विश्व स्तनपान सप्ताह: जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज कानपुर में नर्सिंग स्टाफ को दिया गया स्तनपान का विशेष प्रशिक्षण

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रिपोर्ट- हरिशंकर शर्मा 

कानपुरः विश्व स्तनपान सप्ताह के अवसर पर जी.एस.वी.एम. मेडिकल कॉलेज, कानपुर के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग द्वारा पैरामेडिकल एवं नर्सिंग स्टाफ के लिए Breastfeeding Training Module का सफल आयोजन किया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य स्वास्थ्यकर्मियों को स्तनपान से जुड़ी नवीनतम वैज्ञानिक जानकारी, सही तकनीक तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं से अवगत कराना था, ताकि वे अस्पताल आने वाली माताओं को प्रभावी और प्रमाणिक परामर्श दे सकें।

कार्यक्रम में लगभग 60 नर्सिंग स्टाफ ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञ चिकित्सकों ने स्तनपान के महत्व, सही तकनीक, नवजात शिशु के पोषण, माताओं को आने वाली चुनौतियों तथा उनके समाधान पर विस्तार से जानकारी साझा की। इसके साथ ही प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए गए।

मां का दूध नवजात के लिए सर्वोत्तम आहार

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सीमा द्विवेदी ने कहा कि मां का दूध नवजात शिशु के लिए पहला, संपूर्ण और सर्वोत्तम आहार है। उन्होंने बताया कि जन्म के पहले एक घंटे के भीतर स्तनपान प्रारंभ करना शिशु के जीवन की मजबूत नींव रखने के समान है।

उन्होंने आगे कहा कि जन्म से छह माह तक केवल मां का दूध (Exclusive Breastfeeding) देना चाहिए। इसके बाद शिशु को पूरक आहार शुरू करते हुए दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखना चाहिए। इससे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, संक्रमण का खतरा कम होता है तथा उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है।

वैज्ञानिक आधार पर समझाए स्तनपान के लाभ

कार्यक्रम में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सौरव त्रिपाठी ने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर बताया कि स्तनपान केवल बच्चे के लिए ही नहीं, बल्कि मां के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।

उन्होंने कहा कि नियमित स्तनपान कराने से मां में प्रसवोत्तर रक्तस्राव कम होता है, कई गंभीर बीमारियों का खतरा घटता है तथा मां और बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव भी मजबूत होता है। वहीं, बच्चे को प्राकृतिक प्रतिरक्षा, बेहतर पोषण और स्वस्थ विकास प्राप्त होता है।

सही तकनीक से मिलते हैं बेहतर परिणाम

डॉ. शैली अग्रवाल ने स्तनपान की सही तकनीक का व्यावहारिक प्रदर्शन करते हुए बताया कि शिशु को सही स्थिति (Positioning) में रखना तथा सही तरीके से स्तन से लगाना (Proper Latch) अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि यदि शिशु सही तरीके से दूध पीता है तो उसे पर्याप्त पोषण मिलता है। साथ ही, मां को निप्पल में दर्द, घाव, स्तनों में सूजन और अन्य समस्याओं से भी काफी हद तक बचाव मिलता है। उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान नर्सिंग स्टाफ को व्यवहारिक अभ्यास भी कराया।

स्तनपान से जुड़ी समस्याओं का आसान समाधान

कार्यक्रम में डॉ. नीना गुप्ता ने स्तनपान के दौरान आने वाली सामान्य समस्याओं तथा उनके समाधान पर सरल भाषा में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अधिकांश समस्याओं का समाधान सही परामर्श, उचित तकनीक और धैर्य के साथ किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि प्रारंभिक स्तर पर माताओं को सही मार्गदर्शन मिल जाए तो वे बिना किसी परेशानी के लंबे समय तक सफलतापूर्वक स्तनपान करा सकती हैं।

भारत और दुनिया में स्तनपान की वर्तमान स्थिति

डॉ. पाविका लाल ने विश्व तथा भारत में स्तनपान की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद अभी भी कई क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका इन चुनौतियों को दूर करने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने प्रतिभागियों को बताया कि अस्पताल स्तर पर सही परामर्श और सहयोग से स्तनपान की दर में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।

कोलोस्ट्रम है बच्चे की पहली प्राकृतिक सुरक्षा

डॉ. रश्मि गुप्ता ने बताया कि जन्म के बाद निकलने वाला कोलोस्ट्रम (पहला दूध) शिशु के लिए किसी प्राकृतिक वैक्सीन से कम नहीं होता। इसमें मौजूद एंटीबॉडी और पोषक तत्व नवजात को कई संक्रमणों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने सभी नर्सिंग स्टाफ से अपील की कि वे प्रत्येक मां को कोलोस्ट्रम अवश्य पिलाने के लिए प्रेरित करें।

ऑपरेशन के बाद भी संभव है सफल स्तनपान

डॉ. गरिमा गुप्ता ने बताया कि सिजेरियन (ऑपरेशन) से प्रसव कराने वाली माताएं भी उचित सहायता और सही तकनीक अपनाकर आसानी से अपने शिशु को स्तनपान करा सकती हैं। उन्होंने इस संबंध में कई व्यवहारिक सुझाव भी साझा किए।

कंगारू मदर केयर की प्रभावशीलता बताई

डॉ. दिव्या द्विवेदी ने प्रशिक्षण के दौरान कंगारू मदर केयर (Kangaroo Mother Care) की प्रक्रिया का प्रदर्शन किया। उन्होंने बताया कि विशेष रूप से कम वजन वाले तथा समय से पहले जन्मे शिशुओं के लिए यह तकनीक अत्यंत प्रभावी सिद्ध होती है।

उन्होंने कहा कि मां और शिशु के त्वचा से त्वचा संपर्क से शिशु का तापमान नियंत्रित रहता है, स्तनपान बेहतर होता है तथा उसका विकास तेज़ी से होता है।

भ्रांतियों को किया दूर

डॉ. रश्मि यादव ने स्तनपान से जुड़ी आम भ्रांतियों पर चर्चा करते हुए बताया कि समाज में फैली कई गलत धारणाएं माताओं को स्तनपान से दूर कर देती हैं। उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर इन मिथकों को स्पष्ट किया और नर्सिंग स्टाफ से आग्रह किया कि वे समुदाय में सही जानकारी पहुंचाने का कार्य करें।

नर्सिंग स्टाफ की सक्रिय सहभागिता

प्रशिक्षण कार्यक्रम में मैट्रन मीरा, सिस्टर प्रीता, सिस्टर पूनम, सिस्टर सीता, सिस्टर वंदिता, सिस्टर शोभा, सिस्टर ऐशवीना सहित अनेक वरिष्ठ एवं जूनियर नर्सिंग अधिकारियों ने सक्रिय सहभागिता निभाई। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया।

सफल रहा प्रशिक्षण कार्यक्रम

कार्यक्रम में मेडिकल कॉलेज के सभी संकाय सदस्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रतिमा वर्मा एवं डॉ. नूर ने किया। अंत में सभी प्रतिभागियों को भविष्य में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को और प्रभावी बनाने के लिए वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक प्रशिक्षण का लाभ उठाने का संदेश दिया गया।

विशेषज्ञों ने कहा कि यदि प्रत्येक स्वास्थ्यकर्मी स्तनपान के महत्व को सही तरीके से समाज तक पहुंचाए, तो मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के साथ-साथ स्वस्थ भारत के लक्ष्य को भी मजबूती मिलेगी। विश्व स्तनपान सप्ताह के अवसर पर आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

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