वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश चंद्र त्रिपाठी ने ‘कट्टा गुरू’ कहने पर जताई आपत्ति, मानहानि की दी चेतावनी

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रिपोर्ट – विवेक कृष्ण दीक्षित 

कानपुर: कानपुर बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व महामंत्री रह चुके वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश चंद्र त्रिपाठी ने सार्वजनिक रूप से खुद को ‘कट्टा गुरू’ या इसी प्रकार के अन्य उपनामों से संबोधित किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कोई व्यक्ति उन्हें इस नाम से संबोधित करता है, तो उसके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अतीत में कुछ लोगों ने मजाक के तौर पर उन्हें ऐसे नामों से पुकारा था और उस समय उन्होंने इसका विरोध नहीं किया। हालांकि, अब यह स्थिति ऐसी हो गई है कि यह संबोधन लगातार और सार्वजनिक रूप से प्रयोग किया जा रहा है, जिससे उनकी व्यक्तिगत और सामाजिक छवि प्रभावित हो रही है। इसलिए उन्होंने अब कानूनी कदम उठाने का निर्णय लिया है।

‘मजाक अब सीमा से आगे बढ़ चुका है’

नरेश चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि प्रारंभिक दौर में कुछ लोग उन्हें मजाक में ‘कट्टा गुरू’ या ‘तमंचा गुरू’ कहकर संबोधित करते थे। उस समय उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया और न ही किसी प्रकार का विरोध दर्ज कराया।

उन्होंने कहा कि समय के साथ यह संबोधन कई लोगों द्वारा सामान्य रूप से इस्तेमाल किया जाने लगा। अब स्थिति यह है कि कुछ लोग सार्वजनिक मंचों और अन्य स्थानों पर भी उन्हें इसी नाम से बुलाते हैं। उनके अनुसार, यह अब मजाक तक सीमित नहीं रहा और व्यक्तिगत गरिमा को प्रभावित करने वाला विषय बन गया है।

38 वर्षों से कर रहे हैं वकालत

वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि उन्हें लगभग 38 वर्षों का वकालत का अनुभव है। इस दौरान उन्होंने न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत विभिन्न मामलों की पैरवी की है और कानपुर बार एसोसिएशन में कई महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाए हैं।

उन्होंने कहा कि लंबे सार्वजनिक जीवन और पेशेवर अनुभव के कारण उनकी एक सामाजिक पहचान है। ऐसे में किसी भी प्रकार का ऐसा संबोधन, जो उनकी गरिमा के अनुरूप न हो, उनकी प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

राजनीतिक जीवन का भी किया उल्लेख

नरेश चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि वकालत के अलावा वह कांग्रेस की राजनीति से भी जुड़े रहे हैं। उनके अनुसार सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने के कारण स्वाभाविक रूप से विभिन्न विचारधाराओं और मतभेदों वाले लोगों से भी उनका सामना होता है।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के कारण कुछ लोग उनके विरोधी भी हो सकते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसे संबोधन का उपयोग करता है, तो इससे उनकी सार्वजनिक छवि प्रभावित हो सकती है।

परिवार और रिश्तेदारों की नाराजगी बनी कारण

वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि लगातार इस प्रकार के संबोधन के कारण उनके परिवार और रिश्तेदारों ने भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि परिवार के सदस्यों को यह उचित नहीं लगता कि सार्वजनिक जीवन में एक वरिष्ठ अधिवक्ता को ऐसे नामों से पुकारा जाए।

इसी कारण उन्होंने इस विषय को गंभीरता से लेते हुए भविष्य में कानूनी कार्रवाई करने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान का संरक्षण होना चाहिए।

अब कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

नरेश चंद्र त्रिपाठी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि भविष्य में कोई भी व्यक्ति उन्हें ‘कट्टा गुरू’ या इसी प्रकार के किसी अन्य उपनाम से संबोधित करेगा, तो वह संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे।

उन्होंने कहा कि यह निर्णय किसी व्यक्तिगत विवाद के कारण नहीं, बल्कि अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान की रक्षा के उद्देश्य से लिया गया है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे उनके आधिकारिक नाम से ही संबोधित करें।

मानहानि से जुड़े कानूनी पहलू

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को ऐसा लगता है कि किसी कथन, टिप्पणी या संबोधन से उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच रहा है, तो वह भारतीय कानून के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है।

हालांकि, किसी भी मामले में यह न्यायालय और जांच के दौरान प्रस्तुत तथ्यों पर निर्भर करता है कि संबंधित परिस्थितियां मानहानि की श्रेणी में आती हैं या नहीं। इसलिए प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।

सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा का महत्व

सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों के संदर्भ में प्रयुक्त भाषा और संबोधन का विशेष महत्व होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसा नाम या उपनाम प्रयोग करने से बचना चाहिए, जिसे वह स्वयं स्वीकार न करता हो।

विशेष रूप से सोशल मीडिया के दौर में किसी भी संबोधन का तेजी से प्रसार हो सकता है। इसलिए जिम्मेदार संवाद और सम्मानजनक भाषा का उपयोग समाज में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।

सोशल मीडिया पर भी बढ़ी जिम्मेदारी

डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण किसी भी टिप्पणी या संबोधन का व्यापक प्रसार कुछ ही समय में हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी व्यक्ति के बारे में पोस्ट, टिप्पणी या उपनाम साझा करने से पहले उसकी सत्यता और उपयुक्तता का ध्यान रखा जाना चाहिए।

यदि कोई सामग्री किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है, तो संबंधित पक्ष कानूनी अधिकारों का उपयोग कर सकता है।

सम्मानजनक संवाद की जरूरत

लोकतांत्रिक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और सम्मान का भी ध्यान रखना आवश्यक है। किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व या सामान्य नागरिक के लिए सम्मानजनक भाषा का प्रयोग स्वस्थ सामाजिक संवाद को बढ़ावा देता है।

नरेश चंद्र त्रिपाठी के बयान ने एक बार फिर यह चर्चा शुरू कर दी है कि सार्वजनिक जीवन में उपनामों और अनौपचारिक संबोधनों का प्रयोग व्यक्ति की इच्छा और सम्मान के अनुरूप होना चाहिए।

कानपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता और बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष नरेश चंद्र त्रिपाठी ने स्पष्ट कर दिया है कि अब उन्हें ‘कट्टा गुरू’ या अन्य इसी प्रकार के नामों से संबोधित किया जाना स्वीकार नहीं है।

उन्होंने भविष्य में ऐसे मामलों में मानहानि की कानूनी कार्रवाई करने की बात कही है। फिलहाल उनका यह बयान सार्वजनिक चर्चा का विषय बना हुआ है और इससे सम्मानजनक संवाद तथा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के संरक्षण को लेकर नई बहस भी सामने आई है।

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