मुस्लिम कांवड़ियों पर संत समाज की दो टूक, बोले- भगवा में ही लाएं गंगाजल, घर वापसी की भी कही बात
रिर्पोट-योगेश भारद्वाज
मथुरा। सावन माह में चल रही कांवड़ यात्रा के बीच मुस्लिम कांवड़ियों को लेकर दिए गए बयानों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर एक मौलाना के वायरल बयान के बाद ब्रज क्षेत्र के कुछ संतों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यदि किसी मुस्लिम की कांवड़ यात्रा में सच्ची आस्था है तो उसे सनातन परंपराओं और रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए यात्रा करनी चाहिए।
हालांकि, इस मुद्दे पर समाज में अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। एक पक्ष इसे धार्मिक परंपराओं से जुड़ा विषय मान रहा है, जबकि दूसरा इसे सामाजिक सौहार्द और साझा सांस्कृतिक विरासत के नजरिए से देख रहा है।
स्वामी यशवीर महाराज ने क्या कहा?
ब्रज के संत स्वामी यशवीर महाराज ने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आस्था, श्रद्धा और पवित्रता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यदि कोई मुस्लिम महिला या पुरुष सच्ची श्रद्धा के साथ सनातनी परंपराओं का पालन करते हुए भगवा वस्त्र धारण कर गंगाजल लाते हैं तो इसका स्वागत किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि केवल चर्चा या प्रचार पाने के उद्देश्य से धार्मिक प्रतीकों का उपयोग करना उचित नहीं है। उनके अनुसार धार्मिक आयोजनों की गरिमा बनाए रखना सभी श्रद्धालुओं की जिम्मेदारी है।
दिनेश फलाहारी महाराज का बयान
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले के याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी महाराज ने भी इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहा कि कांवड़ यात्रा सनातन धर्म की परंपरा है और इसमें शामिल होने वालों को उसकी धार्मिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि मुस्लिम समाज का कोई व्यक्ति सनातन धर्म में आस्था व्यक्त करना चाहता है तो उसे सनातन परंपराओं के अनुरूप जीवन अपनाना चाहिए। उन्होंने अपने बयान में “घर वापसी” का भी उल्लेख किया और कहा कि विधि-विधान के साथ “ॐ नमः शिवाय” का जाप करते हुए कांवड़ यात्रा करनी चाहिए।
परंपरा और अनुशासन पर जोर
ब्रज के अन्य संतों ने भी कहा कि कांवड़ यात्रा हजारों वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपरा है। उनके अनुसार इसमें भाग लेने वाले सभी श्रद्धालुओं को यात्रा की मर्यादा, अनुशासन और धार्मिक नियमों का सम्मान करना चाहिए।
संतों ने प्रशासन से भी अपील की कि कांवड़ मार्ग पर व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखा जाए ताकि यात्रा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।
सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा देखने को मिल रही है। एक वर्ग का मानना है कि विभिन्न समुदायों के लोगों की भागीदारी सामाजिक सद्भाव और गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक है। वहीं दूसरा वर्ग इसे सनातन परंपराओं में हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है।
बीते कुछ वर्षों में अलग-अलग समुदायों के लोगों के कांवड़ यात्रा में शामिल होने की खबरें सामने आती रही हैं। इसी कारण यह विषय समय-समय पर सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनता रहा है।
प्रशासन से की गई मांग
संत समाज ने प्रशासन से मांग की है कि कांवड़ यात्रा के दौरान धार्मिक परंपराओं और कानून-व्यवस्था दोनों का संतुलित रूप से पालन सुनिश्चित किया जाए। उनका कहना है कि यात्रा की गरिमा, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सामाजिक शांति बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
संतुलित दृष्टिकोण
यह पूरा मामला विभिन्न धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोणों से जुड़ा हुआ है। संबंधित बयान संत समाज के कुछ प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत विचार हैं। इस विषय पर अलग-अलग समुदायों, धार्मिक संगठनों और नागरिकों की राय भिन्न हो सकती है। प्रशासन की ओर से फिलहाल इस संबंध में कोई आधिकारिक निर्देश या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

