IDBI बैंक के निजीकरण के विरोध में कानपुर में प्रदर्शन, कर्मचारियों ने फूलबाग मैदान में किया हल्ला बोल
रिपोर्ट- हनुमंत सिंह पिंटू
कानपुर। IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर अधिकारियों और कर्मचारियों का विरोध तेज हो गया है। सोमवार, 2 नवंबर 2026 को कानपुर के फूलबाग मैदान में United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। यह विरोध प्रदर्शन 2 और 3 नवंबर को आयोजित देशव्यापी दो दिवसीय भूख हड़ताल का हिस्सा है। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार से प्रस्तावित निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल रोकने और बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के स्वरूप को बनाए रखने की मांग की।
प्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों ने कहा कि IDBI बैंक को आर्थिक संकट से उबारने और मुनाफे की स्थिति तक पहुंचाने में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में बैंक के निजीकरण का फैसला उनके हितों के साथ-साथ सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था के भविष्य को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
संसद में दिए गए आश्वासन का हवाला देकर उठाए सवाल
प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों ने वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह की ओर से संसद के दोनों सदनों में दिए गए आश्वासन का उल्लेख किया। उनके अनुसार, उस समय सरकार ने IDBI में कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखने की बात कही थी। इसके अलावा संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट में भी सरकार की हिस्सेदारी बनाए रखने की सिफारिश की गई थी।
कर्मचारियों का सवाल है कि जब बैंक सार्वजनिक संसाधनों और कर्मचारियों की मेहनत से आर्थिक संकट तथा भारतीय रिजर्व बैंक के PCA (Prompt Corrective Action) ढांचे से बाहर निकलकर मुनाफे की स्थिति में पहुंचा है, तो फिर इसके निजीकरण की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है?
उनका कहना है कि बैंक के निजी हाथों में जाने से कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और भविष्य में सरकारी आरक्षण नीतियों के पालन को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
निजीकरण रोकने के लिए रखीं चार प्रमुख मांगें
IDBI बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों ने सरकार के सामने अपनी मांगें स्पष्ट रूप से रखी हैं। उनकी पहली मांग है कि M/s 10955230 Canada Inc., जिसे Fairfax Financial Holding Ltd. की पैरेंट एंटिटी बताया गया है, को बैंक की प्रस्तावित बिक्री तत्काल रोकी जाए।
दूसरी मांग है कि केंद्र सरकार बैंक में अपनी न्यूनतम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखे और जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए सॉवरेन गारंटी सुनिश्चित करे।
तीसरी मांग के तहत कर्मचारियों ने सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और आरक्षण नीतियों की लिखित गारंटी देने की मांग की है। वहीं, चौथी मांग में बैंक में होने वाली नियुक्तियों के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र को सुरक्षित रखने पर जोर दिया गया है।
केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने भी आंदोलन को दिया समर्थन
इस आंदोलन को विभिन्न केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का भी समर्थन मिला है। 1 नवंबर को जारी प्रेस विज्ञप्ति में Joint Platform of Central Trade Unions ने IDBI बैंक कर्मचारियों के आंदोलन के प्रति एकजुटता जताई।
मंच ने प्रस्तावित बिक्री में 60.72 प्रतिशत इक्विटी हिस्सेदारी का उल्लेख करते हुए प्रक्रिया पर सवाल उठाए। इसके साथ ही Business world की 29 अक्टूबर की रिपोर्ट का हवाला देकर आरोप लगाया कि बोलीदाता का वित्तीय प्रस्ताव नया मूल्यांकन कराए जाने से पहले खोल दिया गया था और बाद में निर्धारित बेंचमार्क के मुकाबले प्रस्ताव कम रहा।
ट्रेड यूनियनों ने इस पूरे मामले की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने के साथ ही बिक्री प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।
राहुल गांधी ने भी कर्मचारियों की मांगों का किया समर्थन
IDBI बैंक के निजीकरण के विरोध को राजनीतिक समर्थन भी मिला है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 29 अक्टूबर को IDBI परिवार के नाम संदेश जारी कर कर्मचारियों की मांगों का समर्थन किया था।
उन्होंने अपने संदेश में सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की मौजूदा हिस्सेदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान में दोनों के पास लगभग 95 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो प्रस्तावित बिक्री के बाद घटकर 34 प्रतिशत रह जाएगी।
राहुल गांधी ने आशंका जताई कि निजीकरण से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए लागू आरक्षण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कर्मचारियों के हितों और सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग व्यवस्था की रक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कर्मचारियों ने कहा- सार्वजनिक बैंकिंग की रक्षा की लड़ाई
फूलबाग मैदान में हुए प्रदर्शन में कुमार रतन शुक्ला, श्रेयशी पांडेय, जय शंकर पाण्डे और सुनील कंडू सहित बड़ी संख्या में अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल हुए। सभी ने एकजुट होकर प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।
कर्मचारियों का कहना है कि यह आंदोलन केवल उनकी नौकरी और सेवा शर्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था, जमाकर्ताओं के हितों, संसदीय जवाबदेही और आर्थिक संप्रभुता से भी जुड़ा हुआ है।
इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मांग की कि बैंक के भविष्य से संबंधित कोई भी फैसला लेते समय कर्मचारियों, जमाकर्ताओं और आम जनता के हितों को प्राथमिकता दी जाए।
प्रदर्शन के अंत में कर्मचारियों ने ‘IDBI बचाओ, सार्वजनिक बैंकिंग बचाओ’ का नारा बुलंद करते हुए दो दिवसीय देशव्यापी भूख हड़ताल के माध्यम से अपना विरोध जारी रखने का संकल्प जताया।

