कानपुर में सीवेज से तैयार शोधित जल से चल रही पनकी पावर प्लांट की कूलिंग व्यवस्था, जल संरक्षण को मिली नई दिशा

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रिपोर्ट- विक्की रघुवंशी 

कानपुर: जल संरक्षण, अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग और सतत विकास की दिशा में कानपुर ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। जनपद के बिनगवां स्थित 40 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) क्षमता वाले टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट (टीटीपी) से तैयार होने वाला उच्च गुणवत्ता का शोधित जल अब पनकी थर्मल पावर प्लांट की कूलिंग व्यवस्था में उपयोग किया जा रहा है।

इससे न केवल ताजे पानी की खपत में उल्लेखनीय कमी आई है, बल्कि किसानों के लिए सिंचाई योग्य जल भी सुरक्षित रह रहा है।

इसी क्रम में जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट का निरीक्षण कर इसकी कार्यप्रणाली का जायजा लिया। उन्होंने अधिकारियों से परियोजना की तकनीकी व्यवस्था, जल शोधन प्रक्रिया, आपूर्ति प्रणाली और संचालन संबंधी जानकारी प्राप्त की। निरीक्षण के दौरान उन्होंने इस परियोजना को जल संरक्षण और औद्योगिक जल प्रबंधन की दिशा में एक प्रभावी पहल बताया।

249.92 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुई आधुनिक परियोजना

जिलाधिकारी ने बताया कि यह परियोजना लगभग 249.92 करोड़ रुपये की लागत से विकसित की गई है। इसका उद्देश्य सीवेज के शोधित जल को उच्च गुणवत्ता तक शुद्ध कर औद्योगिक उपयोग में लाना है। पहले जो शोधित सीवेज सीधे नदियों में प्रवाहित हो जाता था, अब उसी जल का वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से दोबारा उपयोग किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि इस पहल से प्राकृतिक जल संसाधनों पर दबाव कम हुआ है और जल संरक्षण के क्षेत्र में एक व्यवहारिक एवं दीर्घकालिक समाधान विकसित हुआ है। यह परियोजना “वेस्ट टू रिसोर्स” (Waste to Resource) की अवधारणा को भी मजबूती प्रदान करती है।

एसटीपी से टीटीपी तक होती है जल शोधन की प्रक्रिया

निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने जिलाधिकारी को बताया कि बिनगवां स्थित 210 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में सबसे पहले सीवेज का सेकेंडरी ट्रीटमेंट किया जाता है। इसके बाद शोधित जल को टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट में भेजा जाता है।

यहां अत्याधुनिक रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) और अल्ट्रा फिल्ट्रेशन (UF) मेम्ब्रेन आधारित तकनीक के माध्यम से जल का उन्नत स्तर पर शोधन किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद जल की गुणवत्ता इतनी बेहतर हो जाती है कि वह औद्योगिक उपयोग के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक जल में मौजूद सूक्ष्म अशुद्धियों, घुले हुए ठोस पदार्थों और अन्य अवांछित तत्वों को प्रभावी रूप से हटाने में सक्षम है, जिससे जल की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है।

प्रतिदिन 40 एमएलडी शोधित जल पहुंच रहा पनकी पावर प्लांट

टर्शियरी ट्रीटमेंट के बाद प्रतिदिन 40 एमएलडी उच्च गुणवत्ता का शोधित जल लगभग 18 किलोमीटर लंबी और 600 मिमी व्यास वाली पाइपलाइन के माध्यम से सीधे पनकी थर्मल पावर प्लांट तक पहुंचाया जाता है।

इस जल का उपयोग पावर प्लांट के कूलिंग टावरों और बॉयलर प्रणाली में किया जा रहा है। इससे संयंत्र को आवश्यक गुणवत्ता वाला पानी उपलब्ध हो रहा है और ताजे जल स्रोतों पर निर्भरता कम हुई है।

उच्च गुणवत्ता का जल क्यों है जरूरी?

जिलाधिकारी ने बताया कि थर्मल पावर प्लांट में सामान्य गुणवत्ता के पानी का उपयोग करने से उपकरणों में स्केलिंग (परत जमना) और जंग (Corrosion) जैसी तकनीकी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इससे मशीनों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और रखरखाव पर अतिरिक्त खर्च भी बढ़ जाता है।

इसी कारण पावर प्लांट के कूलिंग सिस्टम और बॉयलर में केवल उच्च गुणवत्ता के शोधित जल का उपयोग किया जाता है। आरओ और यूएफ तकनीक से तैयार यह जल संयंत्र की तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करता है और उपकरणों की कार्यक्षमता बनाए रखने में सहायक है।

किसानों के लिए बच रहा सिंचाई योग्य ताजा पानी

इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अब पनकी पावर प्लांट को सिंचाई योग्य ताजे पानी की आवश्यकता नहीं पड़ रही है। पहले जिस पानी का उपयोग औद्योगिक कार्यों में होता था, वह अब किसानों के लिए उपलब्ध हो रहा है।

जिलाधिकारी ने कहा कि इससे कृषि क्षेत्र को प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है। जल संरक्षण के इस मॉडल से खेती के लिए आवश्यक जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन संभव हुआ है, जो भविष्य में खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होगा।

नदियों में कम हो रहा अपशिष्ट जल का प्रवाह

परियोजना का एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय लाभ यह भी है कि अब बड़ी मात्रा में शोधित सीवेज सीधे नदियों में नहीं छोड़ा जा रहा है। इसके बजाय उसका पुनः उपयोग किया जा रहा है।

इससे नदियों में जाने वाले अपशिष्ट जल की मात्रा कम हुई है, जिसके परिणामस्वरूप जल प्रदूषण नियंत्रण में भी मदद मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश के अन्य शहरों में भी इसी प्रकार की परियोजनाएं लागू की जाएं, तो नदियों की स्वच्छता और जल गुणवत्ता में व्यापक सुधार संभव है।

टैरिफ पॉलिसी-2016 के तहत लागू हुई परियोजना

जिलाधिकारी ने बताया कि टैरिफ पॉलिसी-2016 के तहत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से 50 किलोमीटर की परिधि में स्थित थर्मल पावर स्टेशनों में शोधित सीवेज के उपयोग का प्रावधान किया गया है।

इसी नीति के अनुरूप बिनगवां में इस टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना की गई। परियोजना का निर्माण एनटीपीसी द्वारा कराया गया, जबकि इसका संचालन और अनुरक्षण उत्तर प्रदेश जल निगम (नगरीय) द्वारा किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि इस नीति का उद्देश्य प्राकृतिक जल संसाधनों पर दबाव कम करना तथा उद्योगों में वैकल्पिक जल स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देना है।

उत्तर प्रदेश का पहला आरओ-यूएफ आधारित टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट

जिलाधिकारी ने बताया कि आरओ एवं यूएफ मेम्ब्रेन आधारित तकनीक पर स्थापित यह उत्तर प्रदेश का पहला टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट है। यह परियोजना आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकों के उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल भविष्य में प्रदेश के अन्य औद्योगिक शहरों के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। यदि ऐसी परियोजनाओं का विस्तार किया जाता है, तो जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।

जल संरक्षण की दिशा में कानपुर बना उदाहरण

जल संकट और बढ़ती औद्योगिक जरूरतों के बीच कानपुर की यह परियोजना सतत विकास (Sustainable Development) की दिशा में एक उल्लेखनीय पहल के रूप में उभर रही है।

अपशिष्ट जल को वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से उपयोगी संसाधन में बदलना न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देता है, बल्कि जल संसाधनों के कुशल प्रबंधन का भी उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में जल संरक्षण की चुनौतियों को देखते हुए ऐसे नवाचारों की आवश्यकता और अधिक बढ़ेगी। कानपुर का यह टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट इस दिशा में एक सफल मॉडल बनकर सामने आया है, जो औद्योगिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और कृषि हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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