विश्व सर्पदंश दिवस पर PPN महाविद्यालय कानपुर में कार्यशाला हुई आयोजित, सर्पदंश से बचाव की दी जानकारी

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रिपोर्ट – हरी शंकर शर्मा

कानपुर: विश्व सर्पदंश दिवस के अवसर पर पीपीएन महाविद्यालय के जन्तु विज्ञान विभाग एवं आई.पी.आर. सेल के संयुक्त तत्वावधान में सर्पदंश जागरूकता विषय पर एक विशेष कार्यशाला एवं व्याख्यान का आयोजन किया गया।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य छात्र-छात्राओं को सर्पों के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने, सर्पदंश से बचाव के उपायों की जानकारी देने तथा प्राथमिक उपचार के संबंध में जागरूक बनाना था।

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने विषैले एवं विषहीन सर्पों की पहचान, सर्पदंश के बाद अपनाई जाने वाली सावधानियों तथा पर्यावरण संरक्षण में सर्पों की महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का शुभारम्भ महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. अनूप कुमार सिंह ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि विश्व सर्पदंश दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि समाज में वैज्ञानिक सोच और जागरूकता बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर भी है।

उन्होंने कहा कि आज भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सर्पदंश से जुड़ी अनेक भ्रांतियां प्रचलित हैं, जिनके कारण कई बार समय पर उचित उपचार नहीं मिल पाता। इसलिए विद्यार्थियों की जिम्मेदारी है कि वे सही जानकारी प्राप्त करें और उसे समाज तक पहुंचाने का कार्य करें।

उन्होंने आगे कहा कि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सर्पों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। खेतों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में सर्प चूहों एवं अन्य हानिकारक जीवों की संख्या नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। इसलिए लोगों को सर्पों के प्रति अनावश्यक भय रखने के बजाय वैज्ञानिक समझ विकसित करनी चाहिए। साथ ही, किसी भी सर्प को बिना कारण नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए।

मेडिकल विशेषज्ञ व्याख्यान में मिली वैज्ञानिक जानकारी

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. नीरज वर्मा ने सर्पदंश विषय पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि भारत में अनेक प्रकार के सर्प पाए जाते हैं, जिनमें सभी विषैले नहीं होते। हालांकि, आम लोगों में अधिकांश सर्पों को लेकर भय और भ्रम बना रहता है।

उन्होंने विषैले और विषहीन सर्पों के सामान्य लक्षणों की जानकारी देते हुए बताया कि किसी भी सर्प की पहचान केवल बाहरी स्वरूप के आधार पर करना हमेशा आसान नहीं होता। ऐसी स्थिति में सर्पदंश की घटना होने पर स्वयं अनुमान लगाने के बजाय तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना सबसे सुरक्षित विकल्प होता है।

डॉ. वर्मा ने यह भी बताया कि सर्पदंश के बाद घबराने की बजाय मरीज को शांत रखना चाहिए तथा उसे शीघ्र निकटतम स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल पहुंचाना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे सर्पदंश से जुड़े अंधविश्वासों और झाड़-फूंक जैसी परंपराओं के बजाय वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति पर विश्वास करें।

मॉडलों के माध्यम से दी गई व्यावहारिक जानकारी

कार्यशाला की विशेषता यह रही कि इसमें केवल व्याख्यान ही नहीं, बल्कि विभिन्न शैक्षणिक मॉडलों और प्रदर्शन सामग्री के माध्यम से भी विद्यार्थियों को जानकारी प्रदान की गई।

इस दौरान डॉ. बी.बी. विश्वास, डॉ. एस.पी. श्रीवास्तव, डॉ. शैलेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. साध्या पाण्डेय तथा डॉ. दिव्या मिश्रा ने विद्यार्थियों को सर्पों की संरचना, उनकी पहचान, प्राकृतिक व्यवहार तथा सर्पदंश की स्थिति में अपनाई जाने वाली सावधानियों के बारे में विस्तार से समझाया।

मेडिकल विशेषज्ञों ने बताया कि कई बार लोग सर्पदंश के बाद घबराकर ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो मरीज के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। वहीं, सही समय पर उचित चिकित्सा सहायता मिलने से अनेक मामलों में जान बचाई जा सकती है। इसलिए प्राथमिक उपचार की सही जानकारी समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचना आवश्यक है।

विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक लिया भाग

कार्यशाला के दौरान छात्र-छात्राओं ने विशेषज्ञों से अनेक प्रश्न पूछे और सर्पों से जुड़ी अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। इसके अलावा, मॉडल प्रदर्शन के माध्यम से उन्हें वास्तविक परिस्थितियों में अपनाई जाने वाली सावधानियों की भी जानकारी दी गई। विद्यार्थियों ने कार्यक्रम को ज्ञानवर्धक बताते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन उन्हें केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखते, बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी उपयोगी साबित होते हैं।

महाविद्यालय प्रशासन का मानना है कि इस तरह के जागरूकता कार्यक्रम विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को भी मजबूत करते हैं। यही कारण है कि महाविद्यालय समय-समय पर पर्यावरण, स्वास्थ्य और जनजागरूकता से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन करता रहता है।

पर्यावरण संरक्षण का भी दिया गया संदेश

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्प प्रकृति के महत्वपूर्ण जीव हैं और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में उनकी अहम भूमिका होती है। इसलिए लोगों को सर्प दिखाई देने पर घबराने या उन्हें नुकसान पहुंचाने के बजाय संबंधित वन विभाग या प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम को सूचना देनी चाहिए।

मेडिकल विशेषज्ञों ने कहा कि प्राकृतिक आवासों के लगातार नष्ट होने के कारण कई बार सर्प आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। ऐसे में, लोगों को सतर्क रहते हुए सुरक्षित व्यवहार अपनाना चाहिए तथा वन्यजीव संरक्षण के प्रति भी संवेदनशील रहना चाहिए।

बड़ी संख्या में शिक्षक रहे उपस्थित

इस अवसर पर महाविद्यालय के अनेक वरिष्ठ शिक्षक एवं शिक्षाविद उपस्थित रहे। कार्यक्रम में प्रो. डी.सी. कटियार, प्रो. सुशील शुक्ला, प्रो. निधि श्रीवास्तव सहित आई.पी.आर. कमेटी के सदस्य डॉ. यशवीर गौतम, डॉ. अनूप सिंह एवं डॉ. अनूप गुप्ता सहित अन्य शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी विशेषज्ञों, शिक्षकों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। अंततः यह कार्यशाला विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक और जागरूकता बढ़ाने वाली साबित हुई।

मेडिकल विशेषज्ञों ने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे कार्यक्रम भविष्य में भी आयोजित किए जाते रहेंगे, जिससे समाज में सर्पदंश के प्रति वैज्ञानिक सोच विकसित होगी और लोगों को सही समय पर उचित उपचार के महत्व की जानकारी मिल सकेगी।

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