कानपुर में सेवा की मिसाल बनी ‘भोले बाबा की रसोई’, मरीजों और तीमारदारों को मिलता है निःशुल्क भोजन
रिपोर्ट – शुभम साहू
कानपुर: समाज में जरूरतमंदों की सेवा और मानवता की भावना आज भी लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम कर रही है। इसी भावना की एक सुंदर मिसाल कानपुर नगर के घाटमपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में देखने को मिल रही है। यहां संचालित ‘भोले बाबा की रसोई’ अस्पताल में इलाज कराने आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए राहत का सहारा बनी हुई है। समाजसेवी संतोष टोपा की ओर से शुरू की गई यह पहल पिछले कई वर्षों से लगातार जारी है। इसके तहत प्रत्येक सोमवार को अस्पताल परिसर में मरीजों और उनके परिजनों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है। वहीं, प्रतिदिन सुबह मातृ एवं शिशु वार्ड में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों को चाय-बिस्कुट वितरित किए जाते हैं।
हर सोमवार मरीजों और तीमारदारों को मिलता है निःशुल्क भोजन
अस्पताल में इलाज कराने आने वाले मरीजों के साथ उनके परिजनों को भी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोगों के लिए अस्पताल में लंबे समय तक रुकना आसान नहीं होता। ऐसे में भोजन और चाय-नाश्ते की व्यवस्था करना भी कई बार चुनौती बन जाता है।
इसी जरूरत को समझते हुए समाजसेवी संतोष टोपा ने ‘भोले बाबा की रसोई’ के माध्यम से जरूरतमंदों की मदद का बीड़ा उठाया। इस रसोई के तहत प्रत्येक सोमवार को घाटमपुर सीएचसी परिसर में भोजन तैयार कर मरीजों और उनके तीमारदारों को निःशुल्क वितरित किया जाता है।
इस पहल की खास बात यह है कि भोजन वितरण से पहले भगवान भोलेनाथ को भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद भोजन को प्रसाद स्वरूप अस्पताल में मौजूद जरूरतमंद लोगों के बीच वितरित किया जाता है। इस व्यवस्था के कारण अस्पताल आने वाले कई परिवारों को भोजन के लिए बाहर जाने या अतिरिक्त खर्च करने की परेशानी से राहत मिलती है।
संतोष टोपा कई वर्षों से निभा रहे सेवा का संकल्प
‘भोले बाबा की रसोई’ के संचालक समाजसेवी संतोष टोपा पिछले कई वर्षों से इस सेवा कार्य को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि अस्पताल में परेशानियों के बीच समय बिता रहे मरीजों और उनके परिजनों को सहयोग और अपनत्व का एहसास कराना है।
संतोष टोपा के अनुसार, अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजन अक्सर पूरे दिन अपने परिवार के सदस्य की देखभाल में व्यस्त रहते हैं। कई बार आर्थिक स्थिति कमजोर होने या अन्य परेशानियों के कारण वे समय पर भोजन की व्यवस्था भी नहीं कर पाते। ऐसे में यदि उन्हें निःशुल्क भोजन मिल जाए तो उनकी कुछ चिंता कम हो सकती है।
उन्होंने बताया कि इसी मानवीय भावना के साथ इस रसोई का संचालन किया जा रहा है। उनका प्रयास है कि अस्पताल में आने वाला कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति भूखा न रहे और उसे कठिन समय में थोड़ी राहत मिल सके।
मातृ एवं शिशु वार्ड में प्रतिदिन चाय-बिस्कुट की व्यवस्था
भोले बाबा की रसोई की सेवा केवल सोमवार को होने वाले भोजन वितरण तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन सुबह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के मातृ एवं शिशु वार्ड में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों को चाय-बिस्कुट भी वितरित किए जाते हैं।
इससे विशेष रूप से उन परिवारों को सहूलियत मिलती है, जिन्हें अस्पताल में सुबह से ही मरीजों की देखभाल के लिए मौजूद रहना पड़ता है। चाय और बिस्कुट जैसी छोटी-सी व्यवस्था भी उनके लिए काफी मददगार साबित होती है।
दरअसल, अस्पताल में इलाज के दौरान मरीज के साथ आए परिजनों को कई बार अपनी जरूरतों को पीछे छोड़ना पड़ता है। ऐसे में इस तरह की पहल उनके लिए केवल भोजन या नाश्ते की व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग और संवेदनशीलता का भी प्रतीक है।
स्थानीय लोगों और सीएचसी कर्मचारियों का मिल रहा सहयोग
इस सेवा कार्य को सफल बनाने में संतोष टोपा के साथ स्थानीय लोगों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों का भी सहयोग मिल रहा है। सामूहिक सहयोग से वर्षों से जारी यह पहल जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने का माध्यम बनी हुई है।
इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर इस प्रयास को सराहना भी मिल रही है। लोगों का मानना है कि समाज में ऐसे सेवा कार्यों की जरूरत है, जिनके माध्यम से बिना किसी भेदभाव के जरूरतमंदों की मदद की जा सके।
हालांकि, इस तरह की पहल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निरंतरता है। एक-दो दिन सेवा करना आसान हो सकता है, लेकिन वर्षों तक नियमित रूप से जरूरतमंदों की सहायता करते रहना समर्पण और सेवा भावना को दर्शाता है।
मानवता और सामाजिक सहयोग की पेश कर रही मिसाल
आज के समय में जब अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजनों को इलाज के साथ कई अन्य व्यवस्थाओं की चिंता भी रहती है, तब ‘भोले बाबा की रसोई’ जैसी पहल समाज के लिए प्रेरणादायक बन रही है।
संतोष टोपा की यह कोशिश बताती है कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। इच्छाशक्ति, संवेदनशीलता और दूसरों की मदद करने का भाव हो तो छोटी-सी पहल भी अनेक लोगों के जीवन में राहत ला सकती है।
कुल मिलाकर, घाटमपुर सीएचसी में संचालित ‘भोले बाबा की रसोई’ सेवा, समर्पण और सामाजिक सहभागिता की अनूठी मिसाल बन गई है। प्रत्येक सोमवार को भोजन वितरण और प्रतिदिन सुबह चाय-बिस्कुट की व्यवस्था के माध्यम से यह पहल मरीजों और तीमारदारों के लिए सहारा बनी हुई है।

