जंतर-मंतर प्रदर्शन में FRS का बड़ा इस्तेमाल, पुलिस सूत्रों के मुताबिक 2,500 से ज्यादा लोगों की पहचान
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्रों के प्रदर्शन के बीच फेसियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) के इस्तेमाल को लेकर बड़ी जानकारी सामने आई है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, प्रदर्शन स्थल के आसपास लगाए गए सिस्टम के जरिए 2,500 से अधिक ऐसे लोगों की पहचान की गई है, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड पुलिस डेटाबेस में दर्ज बताया गया है।
यह कार्रवाई 20 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के बाद सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के बीच सामने आई है। पुलिस सूत्रों के अनुसार का उद्देश्य प्रदर्शन में शामिल आम प्रदर्शनकारियों की पहचान करना नहीं, बल्कि वांछित अपराधियों, फरार आरोपियों, हिस्ट्रीशीटरों और पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज अन्य संदिग्ध श्रेणियों के लोगों की पहचान करना है।
हालांकि, किसी व्यक्ति की पुलिस डेटाबेस में पहचान होना अपने आप में किसी नए अपराध में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। किसी भी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी संबंधित मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर तय होती है।
जंतर-मंतर पर लगाए गए FRS यूनिट
पुलिस सूत्रों के अनुसार, जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल के आसपास चार फेसियल रिकग्निशन सिस्टम यूनिट तैनात की गई हैं। इन्हें प्रदर्शन स्थल के प्रमुख प्रवेश और निकास बिंदुओं के आसपास लगाया गया है।
इन सिस्टम के जरिए कैमरों से प्राप्त चेहरों का मिलान पुलिस के उपलब्ध डेटाबेस से किया जाता है। पुलिस का दावा है कि इस प्रक्रिया से ऐसे लोगों की पहचान करने में मदद मिलती है, जिनके खिलाफ पहले से आपराधिक मामले, गिरफ्तारी वारंट या अन्य पुलिस रिकॉर्ड मौजूद हैं।
इसके अलावा, पुलिस प्रदर्शन स्थल पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए निगरानी व्यवस्था का भी इस्तेमाल कर रही है। रिपोर्टों के अनुसार, लाइव वीडियो फीड और तकनीकी निगरानी के जरिए पुलिस स्थिति पर नजर रख रही है।
2,500 से अधिक लोगों की पहचान का दावा
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, FRS की मदद से तीन दिनों के भीतर 2,500 से अधिक ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिनका आपराधिक बैकग्राउंड पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद बताया गया है।
पुलिस का कहना है कि इन लोगों की पहचान का उद्देश्य प्रदर्शन स्थल पर किसी संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी समस्या को रोकना है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पुलिस रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति का नाम होना और किसी नए मामले में दोषी साबित होना अलग-अलग बातें हैं।
किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से दर्ज मामले की प्रकृति, उसकी वर्तमान कानूनी स्थिति और अदालत में चल रही प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है। इसलिए पुलिस द्वारा की गई पहचान को जांच का हिस्सा माना जाना चाहिए, न कि स्वतः दोष सिद्धि।
20 जुलाई की हिंसा के बाद बढ़ाई गई निगरानी
20 जुलाई को जंतर-मंतर और उसके आसपास हुए प्रदर्शन के बाद पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया। पुलिस के अनुसार, उस दौरान कुछ स्थानों पर हिंसा हुई और पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोप सामने आए।
इसी घटना के बाद पुलिस ने प्रदर्शन स्थल के आसपास तकनीकी निगरानी बढ़ाई। इसके तहत FRS कैमरों के अलावा अन्य निगरानी उपकरणों का भी इस्तेमाल किए जाने की जानकारी सामने आई है।
पुलिस का कहना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल कानून-व्यवस्था बनाए रखने और हिंसा से जुड़े मामलों की जांच में सहायता के लिए किया जा रहा है। वहीं, प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों और नागरिक अधिकारों से जुड़े सवालों को लेकर निगरानी तकनीक के इस्तेमाल पर बहस भी शुरू हो गई है।
हिंसा के मामले में 15 FIR दर्ज
20 जुलाई की घटनाओं के संबंध में दिल्ली पुलिस ने अब तक 15 एफआईआर दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। पुलिस के अनुसार, इन मामलों की जांच जारी है।
रिपोर्टों के मुताबिक, दर्ज मामलों में प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और कानून-व्यवस्था से जुड़े आरोपों की जांच की जा रही है। एक एफआईआर में हत्या के प्रयास से संबंधित आरोप भी शामिल होने की जानकारी सामने आई है।
हालांकि, किसी भी मामले में अंतिम कानूनी निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगा। एफआईआर में दर्ज आरोपों को अदालत में सिद्ध होना बाकी होता है।
पुलिस ने बताया FRS का उद्देश्य
पुलिस सूत्रों के अनुसार, FRS का उद्देश्य आम प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाना नहीं है। पुलिस का दावा है कि तकनीक का इस्तेमाल ऐसे लोगों की पहचान के लिए किया जा रहा है, जिनका नाम पहले से पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद है और जो किसी मामले में वांछित, फरार या हिस्ट्रीशीटर हो सकते हैं। पुलिस का कहना है कि बड़े सार्वजनिक आयोजनों और प्रदर्शनों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में तकनीक की मदद से संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी जोखिमों की पहचान करने का प्रयास किया जा सकता है।
हालांकि, इस प्रक्रिया में डेटा सुरक्षा, निजता और निगरानी की सीमाओं को लेकर भी सवाल उठते हैं। इसलिए ऐसे सिस्टम के इस्तेमाल में कानूनी प्रक्रिया और निर्धारित नियमों का पालन महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रदर्शन और सुरक्षा व्यवस्था के बीच संतुलन पर बहस
जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शन के बीच FRS के इस्तेमाल ने सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। एक ओर पुलिस का कहना है कि तकनीक का इस्तेमाल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जा रहा है।
दूसरी ओर, सार्वजनिक प्रदर्शन में शामिल लोगों की लगातार तकनीकी निगरानी को लेकर निजता से जुड़े सवाल भी उठ रहे हैं। विशेषज्ञों और नागरिक अधिकार समूहों के बीच यह चर्चा महत्वपूर्ण है कि सुरक्षा के उद्देश्य से इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक के लिए स्पष्ट नियम और जवाबदेही की व्यवस्था होनी चाहिए।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार दिल्ली पुलिस ने FRS के इस्तेमाल को आपराधिक रिकॉर्ड वाले और वांछित लोगों की पहचान से जोड़कर बताया है।
जांच में वीडियो और सोशल मीडिया सामग्री की भी समीक्षा
पुलिस सूत्रों के अनुसार, 20 जुलाई की हिंसा से जुड़े मामलों की जांच में पुलिस वीडियो फुटेज और सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री की भी समीक्षा कर रही है।
जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि हिंसा के दौरान कौन-कौन से लोग घटनास्थल पर मौजूद थे और उनकी भूमिका क्या रही। इसके लिए उपलब्ध वीडियो, सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल सामग्री की जांच की जा सकती है।
हालांकि, किसी भी डिजिटल फुटेज के आधार पर कार्रवाई करने से पहले उसकी सत्यता और संदर्भ की जांच आवश्यक होती है। पुलिस जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
अब आगे की जांच पर नजर
जंतर-मंतर प्रदर्शन के बीच FRS के जरिए 2,500 से अधिक लोगों की पहचान का दावा सामने आने के बाद अब पुलिस की आगे की कार्रवाई पर नजर है।
यह भी महत्वपूर्ण होगा कि पहचान किए गए लोगों में से कितने लोग किसी मामले में वांछित हैं, कितने के खिलाफ पुराने मामले दर्ज हैं और कितने लोगों के संबंध में केवल पुलिस रिकॉर्ड में जानकारी मौजूद है। इन सभी पहलुओं की कानूनी स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
फिलहाल, पुलिस 20 जुलाई की हिंसा से जुड़े मामलों की जांच कर रही है और 15 एफआईआर दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। वहीं, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है और सुरक्षा व्यवस्था के तहत FRS सहित तकनीकी निगरानी का इस्तेमाल किया जा रहा है।
कुल मिलाकर, यह मामला एक ओर प्रदर्शन स्थल की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ा है, जबकि दूसरी ओर फेसियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल और नागरिक निजता को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।
अब आगे की पुलिस जांच और आधिकारिक कार्रवाई से इस पूरे मामले की तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।

