कानपुर में किशोर मानसिक स्वास्थ्य पर बालरोग विशेषज्ञों की कार्यशाला, टीनएजर्स में बढ़ते अवसाद पर जताई चिंता
रिपोर्ट – विवेक कृष्ण दीक्षित
कानपुर: आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता डिजिटल प्रभाव, पढ़ाई का दबाव और सामाजिक चुनौतियां किशोरों (टीनएजर्स) के मानसिक स्वास्थ्य पर लगातार असर डाल रही हैं।
यही कारण है कि मानसिक स्वास्थ्य आज केवल चिकित्सा का विषय नहीं रह गया, बल्कि समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बन चुका है। इसी गंभीर मुद्दे को केंद्र में रखते हुए एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स द्वारा कानपुर में सेंट्रल आईएपी (IAP) कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला में शहर तथा आसपास के जिलों से लगभग 40 शिशु रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया और किशोरों में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम का उद्देश्य किशोरों में बढ़ रहे मानसिक तनाव, चिंता (Anxiety), अवसाद (Depression) और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारणों को समझना तथा उनके प्रभावी समाधान पर चर्चा करना था। विशेषज्ञों ने इस दौरान अभिभावकों, शिक्षकों और समाज की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कई व्यवहारिक सुझाव भी साझा किए।
किशोर मानसिक स्वास्थ्य बन रहा गंभीर चुनौती
कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि वर्तमान समय में किशोर मानसिक स्वास्थ्य एक वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। तेजी से बदलती जीवनशैली, प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग, पढ़ाई का दबाव और पारिवारिक संवाद की कमी जैसी परिस्थितियां बच्चों और किशोरों के मानसिक संतुलन को प्रभावित कर रही हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि यदि समय रहते इन समस्याओं की पहचान और उचित मार्गदर्शन न मिले, तो इसका असर बच्चों की शिक्षा, व्यवहार, सामाजिक जीवन और भविष्य पर पड़ सकता है।
हर सात में से एक किशोर मानसिक समस्या से प्रभावित
कार्यशाला में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 10 से 19 वर्ष आयु वर्ग के हर सात में से एक किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या से प्रभावित पाया जाता है। विशेषज्ञों ने बताया कि यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
उन्होंने कहा कि चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) किशोरों में सबसे अधिक देखी जाने वाली समस्याओं में शामिल हैं। इसके अलावा आत्मविश्वास की कमी, सामाजिक अलगाव, भावनात्मक असंतुलन और पढ़ाई से जुड़ा तनाव भी तेजी से बढ़ रहा है।
कम उम्र में शुरू हो सकती है समस्या
विशेषज्ञों ने कार्यशाला के दौरान बताया कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं की शुरुआत किशोरावस्था के शुरुआती वर्षों में ही हो जाती है।
उनके अनुसार उपलब्ध चिकित्सा अध्ययनों के आधार पर लगभग 50 प्रतिशत मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लक्षण 14 वर्ष की आयु तक दिखाई देने लगते हैं, जबकि लगभग 75 प्रतिशत मामलों में ये समस्याएं 24 वर्ष की आयु तक विकसित हो जाती हैं।
इसलिए समय रहते पहचान, परामर्श और उचित सहयोग उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है।
परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों के साथ प्रतिदिन समय बिताएं, उनसे खुलकर बातचीत करें और उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास करें। केवल पढ़ाई या करियर की चर्चा करने के बजाय उनके विचारों, मित्रों, रुचियों और दैनिक अनुभवों के बारे में भी संवाद बनाए रखें।
विशेषज्ञों का कहना था कि जब बच्चे स्वयं को परिवार के बीच सुरक्षित और समझा हुआ महसूस करते हैं, तो मानसिक तनाव का जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है।
बच्चों को अकेलापन महसूस न होने दें
कार्यशाला के दौरान यह भी बताया गया कि लंबे समय तक अकेलापन, सामाजिक दूरी और भावनात्मक उपेक्षा किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को आवश्यकता से अधिक अकेला न छोड़ें और उनके साथ सकारात्मक समय बिताएं। परिवार के साथ भोजन करना, बातचीत करना, घूमना और साझा गतिविधियों में भाग लेना बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक हो सकता है।
खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों को दें बढ़ावा
विशेषज्ञों ने कहा कि नियमित खेलकूद, योग, व्यायाम और अन्य शारीरिक गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बच्चों को मोबाइल और स्क्रीन पर अधिक समय बिताने के बजाय मैदान में खेलने, साइकिल चलाने, योग करने और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करें।
इसके अलावा संगीत, चित्रकला, नृत्य, पठन-पाठन और अन्य रचनात्मक शौक भी मानसिक तनाव को कम करने में सहायक हो सकते हैं।
स्कूल और समाज की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
कार्यशाला में यह भी कहा गया कि केवल परिवार ही नहीं, बल्कि विद्यालय और समाज भी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
विद्यालयों में समय-समय पर मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम, काउंसलिंग सत्र और व्यक्तित्व विकास गतिविधियां आयोजित की जानी चाहिए। इससे विद्यार्थियों को अपनी भावनाओं को समझने और सकारात्मक तरीके से व्यक्त करने का अवसर मिलता है।
बालरोग विशेषज्ञों ने साझा किए व्यवहारिक सुझाव
कार्यशाला में उपस्थित विशेषज्ञों ने अभिभावकों और शिक्षकों के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- बच्चों के साथ प्रतिदिन खुलकर संवाद करें।
- उनकी भावनाओं और समस्याओं को गंभीरता से सुनें।
- पढ़ाई के साथ-साथ खेल, कला और मनोरंजन को भी महत्व दें।
- अत्यधिक स्क्रीन टाइम को सीमित करें।
- बच्चों की तुलना अन्य बच्चों से करने से बचें।
- यदि लंबे समय तक उदासी, चिंता या व्यवहार में बदलाव दिखाई दे तो योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
भविष्य में भी होंगे ऐसे कार्यक्रम
कार्यक्रम के अंत में एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के सचिव डॉ. शैलेन्द्र ने सभी विशेषज्ञों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संस्था भविष्य में भी इस प्रकार की शैक्षणिक कार्यशालाओं का आयोजन करती रहेगी, ताकि चिकित्सकों के साथ-साथ समाज में भी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके।
कार्यशाला की अध्यक्षता डॉ. जे. के. गुप्ता ने की। उन्होंने कहा कि किशोर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समय रहते जागरूकता और सहयोग ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
कानपुर में आयोजित सेंट्रल आईएपी कार्यशाला ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य आज समाज के सामने उभरती हुई महत्वपूर्ण चुनौती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि समय पर पहचान, परिवार का सहयोग, सकारात्मक संवाद, खेलकूद और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं को कम किया जा सकता है।
साथ ही उन्होंने यह भी संदेश दिया कि बच्चों को केवल शैक्षणिक सफलता ही नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा और पारिवारिक सहयोग भी उतना ही आवश्यक है। ऐसे जागरूकता कार्यक्रम समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।

