नाग पंचमी पर बुंदेलखंड की अनोखी परंपरा, यमुना किनारे युवतियों ने निभाई गुड़िया कूटने की रस्म
रिपोर्ट- मो. अकरम
हमीरपुर। बुंदेलखंड की लोक संस्कृति और परंपराएं अपनी विविधता और अनूठे रीति-रिवाजों के लिए जानी जाती हैं। बदलते समय के बावजूद यहां आज भी कई ऐसी परंपराएं जीवित हैं, जिन्हें स्थानीय लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते आ रहे हैं। नाग पंचमी के अवसर पर हमीरपुर जनपद के मेरापुर में भी ऐसी ही एक अनोखी लोक परंपरा देखने को मिली, जहां युवतियों ने कपड़े से बनाई गई गुड़ियों को परंपरागत तरीके से कूटकर सदियों पुरानी रस्म निभाई।
मेरापुर स्थित संगमेश्वर मंदिर के पास यमुना किनारे नाग पंचमी के दिन इस परंपरा को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। सुबह से ही आसपास के क्षेत्रों से युवतियां और महिलाएं यहां पहुंचने लगीं। इसके बाद परंपरागत तरीके से कपड़े से तैयार की गई गुड़ियों को लेकर रस्म निभाई गई। इस दौरान युवतियों ने गुड़ियों को कूटकर बुंदेलखंड की इस लोक परंपरा को जीवंत रखा।
नाग पंचमी पर निभाई जाती है अनोखी रस्म
बुंदेलखंड के अलग-अलग इलाकों में नाग पंचमी से जुड़ी कई लोक मान्यताएं और परंपराएं प्रचलित हैं। इन्हीं में गुड़िया कूटने की परंपरा भी शामिल है। मेरापुर में हर वर्ष नाग पंचमी के अवसर पर स्थानीय स्तर पर इस रस्म का आयोजन किया जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार गुड़िया कूटने की रस्म को बुराई और अनिष्ट को दूर करने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इस रस्म को लेकर बुंदेलखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। यही विविधता इस परंपरा को और खास बनाती है।
नाग पंचमी के दिन युवतियां विशेष रूप से तैयार होकर इस आयोजन में शामिल होती हैं। कपड़े से बनाई गई गुड़ियों को लेकर वे मंदिर के आसपास एकत्र होती हैं और फिर परंपरा के अनुसार उन्हें कूटती हैं। इस दौरान माहौल में उत्साह और लोक संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है।
यमुना किनारे दिखा लोक संस्कृति का रंग
मेरापुर में संगमेश्वर मंदिर के पास यमुना किनारे नाग पंचमी पर जुटी युवतियों ने जब गुड़िया कूटने की रस्म निभाई तो वहां अनोखा नजारा देखने को मिला। परंपरा से जुड़ी इस रस्म को देखने के लिए आसपास के लोग भी मौजूद रहे।
एक ओर जहां यमुना का प्राकृतिक वातावरण लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा था, वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी लोक परंपरा का निर्वहन लोगों के लिए कौतूहल का विषय बना रहा। खास बात यह रही कि आधुनिक दौर में भी युवतियों ने इस परंपरा में उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया।
इस आयोजन में केवल एक रस्म का निर्वहन ही नहीं हुआ, बल्कि बुंदेलखंड की लोक विरासत की एक झलक भी देखने को मिली। स्थानीय लोगों के लिए यह परंपरा उनकी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई है। इसलिए हर वर्ष नाग पंचमी के अवसर पर इसका इंतजार किया जाता है।
पीढ़ियों से चली आ रही है परंपरा
गुड़िया कूटने की यह परंपरा नई नहीं है। स्थानीय स्तर पर इसे लंबे समय से नाग पंचमी के अवसर पर निभाया जाता रहा है। बुजुर्गों के अनुसार इस रस्म को पिछली कई पीढ़ियों से देखा और निभाया जाता रहा है। परिवारों की महिलाएं और युवतियां अपनी नई पीढ़ी को भी इस लोक परंपरा से परिचित कराती हैं।
दरअसल, लोक परंपराओं की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि वे लिखित नियमों से अधिक सामाजिक और पारिवारिक स्मृतियों के जरिए आगे बढ़ती हैं। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को रीति-रिवाजों के बारे में बताती है और धीरे-धीरे वे परंपराएं स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बन जाती हैं।
मेरापुर की गुड़िया कूटने की रस्म भी इसी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानी जाती है। समय के साथ जीवनशैली और सामाजिक परिवेश में बदलाव जरूर आया है, लेकिन इस परंपरा से जुड़ा उत्साह अभी भी कायम है।
अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हैं लोक मान्यताएं
बुंदेलखंड में गुड़िया कूटने की रस्म को लेकर एक जैसी मान्यता नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग लोक विश्वासों के साथ जोड़ा जाता है। कहीं इसे बुराई को दूर करने का प्रतीक माना जाता है तो कहीं इसे अनिष्ट से बचाव और पारंपरिक मान्यताओं से जोड़कर देखा जाता है।
इसी वजह से इस परंपरा को केवल एक धार्मिक रस्म के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह बुंदेलखंड के ग्रामीण समाज की लोक आस्था, सामाजिक स्मृति और सांस्कृतिक परंपराओं का भी हिस्सा है।
हालांकि, इन मान्यताओं का आधार स्थानीय लोककथाओं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं में है। इनके पीछे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कथाएं और विश्वास सुनने को मिलते हैं। यही कारण है कि गुड़िया कूटने की रस्म बुंदेलखंड की लोक संस्कृति में एक अलग पहचान रखती है।
बदलते दौर में भी कायम है परंपरा
आज के दौर में मोबाइल, इंटरनेट और तेजी से बदलती जीवनशैली ने गांवों और कस्बों की पारंपरिक संस्कृति को भी प्रभावित किया है। इसके बावजूद बुंदेलखंड के कई हिस्सों में लोक परंपराएं अब भी पूरी आस्था और उत्साह के साथ निभाई जाती हैं।
मेरापुर में नाग पंचमी पर होने वाली गुड़िया कूटने की रस्म इसका उदाहरण है। युवतियों की भागीदारी यह बताती है कि नई पीढ़ी भी अपनी स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी हुई है।
ऐसे आयोजन केवल धार्मिक या सांस्कृतिक रस्म तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज के लोगों को एक साथ आने का अवसर भी देते हैं। त्योहार के बहाने परिवार और आसपास के लोग एकत्र होते हैं और अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत को याद करते हैं।
लोक परंपराओं को संरक्षित करने की जरूरत
बुंदेलखंड की पहचान केवल ऐतिहासिक धरोहरों और प्राकृतिक स्थलों से नहीं है, बल्कि यहां की लोक परंपराएं भी इसकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती हैं। नाग पंचमी पर मेरापुर में निभाई जाने वाली गुड़िया कूटने की रस्म इसी लोक विरासत की एक मिसाल है।
जरूरी है कि ऐसी परंपराओं को उनके सांस्कृतिक संदर्भ के साथ समझा जाए और आने वाली पीढ़ियों तक इनके बारे में जानकारी पहुंचाई जाए। इससे स्थानीय इतिहास और लोक संस्कृति को संरक्षित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, समय के साथ किसी भी परंपरा के स्वरूप में बदलाव आना स्वाभाविक है। फिर भी उसके मूल सांस्कृतिक महत्व को समझना और सकारात्मक रूप से आगे बढ़ाना जरूरी है।
मेरापुर में नाग पंचमी के अवसर पर युवतियों द्वारा निभाई गई यह परंपरा बताती है कि आधुनिकता के बीच भी बुंदेलखंड की मिट्टी से जुड़ी लोक संस्कृति अपनी पहचान बनाए हुए है। यमुना किनारे संगमेश्वर मंदिर के पास हुआ यह आयोजन स्थानीय लोगों के लिए केवल एक वार्षिक रस्म नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर भी है।
इस तरह नाग पंचमी पर गुड़िया कूटने की परंपरा बुंदेलखंड की समृद्ध लोक विरासत का हिस्सा बनकर आज भी जीवित है। पीढ़ियों से चली आ रही यह रस्म बदलते समय के बीच भी स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक परंपराओं की निरंतरता को दर्शाती है।

