चांदीपुरा वायरस पर केंद्र की सख्ती: गुजरात-राजस्थान में राष्ट्रीय प्रकोप प्रतिक्रिया दल तैनात, जांच तेज
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने चांदीपुरा वायरस रोग (CHPV) की निगरानी और नियंत्रण को मजबूत करने के लिए गुजरात और राजस्थान में राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल (National Joint Outbreak Response Team-NJORT) तैनात किया है। यह कदम वायरस से जुड़े मामलों की वैज्ञानिक जांच को गति देने, रोग की वास्तविक स्थिति का आकलन करने और राज्यों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उठाया गया है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, यह कार्रवाई राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के समन्वय में संचालित एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) के तहत की जा रही है। इसके साथ ही देश के प्रमुख अनुसंधान संस्थान वायरस के संचरण, नैदानिक स्वरूप, महामारी विज्ञान और संभावित उपचार संबंधी पहलुओं पर विस्तृत अध्ययन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों की बहुविषयक टीम करेगी सहयोग
गुजरात और राजस्थान में भेजी गई एनजेओआरटी टीम में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) के विशेषज्ञ शामिल हैं।
यह टीम राज्य सरकारों के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कार्य करेगी, जिनमें शामिल हैं—
- प्रकोप की जांच
- महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययन
- रोगियों का नैदानिक प्रबंधन
- प्रयोगशाला परीक्षणों का समन्वय
- वेक्टर (वाहक) निगरानी
- सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों की समीक्षा
इसके अलावा टीम प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर अपने निष्कर्ष और सुझाव स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपेगी।
सक्रिय हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात संचालन केंद्र
मंत्रालय ने बताया कि राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन संचालन केंद्र (PHEOC) को भी सक्रिय कर दिया गया है। इसका उद्देश्य राज्यों और विशेषज्ञ टीमों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा जांच एवं निगरानी गतिविधियों को गति देना है।
कई राष्ट्रीय संस्थान कर रहे हैं संयुक्त शोध
चांदीपुरा वायरस पर देश में अब तक के सबसे व्यापक वैज्ञानिक अध्ययनों में से एक वर्तमान में चल रहा है। इसमें कई प्रमुख संस्थान शामिल हैं, जैसे—
- ICMR-राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान (चेन्नई)
- ICMR-राष्ट्रीय वेक्टर नियंत्रण अनुसंधान संस्थान (पुद्दुचेरी)
- ICMR-राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (पुणे)
- ICMR-राष्ट्रीय पूर्व-नैदानिक अनुसंधान संस्थान (हैदराबाद)
- ICAR-राष्ट्रीय पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान एवं रोग सूचना विज्ञान संस्थान (बेंगलुरु)
ये सभी संस्थान गुजरात राज्य स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर वायरस के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर रहे हैं।
वायरस के पूरे नैदानिक स्वरूप को समझने का प्रयास
चांदीपुरा वायरस संक्रमण हल्के बुखार से लेकर तीव्र एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) तक किस प्रकार प्रभावित कर सकता है।
इसके लिए महामारी विज्ञान, विषाणु विज्ञान, कीट विज्ञान, पशु चिकित्सा विज्ञान और प्रयोगशाला निदान के विशेषज्ञ संयुक्त रूप से कार्य कर रहे हैं ताकि वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों को और प्रभावी बनाया जा सके।
प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, प्रभावित जिलों में तीव्र बुखार संबंधी बीमारी (AFI) और AES के मामलों की सक्रिय निगरानी तेज कर दी गई है।
साथ ही, समुदाय स्तर पर सीरो सर्वेक्षण (Sero Survey) भी किए जा रहे हैं ताकि बिना लक्षण वाले संक्रमणों का अनुमान लगाया जा सके और वायरस के वास्तविक प्रसार को बेहतर तरीके से समझा जा सके।
वेक्टर की पहचान पर जारी है शोध
हालांकि अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी के अनुसार सैंडफ्लाई को चांदीपुरा वायरस का प्रमुख वाहक माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि क्या मच्छर, किलनी या अन्य सूक्ष्म कीट भी इसके प्रसार में भूमिका निभा सकते हैं।
प्रभावित क्षेत्रों से बड़ी संख्या में कीट नमूने एकत्र कर प्रयोगशालाओं में उनका विश्लेषण किया जा रहा है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वैज्ञानिक जांच पूरी होने से पहले किसी एक वाहक को जिम्मेदार मानना उचित नहीं होगा।
पशुओं में संक्रमण की भी हो रही जांच
जांच का दायरा केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। “वन हेल्थ” दृष्टिकोण के तहत पशुओं की भी निगरानी की जा रही है।
इसके लिए गाय, भैंस और बकरियों के रक्त एवं दूध के नमूने एकत्र किए गए हैं।
अब तक लगभग 70 पशुओं के रक्त नमूनों की जांच की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वायरस पशुओं में भी मौजूद है या नहीं।
हालांकि मंत्रालय ने कहा है कि प्रयोगशाला परीक्षण पूरे होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
जीनोम सीक्वेंसिंग से मिलेंगे महत्वपूर्ण संकेत
इसके लिए गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (GBRC), गांधीनगर में वायरस के नमूनों की पूर्ण जीनोम सीक्वेंसिंग की जा रही है।
प्रारंभिक विश्लेषण में कुछ आनुवंशिक भिन्नताएं सामने आई हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि विस्तृत अध्ययन के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वर्तमान वायरस पहले के प्रकोपों से किस हद तक अलग है।
2024 के अनुभव का भी लिया जा रहा लाभ
वर्तमान जांच में वर्ष 2024 में गुजरात में हुए चांदीपुरा वायरस प्रकोप से प्राप्त अनुभवों का भी उपयोग किया जा रहा है।
पिछले वर्ष किए गए अध्ययन में विभिन्न प्रकार के वाहकों के नमूनों की जांच की गई थी, लेकिन किसी एक वाहक की निर्णायक पुष्टि नहीं हो सकी थी।
इसी अनुभव के आधार पर इस बार जांच को और व्यापक बनाया गया है।
देशव्यापी निगरानी नेटवर्क से मिलेगा सहयोग
भारत का अस्पताल आधारित तीव्र एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) निगरानी नेटवर्क भी इस अभियान में सहयोग कर रहा है।
देश के 15 तृतीयक देखभाल अस्पतालों में संचालित यह नेटवर्क मानकीकृत नैदानिक प्रोटोकॉल, सीरोलॉजिकल परीक्षण, आणविक जांच और अगली पीढ़ी की जीनोमिक तकनीकों का उपयोग कर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आंकड़े जुटा रहा है।
‘वन हेल्थ’ मॉडल पर काम कर रही सरकार
स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि वर्तमान रणनीति “वन हेल्थ” अवधारणा पर आधारित है, जिसमें मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरणीय कारकों को एक साथ जोड़कर रोग नियंत्रण की रणनीति तैयार की जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समन्वित दृष्टिकोण से चांदीपुरा वायरस की बेहतर समझ विकसित होगी और भविष्य में प्रभावी रोकथाम एवं नियंत्रण उपाय तैयार करने में मदद मिलेगी।
चांदीपुरा वायरस की निगरानी और वैज्ञानिक जांच को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने गुजरात और राजस्थान में राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल तैनात कर व्यापक कदम उठाए हैं।
बहुविषयक विशेषज्ञ टीम, राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों की भागीदारी, जीनोम सीक्वेंसिंग, वेक्टर और पशु निगरानी तथा “वन हेल्थ” मॉडल के माध्यम से वायरस के बारे में अधिक सटीक वैज्ञानिक जानकारी जुटाने का प्रयास किया जा रहा है।
स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद प्राप्त निष्कर्ष भविष्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों को और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

