सीजेपी प्रदर्शन विवाद: पूर्व DGP ने कहा शांतिपूर्ण आंदोलन लोगों का अधिकार, हिंसा पर सख्त कार्रवाई जरूरी

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Digital UP News Desk

लखनऊ: दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और निर्देशों पर उत्तर प्रदेश के दो पूर्व पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) ने प्रतिक्रिया दी है। दोनों पूर्व पुलिस अधिकारियों ने न्यायालय के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

लेकिन आंदोलन की आड़ में हिंसा, कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने या आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों को किसी प्रकार की छूट नहीं दी जा सकती।

पूर्व डीजीपी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कानून के शासन को मजबूत करने वाला है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करें, लेकिन किसी भी स्थिति में हिंसा और अराजकता को बढ़ावा न मिलने दें।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान जरूरी: पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह

नोएडा में पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्देशों में स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून सभी के लिए समान है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति हिंसा या आपराधिक गतिविधियों में शामिल पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई कानून के अनुसार होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कानून की सीमा के भीतर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके अलावा, किसी भी आंदोलन को हिंसा का माध्यम बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

विक्रम सिंह ने सीजेपी की ओर से कथित तौर पर दिए गए उस बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें प्रशासनिक स्तर पर मामलों को वापस लेने की मांग पूरी न होने पर दोबारा प्रदर्शन करने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि न्यायालय के आदेश सभी नागरिकों और संगठनों के लिए बाध्यकारी होते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि किसी पक्ष को अदालत के निर्णय से असहमति है तो उसके पास कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं। इसके लिए पुनर्विचार याचिका या अन्य संवैधानिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया जा सकता है। हालांकि, सड़क पर दबाव बनाने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।

पुलिस को संयम के साथ कानून व्यवस्था बनाए रखने की सलाह

पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने पुलिस और प्रशासन को भी सुझाव दिया कि किसी भी परिस्थिति में संयम बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि पुलिस का उद्देश्य जनता के अधिकारों की रक्षा करना और कानून व्यवस्था बनाए रखना है।

उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस को अनावश्यक बल प्रयोग से बचना चाहिए और बातचीत के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। वहीं, यदि कोई व्यक्ति हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई आवश्यक है।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पुलिस और जनता के बीच विश्वास बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन संविधान का अधिकार: पूर्व डीजीपी एके जैन

वहीं, लखनऊ में पूर्व डीजीपी एके जैन ने भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अदालत का फैसला संतुलित और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है।

उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इसलिए शांतिपूर्ण आंदोलनों का सम्मान किया जाना चाहिए। हालांकि, यदि किसी प्रदर्शन में आपराधिक तत्व शामिल होकर हिंसा फैलाने का प्रयास करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी हो जाता है।

एके जैन ने कहा कि किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब वह कानून के दायरे में रहकर किया जाए। यदि आंदोलन में ऐसे लोग शामिल हो जाएं जिनका उद्देश्य केवल अराजकता फैलाना हो, तो इससे पूरे आंदोलन की छवि प्रभावित होती है।

आपराधिक तत्वों की भूमिका की जांच जरूरी

पूर्व डीजीपी एके जैन ने कहा कि किसी भी बड़े प्रदर्शन में यह जांच का विषय होता है कि उसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं और उनकी भूमिका क्या है। उन्होंने कहा कि यदि किसी आंदोलन में बाहरी तत्व शामिल होकर हिंसा करते हैं तो उनकी पहचान कर कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।

उन्होंने बताया कि तकनीकी जांच और अन्य माध्यमों से ऐसे लोगों की पहचान संभव है जो पहले से आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई पूरी जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक विरोध और अपराध के बीच अंतर को समझना बेहद जरूरी है। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखना अधिकार है, लेकिन हिंसा और कानून तोड़ना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

लोकतंत्र में अधिकार और जिम्मेदारी दोनों महत्वपूर्ण

विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों पर आधारित नहीं होता, बल्कि जिम्मेदारियों से भी जुड़ा होता है। नागरिकों को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता है, लेकिन साथ ही उन्हें कानून और सामाजिक व्यवस्था का सम्मान भी करना चाहिए।

इसी तरह प्रशासन और पुलिस की भूमिका भी संतुलित होनी चाहिए। जहां एक ओर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है, वहीं दूसरी ओर हिंसा करने वालों पर कानून के अनुसार कार्रवाई करना भी आवश्यक है।

दरअसल, लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और संवाद की परंपरा महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए किसी भी आंदोलन को शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से चलाना ही सबसे प्रभावी तरीका होता है।

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