लखनऊ के 214 अस्पतालों में FSDA की छापेमारी, पढ़िए दवाओं की खरीद और MRP में मिला यह बड़ा अंतर
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दवाओं की कीमतों और अस्पतालों की फार्मेसी में दवा बिक्री को लेकर बड़ी कार्रवाई सामने आई है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की ओर से शहर के 214 अस्पतालों की फार्मेसी में छापेमारी और जांच की गई। इस दौरान कई दवाओं की खरीद कीमत और उनके अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच काफी अंतर पाए जाने की जानकारी सामने आई है।
जांच के दौरान कुछ ऐसी दवाएं भी सामने आईं, जिनकी खरीद अस्पतालों या संबंधित फार्मेसी द्वारा बेहद कम कीमत पर किए जाने की बात कही गई, जबकि उनका MRP कई गुना अधिक दर्ज था। अधिकारियों की जांच में 36 दवाओं की MRP उनकी खरीद कीमत से 10 गुना से अधिक होने की जानकारी सामने आई है। वहीं, कुछ दवाओं में खरीद मूल्य और MRP के बीच यह अंतर कई गुना तक पहुंच गया।
पॉलिमिक्सिन-बी इंजेक्शन की कीमत में बड़ा अंतर
FSDA की जांच में जिन दवाओं की कीमतों को लेकर अंतर सामने आया, उनमें पॉलिमिक्सिन-बी इंजेक्शन प्रमुख है। उपलब्ध जांच विवरण के अनुसार इस इंजेक्शन की खरीद कीमत करीब 74 रुपये दर्ज की गई, जबकि इसका MRP 4,981 रुपये पाया गया।
इस तरह खरीद मूल्य और MRP के बीच काफी बड़ा अंतर दिखाई देता है। इसी प्रकार गुफिपोल नाम की दवा की खरीद कीमत करीब 90 रुपये बताई गई, जबकि उसका MRP 4,528 रुपये दर्ज मिला।
इसके अलावा टर्लीप्रेसिन इंजेक्शन की खरीद कीमत करीब 56 रुपये और MRP 3,050 रुपये पाया गया। वहीं, कोलिस्टिमेथेट 4.5 MIU की खरीद करीब 210 रुपये में होने के बावजूद उसका MRP 9,702 रुपये दर्ज मिला।
टिगेसिसलिन इंजेक्शन में भी हजारों रुपये का अंतर
जांच में टिगेसिसलिन इंजेक्शन की कीमत में भी बड़ा अंतर सामने आने की जानकारी दी गई है। इसके अनुसार इस इंजेक्शन की खरीद कीमत करीब 154.54 रुपये थी, जबकि MRP 7,110 रुपये दर्ज मिली।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुछ दवाओं के खरीद मूल्य और निर्धारित MRP के बीच बहुत बड़ा अंतर है। हालांकि, किसी दवा की खरीद कीमत और MRP के बीच अंतर को सीधे तौर पर अस्पताल द्वारा वसूले गए अंतिम मरीज शुल्क के बराबर नहीं माना जा सकता। दवा की कीमत तय होने में निर्माता, वितरक, टैक्स, पैकेजिंग और अन्य व्यावसायिक कारकों की भूमिका भी हो सकती है। इसलिए पूरे मामले में संबंधित रिकॉर्ड और बिक्री मूल्य की जांच महत्वपूर्ण होगी।
36 दवाओं की MRP खरीद कीमत से 10 गुना से ज्यादा
FSDA की जांच के दौरान सामने आए आंकड़ों के अनुसार 36 दवाओं की MRP उनकी खरीद कीमत से 10 गुना से अधिक पाई गई। वहीं, कुछ दवाओं में खरीद कीमत और MRP का अंतर इससे भी काफी अधिक बताया गया है।
ऐसे में अस्पतालों की फार्मेसी में दवाओं की खरीद, स्टॉक और मरीजों को की गई बिक्री के रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। खासतौर पर उन दवाओं के मामले में जिनकी खरीद कीमत बेहद कम और MRP कई हजार रुपये दर्ज है।
निजी अस्पतालों की फार्मेसी पर उठे सवाल
FSDA की इस कार्रवाई के बाद निजी अस्पतालों की फार्मेसी में दवाओं की कीमतों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कुछ अस्पतालों में मरीजों को कम कीमत पर खरीदी गई दवाएं ऊंचे MRP पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और जांच के अंतिम निष्कर्षों के आधार पर ही की जानी चाहिए।
अस्पताल में भर्ती मरीज और उनके परिजन अक्सर चिकित्सकीय जरूरत के कारण अस्पताल की ही फार्मेसी से दवाएं खरीदते हैं। ऐसे में उन्हें दवा की वास्तविक कीमत, MRP और अस्पताल द्वारा वसूले गए मूल्य की जानकारी होना जरूरी है।
बेड फ्री, लेकिन दवाओं के खर्च पर निगरानी जरूरी
अस्पतालों में मरीजों को बेड या उपचार से जुड़ी कुछ सुविधाएं रियायती अथवा निशुल्क उपलब्ध होने के बावजूद दवाओं और अन्य मेडिकल सामग्री पर होने वाला खर्च परिवारों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसलिए दवाओं की कीमत में पारदर्शिता और बिलिंग व्यवस्था पर निगरानी आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार मरीजों को दवाओं का बिल, दवा का नाम, बैच नंबर, MRP और बिक्री मूल्य की जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसके अलावा अस्पतालों को दवा खरीद और बिक्री से संबंधित रिकॉर्ड भी नियमानुसार सुरक्षित रखना होता है।
FSDA की कार्रवाई से बढ़ी पारदर्शिता की उम्मीद
लखनऊ के 214 अस्पतालों की फार्मेसी में हुई जांच को दवा बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। खासकर उन मामलों में जहां खरीद मूल्य और MRP के बीच असामान्य अंतर दिखाई देता है, वहां रिकॉर्ड की विस्तृत जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल, सामने आए आंकड़ों के आधार पर यह जरूरी है कि संबंधित दवाओं की खरीद, स्टॉक, मरीजों को बिक्री और बिलिंग रिकॉर्ड का मिलान किया जाए। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं।
वहीं, मरीजों और उनके परिजनों के लिए भी यह जरूरी है कि वे दवाओं की खरीद पर बिल जरूर लें और बिल पर दर्ज दवा के नाम, मात्रा, MRP तथा बिक्री मूल्य को ध्यान से जांचें। यदि किसी अस्पताल की फार्मेसी में दवा की कीमत को लेकर संदेह हो तो संबंधित औषधि नियंत्रण विभाग में शिकायत की जा सकती है।
इस पूरी कार्रवाई से एक बार फिर अस्पतालों में दवा बिक्री की पारदर्शी व्यवस्था और मरीजों के हितों की निगरानी की जरूरत सामने आई है। FSDA की जांच के अंतिम निष्कर्ष और संबंधित अस्पतालों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई से मामले की वास्तविक स्थिति और अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

