कानपुर में खेत तालाब बना किसानों की आय का नया मॉडल, मोती की खेती और मत्स्य पालन से बढ़ेगी आमदनी

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रिपोर्ट- विक्की रघुवंशी

कानपुर: खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में कानपुर नगर के बिधनू विकासखंड का ग्राम सम्भुआ एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरा है।

यहां खेत तालाब का उपयोग केवल सिंचाई और वर्षा जल संचयन तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे मोती की खेती और मत्स्य पालन जैसी आयवर्धक गतिविधियों से जोड़कर किसानों की आय बढ़ाने का सफल प्रयास किया जा रहा है।

यह नवाचार न केवल कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के उपयोग का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सरकारी योजनाओं और वैज्ञानिक प्रशिक्षण के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है।

इसी अभिनव परियोजना का निरीक्षण करने पहुंचे जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने इसे किसानों की आय बढ़ाने वाला प्रभावी मॉडल बताते हुए अधिकारियों को निर्देश दिए कि जनपद के अन्य खेत तालाब लाभार्थियों को भी इस मॉडल से जोड़ा जाए।

उन्होंने कहा कि यदि किसान पारंपरिक खेती के साथ अतिरिक्त आय के स्रोत विकसित करें तो उनकी आर्थिक स्थिति अधिक मजबूत हो सकती है।

खेत तालाब से तैयार हो रहा आय बढ़ाने का नया मॉडल

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत भूमि संरक्षण अनुभाग द्वारा ग्राम सम्भुआ निवासी श्रीमती रश्मि वर्मा के खेत में 22 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा और तीन मीटर गहरा खेत तालाब तैयार कराया गया है। इस परियोजना के लिए उन्हें योजना के तहत 50 प्रतिशत अनुदान  प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से उपलब्ध कराया गया।

तालाब निर्माण के बाद कृषि विभाग तथा मणि एग्रो हब के सहयोग से प्रशिक्षण प्राप्त कर रश्मि वर्मा ने मोती की खेती शुरू की। वर्तमान में परियोजना को लगभग नौ माह पूरे हो चुके हैं और अनुमान है कि करीब 18 माह में मोती पूरी तरह तैयार हो जाएंगे।

30 हजार सीपियों से तैयार होंगे डिजाइनर मोती

इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लगभग 30 हजार सीपियों का उपयोग किया जा रहा है। सामान्य मोती उत्पादन के साथ-साथ विशेष तकनीक अपनाकर डिजाइनर पर्ल भी तैयार किए जा रहे हैं।

विशेष रूप से चयनित सीपियों में वैज्ञानिक विधि से विशेष मोल्ड प्रत्यारोपित किए गए हैं। इसके बाद सीपी प्राकृतिक रूप से उन सांचों पर मोती की परतें चढ़ाती है। इस प्रक्रिया के माध्यम से स्वस्तिक, भगवान गणेश, पुष्प, पत्तियों तथा अन्य कलात्मक आकृतियों वाले डिजाइनर मोती तैयार किए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के डिजाइनर पर्ल की मांग आभूषण उद्योग और सजावटी वस्तुओं के बाजार में सामान्य गोल मोतियों की तुलना में अधिक होती है। यही कारण है कि इनकी बाजार कीमत भी अपेक्षाकृत अधिक रहने की संभावना है।

50 लाख रुपये तक के कारोबार का अनुमान

परियोजना की कुल अनुमानित लागत लगभग 18 से 20 लाख रुपये है। वहीं तैयार होने वाले मोतियों की संभावित बाजार कीमत लगभग 50 लाख रुपये आंकी जा रही है।

इसके अलावा सामान्य सीपियों में प्रति सीपी दो मोती तैयार किए जा रहे हैं, जिससे उत्पादन क्षमता भी बढ़ रही है। यदि यह परियोजना सफल रहती है तो यह जनपद ही नहीं बल्कि प्रदेश के अन्य किसानों के लिए भी एक लाभकारी मॉडल बन सकती है।

मत्स्य पालन से भी होगी अतिरिक्त आय

मोती उत्पादन के साथ-साथ खेत तालाब में मत्स्य पालन भी किया जा रहा है। रश्मि वर्मा ने बताया कि उनके दूसरे खेत तालाब में अब तक तीन बार सफल मत्स्य उत्पादन किया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि मत्स्य पालन से प्रतिवर्ष लगभग चार लाख रुपये की अतिरिक्त आय होने की संभावना है। उनके अनुसार यदि किसान खेत तालाबों का उपयोग केवल सिंचाई तक सीमित न रखकर बहुउद्देशीय गतिविधियों से जोड़ें तो कम भूमि में भी बेहतर आय अर्जित की जा सकती है।

उन्होंने अन्य किसानों से भी अपील की कि वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठाते हुए मोती की खेती, मत्स्य पालन और अन्य कृषि आधारित उद्यमों को अपनाएं।

जिलाधिकारी ने किया परियोजना का निरीक्षण

निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने परियोजना की प्रगति का अवलोकन किया और इसे किसानों के लिए प्रेरणादायक पहल बताया।

उन्होंने कहा कि खेत तालाब केवल वर्षा जल संचयन और सिंचाई का साधन नहीं हैं, बल्कि यदि उनका वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए तो वे किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकते हैं।

उन्होंने भूमि संरक्षण अधिकारी को निर्देश दिए कि जनपद के अन्य खेत तालाब लाभार्थियों को भी इस मॉडल की जानकारी दी जाए तथा उन्हें प्रशिक्षण देकर मोती की खेती, मत्स्य पालन और अन्य आयवर्धक गतिविधियों से जोड़ा जाए।

जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर

निरीक्षण के दौरान भूजल सप्ताह के अंतर्गत जिलाधिकारी ने एक फलदार पौधा भी रोपा और जल संरक्षण के महत्व पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि खेत तालाब भूजल पुनर्भरण, वर्षा जल संचयन और सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए इनकी नियमित साफ-सफाई और संरक्षण आवश्यक है।

जिलाधिकारी ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जनपद के सभी खेत तालाबों की साफ-सफाई सुनिश्चित की जाए तथा उनके आसपास व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण कराया जाए। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।

किसानों को वितरित की गई उन्नतशील मिनीकिट

कार्यक्रम के दौरान जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह, उप कृषि निदेशक डॉ. आर.एस. वर्मा तथा जिला कृषि अधिकारी अरुणेश प्रताप सिंह ने संयुक्त रूप से किसानों को उन्नतशील ज्वार और साँवा की मिनीकिट वितरित की।

अधिकारियों ने किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, फसल विविधीकरण और सरकारी योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया।

इस अवसर पर भूमि संरक्षण विभाग, कृषि विभाग के अधिकारी-कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में किसान उपस्थित रहे।

कृषि में नवाचार से बदल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था

विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक खेती के साथ वैकल्पिक कृषि गतिविधियों को अपनाने से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। मोती की खेती, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, बागवानी और जैविक खेती जैसे मॉडल आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

कानपुर की यह परियोजना इस बात का उदाहरण है कि यदि किसान वैज्ञानिक तकनीकों और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग करें तो सीमित संसाधनों में भी बेहतर आर्थिक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

कानपुर के ग्राम सम्भुआ में खेत तालाब आधारित मोती की खेती और मत्स्य पालन की यह परियोजना कृषि क्षेत्र में नवाचार और आय वृद्धि का एक सफल उदाहरण बनकर सामने आई है।

लगभग 30 हजार सीपियों पर आधारित इस परियोजना से डिजाइनर मोती तैयार किए जा रहे हैं, जबकि मत्स्य पालन किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन रहा है। जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने इसे जनपद के अन्य किसानों तक पहुंचाने के निर्देश देकर स्पष्ट किया है कि आधुनिक कृषि तकनीकों, सरकारी योजनाओं और जनभागीदारी के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं।

यदि यह मॉडल व्यापक स्तर पर अपनाया जाता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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