कानपुर में नवजात की मौत के बाद अस्पतालों पर गंभीर आरोप, फर्जी मेडिकल रिपोर्ट और वसूली की शिकायत
रिपोर्ट – हनुमंत सिंह पिंटू
कानपुर: कानपुर नगर में नवजात बच्ची की मौत के बाद दो निजी अस्पतालों के संचालकों पर इलाज में लापरवाही, कथित फर्जी मेडिकल रिपोर्ट तैयार करने और इलाज के नाम पर लाखों रुपये वसूलने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। किदवई नगर निवासी एडवोकेट अमन गुप्ता ने इस संबंध में पुलिस आयुक्त को शिकायती पत्र देकर पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। पीड़ित पिता ने मीडिया के सामने अपनी बात रखते हुए न्याय की गुहार लगाई है। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
प्रसव के बाद नवजात को दूसरे अस्पताल में किया गया रेफर
शिकायती पत्र के अनुसार, एडवोकेट अमन गुप्ता की पत्नी ऐश्वर्या गुप्ता को प्रसव पीड़ा होने पर 8 अक्टूबर 2026 को बर्रा बाईपास स्थित लाइफ लाइन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि उसी दिन शाम करीब 4:41 बजे ऑपरेशन के माध्यम से उनकी पत्नी ने एक पुत्री को जन्म दिया।
परिजनों के मुताबिक, जन्म के बाद नवजात बच्ची को सांस लेने में परेशानी होने लगी। इस पर अस्पताल प्रशासन ने आवश्यक मशीन उपलब्ध न होने की बात कहते हुए बच्ची को बेहतर उपचार के लिए किदवई नगर स्थित आत्माराम चाइल्ड केयर एंड क्रिटिकल केयर अस्पताल ले जाने की सलाह दी।
इसके बाद परिजन नवजात को आत्माराम चाइल्ड केयर एंड क्रिटिकल केयर अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसे भर्ती कराया गया। शिकायत में अस्पताल के संचालक डॉ. प्रदीप कुमार और डॉ. विनय बाजपेयी का उल्लेख करते हुए इलाज की प्रक्रिया और बिलिंग को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
इलाज के नाम पर 2.25 लाख रुपये नकद लेने का आरोप
अमन गुप्ता का आरोप है कि नवजात को भर्ती करने के बाद अस्पताल में इलाज शुरू करने के नाम पर शुरुआती तौर पर 50 हजार रुपये नकद जमा कराए गए। इसके बाद अगले कुछ दिनों में अलग-अलग मदों में भुगतान की मांग की गई।
शिकायतकर्ता के अनुसार, इस दौरान उनसे कुल 2 लाख 25 हजार रुपये नकद लिए गए। इसके अतिरिक्त कैशलेस बीमा के माध्यम से भी काफी धनराशि का भुगतान होने का दावा किया गया है।
पीड़ित पिता ने आरोप लगाया कि अस्पताल की ओर से उपचार और अन्य खर्चों के संबंध में जो जानकारी दी गई, वह संदेह पैदा करने वाली थी। हालांकि, भुगतान की वास्तविक स्थिति, बिलों की वैधता और बीमा के तहत किए गए दावों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और जांच के आधार पर ही हो सकेगी।
इलाज और वेंटिलेटर पर रखने की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
शिकायत में अमन गुप्ता ने आरोप लगाया कि बच्ची को शुरुआत में ऑक्सीजन पर रखा गया और बाद में संक्रमण तथा मस्तिष्क से जुड़ी परेशानी होने की जानकारी दी गई। उनके मुताबिक, नवजात को लगभग तीन दिनों तक वेंटिलेटर पर रखा गया।
इसी दौरान उन्होंने बच्ची के उपचार से संबंधित ब्लड सैंपल, जांच रिपोर्ट और अन्य चिकित्सकीय दस्तावेज मांगे। आरोप है कि अस्पताल की ओर से उपलब्ध कराई गई पैथोलॉजी रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर उन्हें संदेह हुआ। उनका दावा है कि दस्तावेजों की जांच और क्रॉस-चेक कराने की मांग के बाद रिपोर्ट में कथित गड़बड़ियां सामने आईं।
अमन गुप्ता का कहना है कि उन्होंने बच्ची के रक्त का दोबारा सैंपल लेकर जांच कराने की मांग की थी, ताकि रिपोर्ट की वास्तविकता स्पष्ट हो सके। हालांकि, उनके अनुसार, अगले दिन सुबह करीब नौ बजे उन्हें बच्ची की मौत की सूचना दे दी गई।
नवजात की मौत के बाद परिवार ने उपचार के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया, जांच रिपोर्टों और अस्पताल की ओर से दी गई जानकारी पर सवाल उठाए हैं। इन परिस्थितियों में निष्पक्ष चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उपचार निर्धारित चिकित्सा मानकों के अनुसार हुआ था या नहीं।
मेडिकल रिपोर्ट और बिलों में हेरफेर का दावा
पीड़ित पिता ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि बच्ची की मौत के बाद उन्होंने अपने रिश्तेदारों के साथ अस्पताल से मिले बिलों और मेडिकल रिपोर्टों का विस्तार से अवलोकन किया। इस दौरान उन्हें कई दस्तावेजों में कथित विसंगतियां दिखाई दीं।
उनका दावा है कि रिपोर्टों में दर्ज विभिन्न चिकित्सकीय मानकों और जानकारियों में हेरफेर किया गया था। साथ ही, उन्होंने आरोप लगाया कि अस्पताल की ओर से मूल बिल उपलब्ध कराने के बजाय केवल फोटोकॉपी दी गई।
यदि जांच में मेडिकल रिपोर्टों में जानबूझकर बदलाव, गलत बिलिंग या अन्य अनियमितताओं की पुष्टि होती है, तो यह मरीजों और उनके परिजनों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला हो सकता है। इसलिए शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच मूल मेडिकल रिकॉर्ड, प्रयोगशाला के दस्तावेजों, भुगतान की रसीदों और बीमा संबंधी रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
विरोध करने पर धमकी देने का भी आरोप
अमन गुप्ता ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने अस्पताल प्रबंधन के सामने दस्तावेजों और बिलों को लेकर आपत्ति जताई, तो डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों ने कथित तौर पर पुलिस बुलाकर उन्हें अस्पताल से बाहर निकलवाने की धमकी दी।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, इसी दौरान नवजात बच्ची का शव उन्हें सौंप दिया गया। इस घटनाक्रम ने परिवार की परेशानियों को और बढ़ा दिया। पीड़ित पिता का कहना है कि वह अपनी बच्ची की मौत के कारणों और इलाज के दौरान सामने आई कथित अनियमितताओं की सच्चाई जानना चाहते हैं।
हालांकि, अस्पताल प्रबंधन का पक्ष और संबंधित दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि सामने आना भी आवश्यक है, ताकि मामले के सभी पहलुओं को निष्पक्ष तरीके से समझा जा सके।
पुलिस आयुक्त से उच्चस्तरीय जांच की मांग
पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्होंने पहले स्थानीय थाने में भी शिकायत देकर कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन उनके अनुसार, मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद एडवोकेट अमन गुप्ता ने पुलिस आयुक्त, कानपुर नगर को शिकायती पत्र देकर हस्तक्षेप की मांग की।
उन्होंने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने, संबंधित अस्पतालों के रिकॉर्ड की जांच करने तथा आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करने की अपील की है।
यह मामला निजी अस्पतालों में नवजातों के उपचार, चिकित्सकीय दस्तावेजों की पारदर्शिता और मरीजों के परिजनों को सही जानकारी उपलब्ध कराने जैसे महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच के साथ-साथ संबंधित पक्षों का बयान और उपलब्ध साक्ष्य निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
फिलहाल, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच के निष्कर्ष सामने आना बाकी है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति या अस्पताल को दोषी ठहराने से पहले तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पीड़ित पिता को उम्मीद है कि पुलिस प्रशासन मामले की गंभीरता को देखते हुए उचित कदम उठाएगा और उन्हें न्याय मिलेगा।

