विश्व स्तनपान सप्ताह 2026: मां का दूध शिशु के लिए पहला टीका, AOP कानपुर ने चलाया जागरूकता अभियान
रिपोर्ट- हरिशंकर शर्मा
कानपुर। विश्व स्तनपान सप्ताह 2026 के अवसर पर एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (AOP), कानपुर ने स्तनपान को जन-आंदोलन बनाने का आह्वान किया है। संगठन ने कहा कि हर नवजात को जीवन की बेहतर शुरुआत देने के लिए समाज में स्तनपान को लेकर सकारात्मक माहौल बनाना बेहद जरूरी है। इसी उद्देश्य से जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर के बाल रोग विभाग में शुक्रवार को प्रेस वार्ता आयोजित की गई, जिसमें विशेषज्ञों ने मां के दूध के महत्व और वर्तमान स्थिति पर विस्तार से जानकारी दी।
प्रेस वार्ता को एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, कानपुर के अध्यक्ष डॉ. जे. के. गुप्ता, सचिव डॉ. शैलेन्द्र गौतम, प्रोफेसर डॉ. अरुण आर्य और डॉ. अमितेश यादव ने संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 की थीम “Breastfeeding for a Sustainable Start in Life – Strengthen What Works” रखी गई है। इसका उद्देश्य प्रत्येक नवजात को स्वस्थ जीवन की शुरुआत उपलब्ध कराना, माताओं को स्तनपान के लिए सक्षम बनाना और परिवार एवं समाज में स्तनपान के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
मां का पहला दूध शिशु के लिए पहला टीका
डॉ. जे. के. गुप्ता ने बताया कि जन्म के बाद निकलने वाला मां का पहला गाढ़ा पीला दूध यानी कोलोस्ट्रम शिशु के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसे प्राकृतिक रूप से बच्चे का पहला टीका कहा जाता है, क्योंकि इसमें मौजूद पोषक तत्व और एंटीबॉडी नवजात को संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं।
उन्होंने कहा कि बच्चे के जन्म के बाद पहले एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराना चाहिए। इसके बाद शुरुआती छह माह तक शिशु को केवल मां का दूध दिया जाना चाहिए। वहीं, छह माह पूरे होने के बाद उचित ऊपरी आहार के साथ दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखना बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए लाभकारी होता है।
छह माह तक केवल स्तनपान की दर में गिरावट चिंता का विषय
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने की दर में सुधार हुआ है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार यह दर 41.8 प्रतिशत से बढ़कर 50.1 प्रतिशत तक पहुंची है, जो एक सकारात्मक बदलाव है।
हालांकि, छह माह तक केवल स्तनपान कराने की दर में गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक यह दर 63.7 प्रतिशत से घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई है। वहीं उत्तर प्रदेश में स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण है, जहां यह आंकड़ा 59.7 प्रतिशत से घटकर 34.6 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में बच्चे जीवन के शुरुआती छह माह में मां के दूध से मिलने वाले प्राकृतिक पोषण और सुरक्षा से वंचित रह जाते हैं। इसलिए परिवारों के साथ-साथ स्वास्थ्य संस्थानों और समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
स्तनपान से बच्चे के स्वास्थ्य को मिलती है मजबूत सुरक्षा
चिकित्सकों ने बताया कि मां का दूध केवल बच्चे की भूख मिटाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण पोषण का प्राकृतिक स्रोत है। इसमें मौजूद तत्व बच्चे के मस्तिष्क विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और शारीरिक वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसके अलावा नियमित स्तनपान से बच्चों में भविष्य में मोटापा, मधुमेह, एलर्जी और अस्थमा जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, केवल स्तनपान कराने से अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम (SIDS) के खतरे में भी कमी देखी गई है।
इसलिए विशेषज्ञों ने माता-पिता से अपील की कि वे शुरुआती छह माह तक बच्चे को केवल मां का दूध देने को प्राथमिकता दें और किसी भी भ्रम या गलत जानकारी से बचें।
स्तनपान न मिलने से बढ़ सकता है स्वास्थ्य जोखिम
विशेषज्ञों ने बताया कि जिन बच्चों को शुरुआती समय में मां का दूध पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता, उनमें कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इनमें संक्रमण, दस्त, निमोनिया, कुपोषण, एनीमिया, एलर्जी और अन्य बीमारियां शामिल हैं।
विशेष रूप से समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के लिए मां का दूध अत्यंत उपयोगी माना जाता है, क्योंकि यह उनके कमजोर शरीर को आवश्यक पोषण और सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अलावा स्तनपान बच्चों की आंतों के बेहतर विकास और प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में भी सहायक होता है।
1 से 7 अगस्त तक चलेंगे जागरूकता कार्यक्रम
एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, कानपुर ने विश्व स्तनपान सप्ताह के तहत 1 अगस्त से 7 अगस्त 2026 तक विभिन्न जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से माताओं, परिवारों और आम लोगों को स्तनपान के लाभों के बारे में जानकारी दी जाएगी।
कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि समाज में ऐसा वातावरण तैयार करना है, जहां हर मां को अपने बच्चे को स्तनपान कराने के लिए सहयोग और प्रोत्साहन मिल सके।
अंततः विशेषज्ञों ने कहा कि स्वस्थ पीढ़ी के निर्माण के लिए स्तनपान को केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक अभियान के रूप में देखने की आवश्यकता है। मां का दूध बच्चे के बेहतर भविष्य की नींव रखता है और इसे बढ़ावा देना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

