सेतु आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. राजेश्वर जोशी का बड़ा बयान: Gen Z आंदोलन, शिक्षा, रोजगार और सिस्टम सुधार पर उठाए गंभीर सवाल
रिपोर्ट- हरीश देवली
देहरादूनः उत्तराखंड के सेतु आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एवं नीति, शिक्षा तथा प्रशासनिक सुधारों से जुड़े विषयों पर अपनी स्पष्ट राय रखने वाले डॉ. राजेश्वर जोशी की एक विस्तृत फेसबुक पोस्ट इन दिनों राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। अपनी इस पोस्ट में उन्होंने युवाओं के हालिया आंदोलनों, देश की वर्तमान चुनौतियों, शिक्षा व्यवस्था, रोजगार, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सुधार और विकसित भारत के लक्ष्य पर विस्तार से विचार व्यक्त किए हैं।
डॉ. जोशी ने अपने विचारों की शुरुआत राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध पंक्तियों से की—
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।”
उन्होंने लिखा कि जीवन में ऐसे अवसर आते हैं, जब स्पष्ट और ईमानदार विचार रखना आवश्यक हो जाता है। उनके अनुसार यदि समय रहते व्यापक परिवर्तन नहीं किए गए, तो राज्य और देश दोनों की प्रगति प्रभावित हो सकती है।
Gen Z आंदोलन को बताया गंभीर संकेत
डॉ. जोशी ने कहा कि हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में Gen Z युवाओं का सड़कों पर उतरना एक सामान्य घटना नहीं थी। उन्होंने माना कि प्रदर्शन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया, जिसकी उन्होंने स्पष्ट शब्दों में निंदा की।
उन्होंने लिखा कि किसी भी सार्वजनिक जीवन में प्रधानमंत्री या किसी अन्य व्यक्ति के लिए अपमानजनक भाषा का उपयोग उचित नहीं कहा जा सकता। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि समाज में पहले से मौजूद अभद्र भाषा की संस्कृति को भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और ऐसे लोगों का भी सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए।
युवाओं के मूल मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
अपने फेसबुक पोस्ट में डॉ. जोशी ने कहा कि आंदोलन के पीछे मौजूद मूल कारणों को समझना अधिक आवश्यक है। उनके अनुसार देशभर में बड़ी संख्या में युवा, उनके अभिभावक तथा विभिन्न वर्गों के लोग इस विषय को लेकर चिंतित दिखाई दिए।
उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन को केवल राजनीतिक साजिश या विदेशी प्रभाव बताकर खारिज कर देना समाधान नहीं है। यदि कहीं असंतोष पैदा हुआ है तो उसके पीछे मौजूद वास्तविक कारणों को समझना और उनका समाधान निकालना अधिक आवश्यक है।
प्रधानमंत्री मोदी की संवेदनशीलता का किया उल्लेख
डॉ. जोशी ने अपनी पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की भी चर्चा की। उन्होंने लिखा कि केंद्र सरकार ने युवाओं के प्रतिनिधियों से संवाद स्थापित किया और प्रधानमंत्री ने स्वयं संवेदनशीलता का परिचय देते हुए स्थिति को परिपक्व तरीके से संभालने का प्रयास किया।
साथ ही उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में देश ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अब केवल उन्हीं उपलब्धियों के आधार पर आगे बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। आने वाले वर्षों में व्यापक और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है।
आर्थिक विकास के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी जोर
डॉ. जोशी का कहना है कि अब केवल जीडीपी, निर्यात और बड़े आर्थिक आंकड़ों के आधार पर विकास का मूल्यांकन पर्याप्त नहीं रहेगा। उन्होंने सुझाव दिया कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण, भ्रष्टाचार, रोजगार और आम नागरिक के जीवन स्तर को विकास का मुख्य आधार बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने भारत और चीन की तुलना करते हुए शिक्षा, अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता पर भी चिंता व्यक्त की। उनका मानना है कि भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिए शिक्षा और अनुसंधान में बड़े निवेश की आवश्यकता है।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता
पोस्ट में उन्होंने आंगनबाड़ी से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा प्रणाली में सुधार की जरूरत पर बल दिया। उनका कहना है कि केवल योजनाओं की संख्या बढ़ाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक पाठ्यक्रम, कौशल विकास और सक्षम नेतृत्व विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों के संचालन, कुलपतियों की कार्यक्षमता और शोध प्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर भी विस्तार से अपने विचार रखे।
राज्यों में प्रशासनिक सुधार पर दिया विशेष जोर
डॉ. जोशी ने लिखा कि राज्यों में प्रशासनिक क्षमता बढ़ाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर छोटे-छोटे कार्यों में भी अत्यधिक समय और संसाधन खर्च हो जाते हैं। यदि प्रशासनिक दक्षता बढ़ाई जाए तो आर्थिक विकास की गति भी तेज हो सकती है।
उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को विशेषज्ञों, निजी क्षेत्र के अनुभवी पेशेवरों और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभाशाली लोगों की भागीदारी बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए।
उत्तराखंड की चुनौतियों का भी किया उल्लेख
अपने अनुभव साझा करते हुए डॉ. जोशी ने उत्तराखंड की शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और पलायन जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राज्य बनने के समय जिन सपनों के साथ उत्तराखंड का निर्माण हुआ था, उनमें से कई अभी भी पूरी तरह साकार नहीं हो सके हैं।
उन्होंने विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों, खेती छोड़ते किसानों, खाली होते गांवों और सीमित निवेश को भी गंभीर विषय बताया।
युवाओं के भविष्य को लेकर जताई चिंता
डॉ. जोशी ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों युवाओं के लिए पेपर लीक जैसी घटनाएं बेहद निराशाजनक होती हैं। वर्षों की मेहनत के बाद यदि परीक्षा प्रक्रिया प्रभावित होती है तो युवाओं का विश्वास व्यवस्था से कमजोर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि युवाओं में ऊर्जा, आदर्शवाद और बदलाव की इच्छा होती है। इसलिए उनके मुद्दों को संवेदनशीलता के साथ समझना और समाधान की दिशा में कार्य करना आवश्यक है।
‘ट्रांसफॉर्मेशन नहीं तो अधोगति होगी’
अपनी पोस्ट के अंतिम हिस्से में डॉ. राजेश्वर जोशी ने कहा कि देश को अब केवल छोटे सुधारों से आगे बढ़ने के बजाय व्यापक परिवर्तन की दिशा में काम करना होगा। उन्होंने राजनीति में सक्षम, दूरदर्शी और जवाबदेह नेतृत्व की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने लिखा कि यदि राजनीतिक संस्कृति, प्रशासनिक व्यवस्था और नीति निर्माण में समयानुकूल परिवर्तन नहीं हुए तो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्वच्छ पर्यावरण जैसी मूलभूत चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।
अंत में उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश आवश्यक बड़े सुधारों की दिशा में आगे बढ़ेगा। उन्होंने अपनी पोस्ट का समापन अंग्रेजी वाक्य “We have to walk the talk” तथा संदेश “ट्रांसफॉर्मेशन नहीं तो अधोगति होगी” के साथ किया।
डॉ. राजेश्वर जोशी की यह विस्तृत फेसबुक पोस्ट अब राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक वर्गों में चर्चा का विषय बनी हुई है। वहीं, विभिन्न स्तरों पर लोग इसे देश में नीति, प्रशासन और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर गंभीर विमर्श के रूप में भी देख रहे हैं।

