संबंध रखने वाले कमलेश पाठक समाजवादी पार्टी से लंबे समय तक जुड़े रहे। बताया जाता है कि कम उम्र में ही उन्होंने राजनीति में मजबूत पहचान बना ली थी।

साल 1990 में उन्हें विधान परिषद सदस्य बनाया गया था। इसके बाद 1991 में उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा मिला। वर्ष 2002 में उन्होंने डेरापुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और विधायक बने। हालांकि, 2007 में दिबियापुर विधानसभा सीट से चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

इसके बाद 2012 में सिकंदरा विधानसभा सीट से भी उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी की सरकार में वर्ष 2013 में उन्हें रेशम विभाग का अध्यक्ष बनाया गया और राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया। बाद में मई 2015 में उन्हें फिर विधान परिषद भेजा गया और वे एमएलसी बने।

कभी दोस्त थे मंजुल चौबे और कमलेश पाठक

इस मामले की सबसे चर्चित बात यह भी रही कि कमलेश पाठक और मंजुल चौबे कभी करीबी दोस्त बताए जाते थे। स्थानीय स्तर पर दोनों के पुराने संबंधों की चर्चा होती रही है। बताया जाता है कि मंजुल चौबे के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में कमलेश पाठक ने शुरुआती दौर में उनकी मदद की थी।

मंजुल चौबे कॉलेज में छात्र संघ अध्यक्ष भी चुने गए थे। हालांकि, समय के साथ दोनों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अलग दिशा में बढ़ने लगीं। वर्ष 2006 के नगर पालिका चुनाव के दौरान भी दोनों के बीच मतभेद सामने आने की बात कही जाती है।

बताया जाता है कि मंजुल चौबे चुनावी राजनीति में आगे बढ़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें अपेक्षित राजनीतिक सहयोग नहीं मिला। इसके बाद उनके संबंधों में दूरी बढ़ती गई। बाद में मंजुल चौबे के दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं से संपर्क बढ़ने की भी चर्चा सामने आई।

इसी बीच पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास स्थित जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद और गहरा गया। जमीन के दावे और विरोध ने पहले से चले आ रहे मतभेद को और बढ़ा दिया। अंततः 15 जनवरी 2020 की घटना ने इस विवाद को बेहद गंभीर रूप दे दिया।

अदालत के फैसले से मामले में आया निर्णायक मोड़

करीब छह साल तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद एमपी-एमएलए कोर्ट का यह फैसला मामले में निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। अदालत ने कमलेश पाठक और उनके दो भाइयों समेत 10 लोगों को दोषी मानते हुए सभी को आजीवन कारावास की सजा दी है।

इस फैसले के साथ ही लंबे समय से अदालत में चल रहे इस बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड की सुनवाई के एक महत्वपूर्ण चरण का समापन हुआ है। पीड़ित परिवार की ओर से लगातार न्याय की मांग की जाती रही थी। वहीं, मामले में बचाव पक्ष ने भी अदालत के सामने अपने पक्ष में गवाह और दलीलें पेश की थीं।

कुल मिलाकर, औरैया का यह मामला केवल दो हत्याओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके पीछे जमीन का विवाद, पुराने रिश्तों में आई दरार और राजनीति से जुड़े घटनाक्रम भी चर्चा में रहे। अब अदालत के फैसले के बाद छह साल पुराने इस मामले में दोषियों को आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है।

You may have missed