गोरखपुर में BJP को झटका, अस्मिता चंद ने थामा BSP का दामन, चिल्लूपार में बढ़ी सियासी हलचल
Digital UP News Desk
गोरखपुर: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल का दौर तेज होता नजर आ रहा है। इसी क्रम में गोरखपुर के चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र से जुड़ी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक खबर सामने आई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुकीं अस्मिता चंद ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सदस्यता ग्रहण कर ली है। अस्मिता चंद के इस फैसले ने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
खास बात यह है कि अस्मिता चंद के पति सीपी चंद भारतीय जनता पार्टी से विधान परिषद सदस्य हैं। ऐसे में उनका भाजपा छोड़कर बसपा में शामिल होना राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अस्मिता चंद पिछले करीब 22 वर्षों से भाजपा में सक्रिय थीं और लंबे समय तक संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाती रही हैं। वहीं, पिछले कुछ समय से उनके चिल्लूपार विधानसभा सीट से आगामी चुनाव लड़ने की संभावनाओं को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा चल रही थी।
बसपा की बैठक में ग्रहण की सदस्यता
अस्मिता चंद ने बृहस्पतिवार शाम बड़हलगंज स्थित एक मैरिज हॉल में आयोजित विधानसभा स्तरीय बसपा कार्यकर्ता बैठक के दौरान पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की। इस अवसर पर बसपा के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे।
बैठक में मुख्य अतिथि सांसद घनश्याम चंद खरवार रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता मंडल प्रभारी मदन राय ने की। विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों से पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने बैठक में हिस्सा लिया। इसी दौरान अस्मिता चंद ने बसपा में शामिल होने का ऐलान किया।
पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के बाद अस्मिता चंद ने कहा कि वह बहुजन समाज पार्टी की नीतियों और पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के विचारों से प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि वह पार्टी को मजबूत करने के लिए पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ काम करेंगी। साथ ही उन्होंने 2027 के विधानसभा चुनाव में मायावती को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के लिए पूरी ताकत से काम करने का संकल्प भी जताया।
उनके इस बयान के बाद चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक जानकार अब इसे आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देख रहे हैं।
22 साल तक भाजपा में सक्रिय रहीं अस्मिता चंद
अस्मिता चंद का भाजपा से पुराना राजनीतिक जुड़ाव रहा है। वह करीब 22 वर्षों तक पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय रहीं। संगठन में काम करने के दौरान उन्होंने महिला मोर्चा से जुड़ी जिम्मेदारियां भी संभालीं। वर्ष 2022 से वह भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी से जुड़ी रही थीं।
इसी वजह से उनका बसपा में जाना भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। खासकर तब, जब पिछले कुछ महीनों से उनके संभावित राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं चल रही थीं।
बताया जा रहा था कि अस्मिता चंद को आगामी विधानसभा चुनाव में चिल्लूपार से भाजपा का संभावित चेहरा माना जा सकता है। हालांकि, पार्टी की ओर से उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी। अब उनके बसपा में शामिल होने के बाद उन सभी अटकलों पर फिलहाल विराम लग गया है।
इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगा है कि अस्मिता चंद के बसपा में आने से चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की चुनावी रणनीति को कितना फायदा मिल सकता है।
राजनीतिक परिवार से आता है अस्मिता चंद का परिवार
अस्मिता चंद पूर्वांचल के एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से जुड़ी हैं। उनके पति सीपी चंद भी लंबे समय से राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। सीपी चंद वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी से जुड़े थे और इसी दौरान वह विधान परिषद सदस्य भी रहे।
इसके बाद वर्ष 2021 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। वर्ष 2022 में भाजपा के टिकट पर गोरखपुर-महराजगंज स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद के लिए चुने गए।
अस्मिता चंद के ससुर मार्कण्डेय चंद भी क्षेत्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। वह धुरियापार क्षेत्र से चार बार विधायक रहे। इसके अलावा वर्ष 1990 से 2000 के बीच उन्होंने प्रदेश सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली थी। अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता था। वर्ष 2014 में उनका निधन हो गया।
इस तरह अस्मिता चंद का परिवार लंबे समय से पूर्वांचल की राजनीति में सक्रिय रहा है। यही वजह है कि उनके राजनीतिक फैसले का असर चिल्लूपार की राजनीति में देखने को मिल सकता है।
चिल्लूपार में पहले भी रहा है बसपा का प्रभाव
चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी का पुराना प्रभाव रहा है। क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो यहां कई प्रमुख नेताओं ने बसपा के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया है।
पूर्व विधायक पंडित हरिशंकर तिवारी भी बसपा के टिकट पर चिल्लूपार से चुनाव जीत चुके हैं। वह दो बार इस विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इसके अलावा उनके पुत्र विनय शंकर तिवारी ने भी बसपा के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया था।
वहीं, वर्तमान भाजपा विधायक राजेश तिवारी भी अपने राजनीतिक सफर के शुरुआती दौर में बसपा के टिकट पर चिल्लूपार से विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में देखा जाए तो चिल्लूपार में बसपा की राजनीतिक जड़ें काफी पुरानी रही हैं।
अब अस्मिता चंद के बसपा में शामिल होने के बाद पार्टी इस पुराने प्रभाव को दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक चुनावी असर 2027 के विधानसभा चुनाव में ही स्पष्ट होगा।
2027 से पहले बदलेगा चिल्लूपार का राजनीतिक समीकरण?
उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। ऐसे में राजनीतिक दल अभी से संगठन को मजबूत करने और संभावित उम्मीदवारों की जमीन तैयार करने में जुटे हैं। चिल्लूपार भी पूर्वांचल की उन विधानसभा सीटों में शामिल है, जहां चुनावी मुकाबला हमेशा चर्चा में रहा है।
अस्मिता चंद के बसपा में आने से पार्टी को एक ऐसा चेहरा मिला है, जो लंबे समय तक भाजपा संगठन से जुड़ा रहा है और क्षेत्र की राजनीति से परिचित है। दूसरी ओर, उनके पति का भाजपा से मौजूदा राजनीतिक जुड़ाव इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक चर्चा में ला रहा है।
हालांकि, अस्मिता चंद के बसपा में शामिल होने को लेकर यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे किसी पार्टी को तत्काल चुनावी लाभ या नुकसान होगा। चुनावी राजनीति में स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, जातीय और सामाजिक समीकरण तथा मतदाताओं के रुझान जैसे कई कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
फिलहाल इतना जरूर है कि अस्मिता चंद के बसपा में जाने से चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भाजपा, बसपा और अन्य दलों के स्थानीय नेताओं की रणनीति पर भी अब निगाहें रहेंगी।
भाजपा के लिए चुनौती, बसपा के लिए अवसर
अस्मिता चंद का दल बदलना भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर एक राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। करीब दो दशक से अधिक समय तक पार्टी में सक्रिय रहने के कारण क्षेत्र में उनके समर्थकों और राजनीतिक संपर्कों का आधार होने की संभावना है।
वहीं, बसपा के लिए यह कदम संगठन को मजबूत करने का अवसर बन सकता है। पार्टी यदि अस्मिता चंद के राजनीतिक अनुभव और स्थानीय संपर्कों का प्रभावी इस्तेमाल करती है, तो 2027 के चुनाव में चिल्लूपार सीट पर मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है।
फिलहाल अस्मिता चंद ने बसपा की नीतियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है और मायावती को दोबारा उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनाने के लक्ष्य के साथ काम करने की बात कही है। अब देखना होगा कि आने वाले महीनों में चिल्लूपार की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है और 2027 के चुनाव से पहले कौन-कौन से नए राजनीतिक समीकरण आकार लेते हैं।

