जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा: एनबीए ने 33 राज्यों को बांटे 3.79 करोड़ रुपये
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: भारत के जैविक संसाधनों के संरक्षण और उनके व्यावसायिक उपयोग से मिलने वाले लाभों को स्थानीय स्तर तक पहुंचाने की दिशा में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
एनबीए ने 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों (एसबीबी) और केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों (यूटीबीसी), आईसीएआर-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) तथा हरियाणा राज्य जैव विविधता बोर्ड के माध्यम से हिसार बोवाइन स्पर्म स्टेशन एवं अनुसंधान केंद्र को पहुंच और लाभ साझाकरण (एबीएस) के तहत करीब 3.79 करोड़ रुपये वितरित किए हैं।
इस राशि का संबंध भारत की कृषि जैव विविधता और पशु आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से है। इसमें टमाटर, मिर्च, बैंगन, फूलगोभी, तरबूज, करेला, लौकी, भिंडी और सरसों जैसी फसलों के आनुवंशिक संसाधनों के साथ-साथ साहीवाल नस्ल के मवेशियों के डीप-फ्रोजन स्पर्म को भी शामिल किया गया है।
एनबीए के इस कदम का उद्देश्य जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभ को जैव विविधता संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और स्थानीय समुदायों के कल्याण से जोड़ना है।
क्या है पहुंच और लाभ साझाकरण यानी एबीएस?
पहुंच और लाभ साझाकरण (Access and Benefit Sharing-ABS) ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के उपयोग से प्राप्त लाभों को उचित तरीके से साझा करने का प्रावधान है।
भारत में यह व्यवस्था जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत लागू है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नागोया प्रोटोकॉल की भावना के अनुरूप है। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के जैविक संसाधनों का उपयोग करने वाले संस्थानों या कंपनियों से मिलने वाला लाभ केवल व्यावसायिक स्तर तक सीमित न रहे, बल्कि जैव विविधता संरक्षण और संबंधित समुदायों तक भी पहुंचे।
इसी व्यवस्था के तहत एनबीए ने कृषि फसलों और पशु आनुवंशिक संसाधनों से संबंधित एबीएस राशि का वितरण किया है।
सब्जियों के आनुवंशिक संसाधनों से मिला एबीएस
एनबीए के अनुसार, विभिन्न कंपनियों ने अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग के लिए भारत के कृषि आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच प्राप्त की। इनमें बायर साइंस एंड इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड, एचएम क्लॉज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और एडवांटा एंटरप्राइजेज लिमिटेड जैसी कंपनियां शामिल हैं।
फूलगोभी के बीजों की किस्मों और संकरों के लिए कुल 26.98 लाख रुपये की एबीएस राशि 30 एसबीबी/यूटीबीसी को जारी की गई। इसी तरह तरबूज के बीजों के लिए 24.32 लाख रुपये 25 एसबीबी/यूटीबीसी को दिए गए।
टमाटर की किस्मों और संकरों से संबंधित एबीएस के तहत 86.56 लाख रुपये 31 एसबीबी/यूटीबीसी को प्राप्त हुए। वहीं, मिर्च की किस्मों और संकरों के लिए 83.76 लाख रुपये 32 एसबीबी/यूटीबीसी को वितरित किए गए।
बैंगन के बीजों और संकरों के लिए 7.18 लाख रुपये 31 एसबीबी/यूटीबीसी को जारी किए गए। इसके अलावा, करेला, लौकी, बैंगन, फूलगोभी, हरी मिर्च, भिंडी और टमाटर के जर्मप्लाज्म से संबंधित उपयोग के लिए 148 लाख रुपये की राशि 31 एसबीबी/यूटीबीसी को दी गई।
सरसों और साहीवाल मवेशियों के संसाधन भी शामिल
एबीएस व्यवस्था के तहत केवल सब्जियों और फल फसलों को ही शामिल नहीं किया गया है। सरसों की किस्मों के उपयोग से संबंधित 0.57 लाख रुपये आईसीएआर-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर), नई दिल्ली को जारी किए गए।
इसके साथ ही साहीवाल मवेशियों के स्पर्म तक पहुंच से संबंधित 0.98 लाख रुपये की राशि हिसार बोवाइन स्पर्म स्टेशन एवं अनुसंधान केंद्र को दी गई। यह राशि हरियाणा राज्य जैव विविधता बोर्ड के माध्यम से पहुंचाई गई।
साहीवाल भारत की महत्वपूर्ण देशी पशु नस्लों में शामिल है। ऐसे में इसके आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त लाभ को संरक्षण और अनुसंधान से जोड़ना पशु जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
मध्य प्रदेश को सबसे अधिक एबीएस राशि
एनबीए की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, संबंधित फसलों की खेती में योगदान के आधार पर विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच एबीएस राशि का आनुपातिक वितरण किया गया।
इसमें मध्य प्रदेश को सबसे अधिक 46.93 लाख रुपये जारी किए गए। इसके बाद पश्चिम बंगाल को 44.76 लाख रुपये, ओडिशा को 44.08 लाख रुपये और गुजरात को 34.76 लाख रुपये मिले।
आंध्र प्रदेश को 29.21 लाख रुपये और बिहार को 29.20 लाख रुपये की राशि जारी की गई। वहीं, कर्नाटक को 21.34 लाख रुपये, छत्तीसगढ़ को 18.49 लाख रुपये, तमिलनाडु को 16.57 लाख रुपये और उत्तर प्रदेश को 16.24 लाख रुपये मिले।
महाराष्ट्र को 16.15 लाख रुपये, तेलंगाना को 9.24 लाख रुपये, हरियाणा को 8.76 लाख रुपये, असम को 8.49 लाख रुपये और झारखंड को 8.14 लाख रुपये जारी किए गए।
इसके अलावा पंजाब को 7.41 लाख रुपये, राजस्थान को 5.17 लाख रुपये और अन्य लाभार्थियों को कुल 13.70 लाख रुपये की राशि मिली।
राशि का इस्तेमाल जैव विविधता संरक्षण में होगा
एबीएस के तहत मिलने वाली राशि का इस्तेमाल केवल सामान्य प्रशासनिक गतिविधियों में नहीं किया जाना है। लाभार्थी राज्य जैव विविधता बोर्डों और संबंधित संस्थाओं को इन निधियों का उपयोग जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हित से जुड़ी गतिविधियों में करना होगा।
इनमें जन जैव विविधता रजिस्टरों (People’s Biodiversity Registers) की तैयारी और उन्हें अद्यतन करना, जैव विविधता का इन-सीटू और एक्स-सीटू संरक्षण, जैव विविधता विरासत स्थलों को मजबूत करना तथा जैव विविधता प्रबंधन समितियों की क्षमता बढ़ाना शामिल है।
इसके अलावा, स्थानीय समुदायों के सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़ी गतिविधियों पर भी इन निधियों का उपयोग किया जा सकता है। इस तरह व्यावसायिक उपयोग से मिलने वाले लाभ को वापस संरक्षण और समुदायों तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत होती है।
बाजार और मध्यस्थों के कारण मूल स्रोत की पहचान चुनौतीपूर्ण
एनबीए के अनुसार, कुछ मामलों में कंपनियों ने बाजारों, व्यापारियों या मध्यस्थों के माध्यम से जैविक संसाधनों तक पहुंच बनाई थी। ऐसे मामलों में जैविक संसाधन के मूल स्रोत की पहचान करना संभव नहीं हो सका।
इस स्थिति में एनबीए ने एक विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की गई और प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित लाभ-साझाकरण पद्धति को अपनाया। संबंधित फसलों की खेती वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एबीएस राशि का वितरण खेती क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों के आधार पर आनुपातिक रूप से किया गया।
इस व्यवस्था का उद्देश्य लाभों के वितरण को अधिक व्यवस्थित और संसाधन की उपलब्धता से संबंधित बनाना है।
वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों से जुड़ी पहल
एनबीए की यह पहल कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे के लक्ष्यों के साथ भी जुड़ी है। विशेष रूप से आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त लाभों के निष्पक्ष और समान वितरण तथा आनुवंशिक विविधता के संरक्षण से जुड़े लक्ष्यों को इससे समर्थन मिलने की उम्मीद है।
इसके अलावा, यह पहल सतत विकास लक्ष्यों यानी एसडीजी-2 (शून्य भूख), एसडीजी-12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन), एसडीजी-15 (भूमि पर जीवन) और एसडीजी-17 (लक्ष्यों के लिए साझेदारी) की दिशा में भी योगदान करती है।
कृषि जैव विविधता का संरक्षण खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि के लिए भी महत्वपूर्ण है। विभिन्न फसलों की देशी किस्मों और आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण भविष्य में बदलती जलवायु और कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप नई किस्मों के विकास में उपयोगी हो सकता है।
अब तक 166 करोड़ रुपये से अधिक का वितरण
एनबीए के अनुसार, एबीएस व्यवस्था के तहत अब तक 166 करोड़ रुपये से अधिक की राशि वितरित की जा चुकी है। यह राशि जैव विविधता संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और जैविक संसाधनों पर निर्भर समुदायों की आजीविका के बीच संबंध को मजबूत करने की दिशा में उपयोग की जा रही है।
एबीएस के तहत करीब 3.79 करोड़ रुपये का यह वितरण भारत के जैविक संसाधनों के जिम्मेदार और न्यायसंगत उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इससे एक ओर कृषि और पशु आनुवंशिक संसाधनों के अनुसंधान एवं व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा मिलता है, वहीं दूसरी ओर उस उपयोग से मिलने वाले लाभ को जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों तक वापस पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत होती है।
आने वाले समय में ऐसी व्यवस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाना भारत की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ टिकाऊ कृषि, वैज्ञानिक अनुसंधान और ग्रामीण समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

