मिशन 2027: कांग्रेस ने वेस्ट यूपी में बिछाई सियासी बिसात, दलित-जाट समीकरण से साधने की तैयारी
Digital UP News Desk
मेरठ: उत्तर प्रदेश में मिशन 2027 को लेकर कांग्रेस ने अपनी संगठनात्मक तैयारियों को तेज कर दिया है। करीब पांच दशक से प्रदेश की सत्ता से दूर कांग्रेस अब एक बार फिर यूपी की सियासत में मजबूत वापसी की कोशिश कर रही है। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने संगठन में बदलाव के बाद अपने राष्ट्रीय सचिवों यानी यूपी के सह प्रभारियों को अलग-अलग जोन की जिम्मेदारी सौंप दी है।
कांग्रेस के इस नए जोनल बंटवारे में सामाजिक और जातीय समीकरणों को भी ध्यान में रखा गया है। खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी ने दलित और जाट चेहरों को जिम्मेदारी देकर क्षेत्र के प्रमुख सामाजिक समूहों तक अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करने की कोशिश की है। सियासी जानकार इसे कांग्रेस की 2027 की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा मान रहे हैं।
छह जोन में बांटा गया उत्तर प्रदेश
कांग्रेस ने संगठनात्मक कामकाज को बेहतर बनाने के लिए उत्तर प्रदेश को छह जोन में बांटा है। इनमें वेस्ट, ब्रज, अवध, प्रयाग, बुंदेलखंड और पूर्वांचल जोन शामिल हैं। प्रत्येक जोन की जिम्मेदारी पार्टी के एक राष्ट्रीय सचिव को दी गई है।
वेस्ट जोन की जिम्मेदारी संजीव आर्य को सौंपी गई है। उनके अंतर्गत मेरठ, सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल के कुल 14 जिले आएंगे। इनमें सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बुलंदशहर, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, हापुड़, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा, बिजनौर और संभल शामिल हैं।
वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्से को ब्रज जोन में रखा गया है। ब्रज जोन की जिम्मेदारी कुणाल चौधरी को दी गई है। उनके अधीन आगरा, बरेली और अलीगढ़ मंडल से जुड़े 13 जिले होंगे। इनमें मथुरा, आगरा, फिरोजाबाद, एटा, मैनपुरी, कासगंज, अलीगढ़, हाथरस, बदायूं, बरेली, शाहजहांपुर, पीलीभीत और फर्रुखाबाद शामिल हैं।
इसके अलावा कांग्रेस ने अवध जोन की जिम्मेदारी मोहम्मद हन्नान, प्रयाग जोन की जिम्मेदारी वरुण चौधरी, बुंदेलखंड जोन की जिम्मेदारी जंदीश चंद्र जांगिड़ और पूर्वांचल जोन की जिम्मेदारी अभिषेक दत्त को दी है।
पांच दशक बाद सत्ता में वापसी की कोशिश
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर है। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस ने कभी अकेले तो कभी गठबंधन के सहारे चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। अब पार्टी की कोशिश गठबंधन की राजनीति के साथ-साथ अपने संगठन को भी मजबूत करने की है।
फिलहाल समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, कांग्रेस नेतृत्व यह भी समझ रहा है कि केवल गठबंधन के सहारे प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए पार्टी ने संगठन के स्तर पर बड़े बदलाव शुरू किए हैं।
इसी क्रम में सबसे पहले उत्तर प्रदेश के प्रभारी के तौर पर दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद प्रदेश के सह प्रभारियों में भी बदलाव किया गया। लंबे समय से यूपी में जिम्मेदारी संभाल रहे कई नेताओं को हटाकर नए चेहरों को मौका दिया गया।
अब सह प्रभारियों को अलग-अलग जोन की जिम्मेदारी देने के साथ कांग्रेस ने अपनी संगठनात्मक रणनीति को और स्पष्ट कर दिया है।
वेस्ट यूपी पर क्यों है कांग्रेस की नजर?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां जाट, दलित, मुस्लिम और अन्य सामाजिक समूह चुनावी समीकरणों को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस ने वेस्ट जोन की जिम्मेदारी संजीव आर्य को देकर दलित समीकरण पर खास जोर दिया है। संजीव आर्य उत्तराखंड से आते हैं। उत्तराखंड की सीमा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों से जुड़ती है। इसलिए पार्टी को उम्मीद है कि उन्हें इस क्षेत्र की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को समझने में मदद मिलेगी।
संजीव आर्य राजनीतिक परिवार से भी आते हैं। उनके पिता यशपाल आर्य उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे हैं और मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। संजीव आर्य खुद भी विधायक रह चुके हैं।
इस पृष्ठभूमि को देखते हुए कांग्रेस को उनसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन को मजबूत करने की उम्मीद है।
दलित वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का अपना मजबूत इतिहास रहा है। एक दौर में बहुजन समाज पार्टी का इस क्षेत्र में खासा प्रभाव रहा। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में दलित राजनीति के क्षेत्र में नए राजनीतिक विकल्प भी सामने आए हैं।
आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस का दलित चेहरे को महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारी देना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पार्टी की कोशिश संभवतः दलित मतदाताओं के बीच अपनी पुरानी पकड़ को फिर से मजबूत करने की है। इसके साथ ही कांग्रेस उन मतदाताओं तक भी पहुंच बनाना चाहती है जो मौजूदा समय में अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ जुड़े हुए हैं।
हालांकि, यह रणनीति जमीन पर कितना असर डालती है, इसका फैसला 2027 के चुनावी माहौल में ही होगा।
जाट वोट पर भी कांग्रेस की नजर
कांग्रेस ने केवल दलित समीकरण को ध्यान में नहीं रखा है। ब्रज जोन की जिम्मेदारी कुणाल चौधरी को देकर पार्टी ने जाट समाज के बीच भी अपनी पहुंच बढ़ाने का संकेत दिया है।
कुणाल चौधरी जाट समुदाय से आते हैं और मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। संगठन में उनकी सक्रियता और राजनीतिक अनुभव को देखते हुए पार्टी ने उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़े महत्वपूर्ण हिस्से की जिम्मेदारी दी है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जाट राजनीति का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। यहां राष्ट्रीय लोकदल का लंबे समय से प्रभाव रहा है। ऐसे में कांग्रेस द्वारा जाट चेहरे को जिम्मेदारी दिए जाने को आरएलडी के प्रभाव क्षेत्र में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
दरअसल, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच संभावित गठबंधन की स्थिति में पश्चिमी यूपी का चुनावी समीकरण और भी दिलचस्प हो सकता है। यदि कांग्रेस संगठन के स्तर पर जाट और दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करती है, तो गठबंधन को इसका फायदा मिल सकता है।
मुस्लिम वोट के साथ गठबंधन का समीकरण
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। क्षेत्र के कई विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में रहती है।
कांग्रेस को उम्मीद है कि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की स्थिति में मुस्लिम मतदाताओं के बीच विपक्षी गठबंधन को फायदा मिल सकता है। वहीं, कांग्रेस की अपनी कोशिश जाट और दलित मतदाताओं के बीच संगठन को मजबूत करने की है।
इस तरह देखा जाए तो पार्टी सामाजिक समीकरण के कई स्तरों पर एक साथ काम करने की तैयारी कर रही है। हालांकि, चुनावी राजनीति में समीकरण तभी वोट में बदलते हैं, जब संगठन बूथ स्तर तक मजबूत हो। इसलिए कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने नए संगठनात्मक ढांचे को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करने की होगी।
2027 के लिए संगठन मजबूत करना बड़ी चुनौती
कांग्रेस की नई रणनीति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पार्टी केवल चुनाव के समय सक्रिय होने के बजाय पहले से संगठन को तैयार करने पर जोर दे रही है। जोन स्तर पर प्रभारियों की नियुक्ति इसी दिशा में एक कदम है।
अब इन नेताओं के सामने जिलों में संगठन को सक्रिय करना, स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल बनाना और बूथ स्तर पर पार्टी की मौजूदगी मजबूत करना चुनौती होगी।
इसके अलावा कांग्रेस को स्थानीय स्तर पर गुटबाजी और पुराने संगठनात्मक मतभेदों से भी निपटना होगा। यदि पार्टी इन चुनौतियों को पार कर लेती है तो 2027 के विधानसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन पहले की तुलना में बेहतर हो सकता है।

