कानपुर में 12 परिजनों को मिले विधिक संरक्षकता प्रमाणपत्र, विशेष दिव्यांगजनों के अधिकारों को मिलेगी कानूनी सुरक्षा

0fd916d2-915a-4d26-95d5-e887b7cb27d9

रिपोर्ट – विक्की रघुवंशी 

कानपुर: विशेष दिव्यांगजनों के अधिकारों की सुरक्षा और उनके भविष्य को कानूनी रूप से सुरक्षित बनाने की दिशा में कानपुर जिला प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। गुरुवार को कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित जिला स्तरीय लोकल लेवल समिति की बैठक में 12 पात्र परिजनों को विधिक संरक्षकता (लीगल गार्जियनशिप) प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। बैठक की अध्यक्षता जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने की।

यह पहल उन वयस्क दिव्यांगजनों के हितों की रक्षा के लिए की गई है, जो ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, बौद्धिक दिव्यांगता अथवा बहु-दिव्यांगता के कारण अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं लेने में सक्षम नहीं हैं। इस व्यवस्था के माध्यम से उनके उपचार, बैंकिंग, संपत्ति, शिक्षा और अन्य कानूनी मामलों में उनके हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।

नेशनल ट्रस्ट अधिनियम के तहत मिलती है सुविधा

बैठक को संबोधित करते हुए जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत लागू नेशनल ट्रस्ट अधिनियम, 1999 विशेष दिव्यांगजनों के लिए विधिक संरक्षक नियुक्त करने का प्रावधान करता है।

उन्होंने कहा कि कई ऐसे दिव्यांगजन, जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं, अपनी मानसिक स्थिति के कारण वित्तीय, कानूनी अथवा व्यक्तिगत निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते। ऐसी स्थिति में उनके माता-पिता, भाई-बहन या परिवार का कोई निकट संबंधी निर्धारित प्रक्रिया के तहत उनका लीगल गार्जियन बन सकता है।

12 प्रस्तावों पर हुई सुनवाई

बैठक के दौरान जिला स्तरीय समिति ने विधिक संरक्षक नियुक्त किए जाने से संबंधित 12 प्रस्तावों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।

सभी मामलों में आवश्यक दस्तावेजों, पात्रता और सत्यापन रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद पात्र परिजनों को विधिक संरक्षकता प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। इस प्रमाण पत्र के माध्यम से संबंधित संरक्षक को दिव्यांगजन के हित में वैधानिक निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त होगा।

सत्यापन के बाद ही जारी होता है प्रमाणपत्र

जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि लीगल गार्जियनशिप केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके लिए विस्तृत जांच और सत्यापन किया जाता है।

उन्होंने बताया कि प्रशासन की टीम आवेदक के निवास पर जाकर यह सुनिश्चित करती है कि प्रस्तावित संरक्षक वास्तव में दिव्यांगजन की देखभाल, सुरक्षा और हितों के प्रति समर्पित है तथा उसका कोई निजी स्वार्थ नहीं है।

इसके बाद जिला स्तरीय लोकल लेवल समिति सभी तथ्यों की समीक्षा करती है और संतुष्ट होने पर ही विधिक संरक्षकता प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।

संरक्षक को मिलते हैं वैधानिक अधिकार

प्रमाणपत्र जारी होने के बाद नियुक्त संरक्षक को संबंधित दिव्यांगजन के सर्वोत्तम हित में कई महत्वपूर्ण निर्णय लेने का कानूनी अधिकार प्राप्त होता है।

इनमें शामिल हैं—

  • चिकित्सा संबंधी निर्णय
  • बैंकिंग और वित्तीय कार्य
  • संपत्ति से जुड़े मामले
  • शिक्षा एवं प्रशिक्षण
  • सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना
  • अन्य आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं

इस व्यवस्था से दिव्यांगजन के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ उनके भविष्य को भी अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है।

जनपद में लगभग 2,000 पात्र दिव्यांगजन

जिलाधिकारी ने जानकारी दी कि कानपुर नगर में लगभग 2,000 विशेष दिव्यांगजन ऐसे हैं, जो इस योजना का लाभ प्राप्त करने के पात्र हो सकते हैं।

हालांकि अभी तक लगभग 200 से 250 लाभार्थियों को ही इस व्यवस्था से जोड़ा जा सका है। उन्होंने कहा कि प्रशासन का लक्ष्य है कि प्रत्येक पात्र परिवार तक इस योजना की जानकारी पहुंचे और कोई भी व्यक्ति केवल जानकारी के अभाव में इस महत्वपूर्ण सुविधा से वंचित न रहे।

परिजनों से आवेदन करने की अपील

बैठक के दौरान जिलाधिकारी ने पात्र परिवारों से अपील की कि यदि उनके परिवार में 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का ऐसा सदस्य है, जो ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, बौद्धिक दिव्यांगता अथवा बहु-दिव्यांगता से ग्रसित है, तो वे नेशनल ट्रस्ट अधिनियम के तहत विधिक संरक्षकता के लिए आवेदन अवश्य करें।

उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा करने के साथ-साथ परिवारों को भी कानूनी स्पष्टता और सुविधा प्रदान करती है।

जागरूकता बढ़ाने पर प्रशासन का जोर

प्रशासन का मानना है कि अभी भी अनेक परिवार इस व्यवस्था से अनभिज्ञ हैं।

इसी कारण जिला प्रशासन विभिन्न माध्यमों से लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहा है, ताकि पात्र परिवार समय पर आवेदन कर सकें और अपने दिव्यांग सदस्य के लिए कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि ऐसी योजनाओं की जानकारी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना आवश्यक है, क्योंकि इससे दिव्यांगजनों के जीवन की गुणवत्ता में सकारात्मक सुधार संभव है।

समावेशी समाज की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

सामाजिक क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार विधिक संरक्षकता की व्यवस्था केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि समावेशी समाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इससे विशेष दिव्यांगजन सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं तथा उनके अधिकारों, संपत्ति और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। साथ ही परिवारों को भी विभिन्न सरकारी और वित्तीय प्रक्रियाओं में सुविधा मिलती है।

बैठक में रहे कई अधिकारी मौजूद

बैठक में जिला दिव्यांगजन सशक्तीकरण अधिकारी विनय उत्तम, समिति के सदस्य हिर्देश सिंह तथा संबंधित विभागों के अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। सभी अधिकारियों ने पात्र परिवारों को इस योजना का लाभ लेने के लिए आवश्यक प्रक्रिया की जानकारी भी प्रदान की।

कानपुर जिला प्रशासन द्वारा 12 परिजनों को विधिक संरक्षकता प्रमाणपत्र प्रदान किया जाना विशेष दिव्यांगजनों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह व्यवस्था न केवल दिव्यांगजनों के कानूनी और वित्तीय हितों की रक्षा करती है, बल्कि उनके परिवारों को भी आवश्यक अधिकार और जिम्मेदारी प्रदान करती है।

प्रशासन का लक्ष्य अधिक से अधिक पात्र परिवारों को इस योजना से जोड़ना है, ताकि कोई भी विशेष दिव्यांगजन अपने अधिकारों और कानूनी सुरक्षा से वंचित न रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, समयबद्ध आवेदन और प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से इस योजना का लाभ व्यापक स्तर पर पहुंचाया जा सकता है।

You may have missed