बांदा सीओ नरैनी पर डेढ़ लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप, डीआईजी को सौंपी गई जांच
रिपोर्ट – शानू वर्मा
बांदा, उत्तर प्रदेश। बांदा जिले में नरैनी क्षेत्र के क्षेत्राधिकारी (सीओ) प्रवीण यादव पर एक पत्रकार को मुकदमे में फंसाने की धमकी देकर डेढ़ लाख रुपये की कथित रिश्वत मांगने का आरोप लगा है। पीड़ित पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय की शिकायत पर प्रयागराज जोन के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) ज्योति नारायण ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी), चित्रकूटधाम मंडल को जांच के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को पूरे प्रकरण की बिंदुवार और निष्पक्ष जांच करने को कहा गया है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
एडीजी से मिलकर पत्रकार ने की शिकायत
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय ने शुक्रवार को प्रयागराज में एडीजी ज्योति नारायण से मुलाकात की और उन्हें लिखित प्रार्थना पत्र सौंपा। शिकायत में उन्होंने सीओ नरैनी प्रवीण यादव पर दबाव बनाने और डेढ़ लाख रुपये की मांग करने का आरोप लगाया है। पत्रकार का दावा है कि रकम नहीं देने पर उन्हें एक मुकदमे में फंसाकर जेल भेजने की धमकी दी गई।
पत्रकार ने अपनी शिकायत में कहा है कि यह मामला मुकदमा संख्या 187/2026 से जुड़ा हुआ है। उनका आरोप है कि संबंधित प्रकरण के दौरान उन पर लगातार दबाव बनाया गया। इसके साथ ही, उन्होंने दावा किया कि कथित बातचीत और धमकी से संबंधित कुछ इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी उनके पास उपलब्ध हैं।
इन साक्ष्यों में कॉल रिकॉर्डिंग, व्हाट्सऐप चैट, स्क्रीनशॉट और अन्य डिजिटल सामग्री शामिल होने की बात कही गई है। पत्रकार ने इन्हें जांच अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने की इच्छा जताई है, ताकि मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
2 सितंबर को वीडियो और हलफनामा साझा करने का मामला
शिकायत के अनुसार, घटनाक्रम की शुरुआत 2 सितंबर को हुई, जब पत्रकार ने अनुज कुमार नामक व्यक्ति का एक वीडियो बयान और हलफनामा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तथा पत्रकारों के व्हाट्सऐप समूहों में साझा किया था।
पत्रकार का कहना है कि इस वीडियो में संबंधित व्यक्ति ने अपने साथ मारपीट, गाली-गलौज और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के आरोपों से इनकार किया था। शिकायतकर्ता के मुताबिक, वीडियो में अनुज कुमार ने मामले में कार्रवाई की मांग नहीं करने की बात भी कही थी।
हालांकि, इस वीडियो और हलफनामे में किए गए कथित दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। किसी मामले में बयान बदलने, शिकायत वापस लेने या कार्रवाई नहीं चाहने की बात सामने आने मात्र से पहले दर्ज आरोपों की सत्यता या असत्यता स्वतः साबित नहीं होती। इसलिए पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
दोबारा बयान दर्ज कराने और पत्रकार को मामले में घसीटने का आरोप
पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया है कि वीडियो साझा किए जाने के बाद मामले में दोबारा बयान दर्ज कराए गए और उन्हें भी प्रकरण में शामिल करने का प्रयास किया गया।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने दावा किया कि केस से संबंधित एक प्रार्थना पत्र पर कथित पीड़ित के हस्ताक्षर नहीं हैं। इस बिंदु पर भी जांच के माध्यम से दस्तावेज की प्रामाणिकता और उससे जुड़े तथ्यों का सत्यापन किया जाना आवश्यक है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, 2 सितंबर से 11 सितंबर के बीच कथित तौर पर सीओ के गनर के मोबाइल फोन और संबंधित व्हाट्सऐप नंबर के माध्यम से उन पर रुपये देने का दबाव बनाया गया। उन्होंने इस अवधि के दौरान हुई बातचीत और संदेशों की जांच कराने की मांग की है।
फिलहाल, इन आरोपों के संबंध में संबंधित अधिकारी का पक्ष और जांच के निष्कर्ष सामने आना बाकी है। इसलिए मामले को आरोपों के आधार पर ही देखा जाना चाहिए, न कि किसी को दोषी मानकर।
कॉल डिटेल और डिजिटल साक्ष्यों की जांच की मांग
पत्रकार ने एडीजी से मांग की है कि पूरे प्रकरण की तकनीकी जांच कराई जाए। इसमें कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), व्हाट्सऐप चैट, कथित कॉल रिकॉर्डिंग, स्क्रीनशॉट और वायरल वीडियो की जांच शामिल है।
उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का फॉरेंसिक परीक्षण कराने की भी मांग की है, जिससे बातचीत की प्रामाणिकता, संदेशों के समय और संबंधित डिजिटल सामग्री की विश्वसनीयता का पता लगाया जा सके।
ऐसे मामलों में तकनीकी साक्ष्यों का निष्पक्ष परीक्षण महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इससे शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि या खंडन करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, संबंधित पक्षों के बयान और दस्तावेजों का मिलान भी जांच का अहम हिस्सा होगा।
एडीजी द्वारा डीआईजी चित्रकूटधाम मंडल को जांच के निर्देश दिए जाने के बाद अब मामले में आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगी। उच्चाधिकारियों की निगरानी में जांच होने से शिकायत में उठाए गए विभिन्न बिंदुओं की अलग-अलग पड़ताल किए जाने की अपेक्षा है।
पत्रकार संगठनों ने दी आंदोलन की चेतावनी
इस मामले को लेकर स्थानीय पत्रकार संगठनों ने भी चिंता जताई है। संगठनों का कहना है कि यदि किसी पत्रकार को जनहित से जुड़े विषय पर खबर प्रकाशित या प्रसारित करने के कारण अनुचित दबाव का सामना करना पड़ता है, तो यह पत्रकारिता की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
पत्रकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि शिकायतकर्ता को न्याय नहीं मिला और जांच में दोषी पाए जाने वाले लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन करने पर विचार करेंगे। संगठनों की ओर से इस मामले को भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष उठाने की तैयारी किए जाने की बात भी कही गई है।
हालांकि, पत्रकार संगठनों की मांग के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि मामले की जांच निष्पक्ष तरीके से पूरी हो और किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही की जाए।
जांच के निष्कर्षों पर टिकी निगाहें
बांदा के नरैनी क्षेत्र से जुड़े इस प्रकरण में अब डीआईजी स्तर पर होने वाली जांच महत्वपूर्ण होगी। एक ओर पत्रकार ने रिश्वत मांगने और मुकदमे में फंसाने की धमकी देने के आरोप लगाए हैं, वहीं दूसरी ओर इन आरोपों की पुष्टि के लिए उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण जरूरी है।
जांच के दौरान कथित बातचीत, डिजिटल संदेशों, वीडियो, संबंधित दस्तावेजों और सभी पक्षों के बयानों का सत्यापन किया जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और आगे किस प्रकार की कार्रवाई उचित होगी।

