नीति आयोग की रिपोर्ट: ये 4 सेक्टर भारत को बना सकते हैं ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब, 8 और क्षेत्रों पर आएगी रिपोर्ट
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में नीति आयोग ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है। “Key Sectors to Position India as a Global Manufacturing Hub” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में उन क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिनमें भारत के पास घरेलू उत्पादन बढ़ाने, मूल्यवर्धन करने, रोजगार के अवसर पैदा करने और वैश्विक निर्यात में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की बड़ी क्षमता है। रिपोर्ट के इस संस्करण में रसायन, वस्त्र, दूरसंचार एवं नेटवर्किंग उपकरण और सौर फोटोवोल्टिक (PV) विनिर्माण को उच्च क्षमता वाले चार प्रमुख क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया है।
नीति आयोग का यह अध्ययन केवल मौजूदा स्थिति का आकलन नहीं करता, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए इन क्षेत्रों के विकास के लिए रणनीतिक सुझाव और आगे का रोडमैप भी प्रस्तुत करता है। इसके बाद 8 अन्य क्षेत्रों पर भी रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी।
वैश्विक विनिर्माण में भारत की भूमिका बढ़ाने की तैयारी
रिपोर्ट में भारत के विनिर्माण क्षेत्र का मूल्यांकन वैश्विक रुझानों, बाजार की संभावनाओं और क्षेत्रीय विकास के अवसरों के आधार पर किया गया है। इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि किसी क्षेत्र में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कितनी मजबूत है और उसे बेहतर बनाने के लिए किन क्षेत्रों में हस्तक्षेप की जरूरत है।
इस मूल्यांकन में बाजार क्षमता, बुनियादी ढांचे की तैयारी, नीतिगत समर्थन, कच्चे माल की उपलब्धता, तकनीकी क्षमता, रोजगार की संभावनाएं और वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारत की मौजूदा स्थिति जैसे महत्वपूर्ण मानकों को शामिल किया गया है।
दरअसल, भारत सरकार लंबे समय से देश में विनिर्माण को बढ़ावा देने, आयात पर निर्भरता कम करने और निर्यात क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है। ऐसे में नीति आयोग की यह रिपोर्ट उद्योग और सरकार के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने में उपयोगी आधार उपलब्ध करा सकती है।
चार चरणों में तैयार किया गया अध्ययन
नीति आयोग ने इस अध्ययन को चार प्रमुख चरणों में तैयार किया है। पहले चरण में घरेलू और वैश्विक बाजार के आकार तथा भविष्य की विकास संभावनाओं के आधार पर उन क्षेत्रों की पहचान की गई, जिनमें अपेक्षाकृत अधिक आकर्षण और विकास क्षमता है।
इसके बाद दूसरे चरण में चयनित क्षेत्रों का व्यापक मूल्यांकन किया गया। इसमें बाजार क्षमता, प्रतिस्पर्धात्मकता और रणनीतिक महत्व को अलग-अलग स्तरों पर परखा गया।
तीसरे चरण में दुनिया के अग्रणी विनिर्माण देशों की सर्वोत्तम प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि दूसरे देशों ने संबंधित क्षेत्रों में किस प्रकार नीतिगत समर्थन, तकनीक, निवेश और औद्योगिक ढांचे का इस्तेमाल करके वैश्विक प्रतिस्पर्धा हासिल की।
अंततः चौथे चरण में क्षेत्र-विशिष्ट और कार्रवाई योग्य सुझाव तैयार किए गए। इन सिफारिशों के जरिए भारत की घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने, मूल्यवर्धन बढ़ाने और निर्यात-उन्मुख विनिर्माण को गति देने का रोडमैप तैयार किया गया है।
रसायन उद्योग में घरेलू मूल्यवर्धन की बड़ी संभावना
रिपोर्ट में रसायन क्षेत्र को भारत के लिए महत्वपूर्ण अवसर वाला क्षेत्र बताया गया है। घरेलू रसायन उद्योग मुख्य रूप से तीन बड़े हिस्सों से संचालित होता है—पेट्रोकेमिकल्स एवं कार्बनिक रसायन, विशिष्ट रसायन और अकार्बनिक रसायन।
इनमें पेट्रोकेमिकल्स और कार्बनिक रसायन का हिस्सा काफी बड़ा है। इसमें पॉलिमर, सिंथेटिक फाइबर, परफॉर्मेंस प्लास्टिक, बिल्डिंग ब्लॉक, इंटरमीडिएट और अंतिम उत्पाद शामिल हैं।
नीति आयोग के अनुसार, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और उपलब्ध कच्चे माल का बेहतर इस्तेमाल करके भारत इस क्षेत्र में घरेलू मूल्यवर्धन को काफी बढ़ा सकता है। इसके लिए घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करने, प्रतिस्पर्धात्मकता में निवेश करने और मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) का रणनीतिक उपयोग करने पर जोर दिया गया है।
इससे एक ओर आयात पर निर्भरता कम हो सकती है, वहीं दूसरी ओर घरेलू उत्पादन और निर्यात क्षमता को भी मजबूती मिल सकती है।
वस्त्र उद्योग भारत की बड़ी ताकत
वस्त्र और परिधान उद्योग भारत के प्रमुख विनिर्माण क्षेत्रों में शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, यह क्षेत्र देश की GDP में लगभग 2 प्रतिशत, विनिर्माण GVA में करीब 11 प्रतिशत और माल निर्यात में लगभग 9 प्रतिशत का योगदान देता है।
इसके अलावा कृषि के बाद वस्त्र क्षेत्र देश में सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में शामिल है। यह क्षेत्र 4 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है और इसमें बड़ी संख्या में MSME इकाइयां सक्रिय हैं।
वित्त वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 37.7 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के वस्त्र उत्पादों का निर्यात किया। वैश्विक वस्त्र एवं परिधान निर्यात में भारत की हिस्सेदारी करीब 4.1 प्रतिशत रही, जिससे भारत दुनिया का छठा सबसे बड़ा वस्त्र निर्यातक बना।
हालांकि, वैश्विक प्रतिस्पर्धा को और मजबूत करने के लिए कच्चे माल की उपलब्धता, बेहतर बुनियादी ढांचे और व्यापार एकीकरण पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके साथ ही कौशल विकास और नई तकनीक को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट में विशेष रूप से तकनीकी वस्त्र, MMF आधारित उत्पाद, टिकाऊ वस्त्र और प्रीमियम भारतीय बुनाई जैसे क्षेत्रों में विकास की संभावनाओं को रेखांकित किया गया है।
दूरसंचार और नेटवर्किंग उपकरण में बड़ा अवसर
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार बाजार है। देश में 1.2 अरब से अधिक ग्राहक, लगभग 85 प्रतिशत दूरसंचार पहुंच और करीब 75 प्रतिशत इंटरनेट उपयोग का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।
इस विशाल घरेलू बाजार को देखते हुए दूरसंचार और नेटवर्किंग उपकरण विनिर्माण में भारत के लिए बड़ा अवसर मौजूद है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीयकरण बढ़ाकर और घरेलू घटक विनिर्माण को मजबूत करके भारत इस क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकता है।
इसके लिए संयुक्त उपक्रमों, तकनीकी हस्तांतरण और एकीकृत औद्योगिक क्लस्टरों को प्रोत्साहित करने की जरूरत बताई गई है। साथ ही उच्च क्षमता वाले निर्यात क्षेत्रों का विस्तार, परीक्षण एवं प्रमाणन सुविधाओं को मजबूत करना और कुशल मानव संसाधन तैयार करना भी जरूरी माना गया है।
रिपोर्ट में राष्ट्रीय दूरसंचार नीति 2025 (NTP-25) के लक्ष्यों का भी उल्लेख है। इसके तहत 2030 तक दूरसंचार क्षेत्र के GDP में योगदान को दोगुना करने, उत्पादों और सेवाओं के निर्यात को दोगुना करने तथा 10 लाख नए रोजगार पैदा करने जैसे लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
सौर पीवी विनिर्माण से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा
भारत के लिए सौर फोटोवोल्टिक विनिर्माण भी भविष्य का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2025 तक भारत में 106 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित हो चुकी थी। वर्ष 2030 तक 280 गीगावाट क्षमता के लक्ष्य को पूरा करने के लिए लगभग 174 गीगावाट अतिरिक्त क्षमता जोड़ने की आवश्यकता होगी।
देश का घरेलू सौर ऊर्जा बाजार भी तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 से वित्त वर्ष 2030 के बीच इस क्षेत्र में 17 से 20 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर देखी जा सकती है। बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों, रूफटॉप सोलर, ओपन-मार्केट परियोजनाओं और ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़ी मांग इस वृद्धि को समर्थन दे सकती है।
ऐसे में भारत के लिए केवल सौर ऊर्जा स्थापित करना ही नहीं, बल्कि सौर उपकरणों का घरेलू स्तर पर निर्माण करना भी महत्वपूर्ण है। नीति आयोग ने अपस्ट्रीम विनिर्माण क्षमता मजबूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने की जरूरत बताई है।
इसके लिए तकनीकी साझेदारी, संयुक्त उपक्रम, अनुसंधान एवं विकास, प्रदर्शन-आधारित सहायता और एकीकृत स्वच्छ प्रौद्योगिकी क्लस्टरों को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है। साथ ही उद्योग की जरूरत के अनुसार कौशल विकास और अंतरराष्ट्रीय व्यापार साझेदारी को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।
आगे 8 और क्षेत्रों पर आएगी रिपोर्ट
नीति आयोग की यह रिपोर्ट भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है। रिपोर्ट का उद्देश्य चुनिंदा क्षेत्रों को उनकी मौजूदा चुनौतियों से निपटने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए दिशा देना है।
फिलहाल चार क्षेत्रों पर विस्तृत अध्ययन सामने आया है। इसके बाद 8 अन्य उच्च क्षमता वाले क्षेत्रों पर भी रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी। इससे भारत के लिए एक व्यापक विनिर्माण रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।
नीति आयोग का अध्ययन बताता है कि भारत के पास रसायन, वस्त्र, दूरसंचार उपकरण और सौर पीवी जैसे क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने की पर्याप्त क्षमता है। हालांकि, इसके लिए तकनीक, बुनियादी ढांचे, कौशल, कच्चे माल, निवेश और नीतिगत समर्थन को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।
यदि उद्योग और सरकार समन्वित तरीके से इन चुनौतियों का समाधान करते हैं, तो भारत घरेलू बाजार की मांग को पूरा करने के साथ-साथ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है। इस तरह नीति आयोग की रिपोर्ट भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में रणनीतिक आधार प्रदान कर सकती है।

