बृजलाल का ‘दिमागी नक्सली’ पर बड़ा बयान, बोले- जंगल के नक्सलियों से ज्यादा खतरनाक हैं ऐसे लोग
Digital UP News Desk
लखनऊ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन के बाद ‘दिमागी नक्सली’ शब्द को लेकर देश की राजनीति में बहस तेज हो गई है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) और भाजपा के राज्यसभा सांसद बृजलाल ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ‘दिमागी नक्सली’ हथियार या गोलियां चलाने के बजाय अपने विचारों और प्रभाव के माध्यम से समाज को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। बृजलाल के मुताबिक, ऐसे लोग शहरों में अलग-अलग पेशों और सामाजिक भूमिकाओं में नजर आ सकते हैं और युवाओं को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं।
बृजलाल का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त को लाल किले से दिए गए स्वतंत्रता दिवस भाषण के बाद आया है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में सशस्त्र नक्सलवाद के कमजोर पड़ने का उल्लेख करते हुए वैचारिक स्तर पर सक्रिय ‘दिमागी नक्सलियों’ को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने ऐसे तत्वों को पहचानने और अलग-थलग करने की जरूरत बताई थी।
बृजलाल ने बताया, कौन हैं ‘दिमागी नक्सली’
राज्यसभा सांसद बृजलाल ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि वह ‘दिमागी नक्सलियों’ के बारे में बात करना चाहते हैं। उनके अनुसार, ऐसे लोग जंगलों या बीहड़ों में हथियार लेकर नहीं घूमते और न ही सीधे तौर पर हिंसक गतिविधियों में शामिल दिखाई देते हैं। इसके बजाय वे अपने विचारों, लेखों, चर्चाओं और सामाजिक प्रभाव के माध्यम से लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
बृजलाल ने कहा कि ऐसे लोगों की मौजूदगी प्रोफेसर, शिक्षक, एनजीओ संचालक, बुद्धिजीवी, कवि और लेखक जैसे विभिन्न क्षेत्रों में हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि ये लोग लेख लिखने, कॉन्फ्रेंस और सेमिनार आयोजित करने के माध्यम से खास तौर पर युवाओं के बीच अपनी विचारधारा पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी व्यक्ति का प्रोफेसर, शिक्षक, लेखक, कवि, बुद्धिजीवी या एनजीओ से जुड़ा होना अपने आप में नक्सली गतिविधि का प्रमाण नहीं है। बृजलाल ने अपने बयान में जिन लोगों को ‘दिमागी नक्सली’ कहा है, वह उनका राजनीतिक और वैचारिक आकलन है।
‘हथियार नहीं, विचारों के जरिए प्रभाव’
पूर्व DGP ने अपने बयान में ‘दिमागी नक्सलियों’ और जंगलों में सक्रिय सशस्त्र नक्सलियों के बीच अंतर बताया। उनका कहना है कि सशस्त्र नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बाद उनकी गतिविधियां काफी हद तक कमजोर हुई हैं, जबकि वैचारिक प्रभाव की चुनौती अलग रूप में सामने आती है।
बृजलाल के अनुसार, ‘दिमागी नक्सली’ हथियारों के बजाय विचारों और बौद्धिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं। उनका आरोप है कि ऐसे लोग युवाओं के बीच ऐसी विचारधारा पहुंचाने की कोशिश करते हैं, जो आगे चलकर हिंसक गतिविधियों की ओर ले जा सकती है।
उन्होंने कहा कि इसी वजह से समाज को वैचारिक स्तर पर भी सतर्क रहने की आवश्यकता है। उनके मुताबिक, युवाओं को किसी भी विचार को स्वीकार करने से पहले उसके उद्देश्य, तथ्यों और प्रभाव को समझना चाहिए।
लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर भी जताई चिंता
बृजलाल ने अपने वीडियो संदेश में लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका, सुरक्षा बलों और संविधान के प्रति लोगों में अविश्वास पैदा करने का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि कुछ वैचारिक समूह इन संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर लोगों के बीच नकारात्मक धारणा बनाने की कोशिश करते हैं।
उन्होंने दावा किया कि ऐसे तत्व युवाओं तक अपनी पहुंच बनाने का प्रयास करते हैं और उन्हें अपने प्रभाव में लेने की कोशिश कर सकते हैं। बृजलाल ने लोगों से अपील की कि किसी भी विचारधारा या संगठन का समर्थन करने से पहले उसके उद्देश्यों और गतिविधियों की जानकारी हासिल करना जरूरी है।
साथ ही, उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग नक्सल गतिविधियों का महिमामंडन करते हैं और उनके समर्थन में लेख या सामग्री तैयार करते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ तत्वों द्वारा ऐसे संगठनों के लिए फंड की व्यवस्था किए जाने की कोशिश की जाती है, जिससे देश में अस्थिरता का माहौल पैदा हो।
पीएम मोदी के बयान के बाद बढ़ी राजनीतिक बहस
प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विपक्षी नेताओं और कुछ संगठनों ने इस शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। वहीं, भाजपा और सरकार की ओर से इसे वैचारिक रूप से हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देने वाले तत्वों के संदर्भ में बताया गया है।
इसी राजनीतिक माहौल में बृजलाल का बयान सामने आया है। उन्होंने प्रधानमंत्री के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ वैचारिक स्तर पर हिंसा को बढ़ावा देने वाले प्रयासों पर भी नजर रखने की जरूरत है।
इस मुद्दे पर विपक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया है कि सरकार को असहमति और आलोचना को नक्सलवाद से जोड़ने से बचना चाहिए। वहीं, सरकार समर्थक पक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विचारधारा को बढ़ावा देने के बीच अंतर किया जाना जरूरी है। यही अंतर इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
युवाओं को लेकर बृजलाल ने किया सावधान
बृजलाल ने विशेष रूप से युवाओं को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि युवा किसी भी समाज की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति होते हैं और इसलिए उन्हें प्रभावित करने वाली विचारधाराओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
उनके अनुसार, युवाओं को सोशल मीडिया, लेखों, सेमिनारों और अन्य माध्यमों से मिलने वाली सूचनाओं की तथ्यात्मक जांच करनी चाहिए। किसी भी विचार को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करना चाहिए क्योंकि उसे कोई प्रभावशाली व्यक्ति या संस्था प्रस्तुत कर रही है।
दरअसल, डिजिटल दौर में युवाओं तक सूचनाएं तेजी से पहुंचती हैं। ऐसे में तथ्य और राय के बीच अंतर करना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसी संदर्भ में बृजलाल का कहना है कि वैचारिक प्रभाव के माध्यम से हिंसा या अराजकता को बढ़ावा देने वाले प्रयासों से समाज को सतर्क रहना चाहिए।
‘दिमागी नक्सली’ शब्द पर जारी है बहस
प्रधानमंत्री के बयान के बाद ‘दिमागी नक्सली’ शब्द सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ इसे नक्सली विचारधारा के वैचारिक समर्थन से जोड़कर देखा जा रहा है, जबकि दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल व्यापक रूप से नहीं किया जाना चाहिए।
ऐसे में इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि वैचारिक असहमति, सरकार की आलोचना और हिंसक विचारधारा के समर्थन के बीच स्पष्ट सीमा कैसे तय की जाए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारों की स्वतंत्रता के साथ-साथ हिंसा को बढ़ावा देने वाले प्रयासों पर कानून के तहत कार्रवाई की व्यवस्था भी मौजूद है।
बृजलाल ने अपने बयान में इसी संदर्भ में समाज और खास तौर पर युवाओं को सावधान रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना जरूरी है।
भाजपा सांसद बृजलाल
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन के बाद ‘दिमागी नक्सली’ शब्द पर शुरू हुई बहस अब राजनीतिक और वैचारिक चर्चा का विषय बन गई है। पूर्व DGP और भाजपा सांसद बृजलाल ने इस बहस को आगे बढ़ाते हुए दावा किया है कि वैचारिक प्रभाव के जरिए हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देने वाले तत्व सशस्त्र नक्सलियों से भी अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
हालांकि, इस विषय पर किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए आरोपों और वैचारिक मतभेदों के बीच स्पष्ट अंतर करना जरूरी है। किसी व्यक्ति के पेशे, लेखन या सामाजिक गतिविधियों के आधार पर उसे नक्सली कहना उचित नहीं माना जा सकता। इसके बजाय किसी संगठन या व्यक्ति की वास्तविक गतिविधियों, कानून और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही आकलन किया जाना चाहिए।
फिलहाल, बृजलाल के बयान ने प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सली’ वाले बयान को लेकर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श में कितना प्रभाव डालता है, इस पर सभी की नजर रहेगी।

