बांदा के कमासिन में नाला निर्माण के नाम पर 6.44 लाख भुगतान का आरोप, जांच की उठी मांग – विस्तार से जरूर पढ़ें
रिपोर्ट – शैलेन्द्र शानू वर्मा
बांदा/बबेरू: उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के विकासखंड बबेरू की ग्राम पंचायत कमासिन में नाला निर्माण के नाम पर करीब 6.44 लाख रुपये के भुगतान को लेकर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि जिस कार्य के नाम पर सरकारी रिकॉर्ड में भुगतान दर्शाया गया है, मौके पर वैसा नया निर्माण दिखाई नहीं दे रहा है। ग्रामीणों ने मामले की जांच कराकर भुगतान और निर्माण कार्य से जुड़े रिकॉर्ड की पड़ताल कराने की मांग की है।
ग्रामीणों की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक ग्राम पंचायत कमासिन, जिसका LGD कोड 51345 बताया गया है, में ‘पुलिया से पप्पू के घर तक नाला निर्माण’ कार्य के नाम पर कुल 6 लाख 44 हजार 507 रुपये का भुगतान दर्ज है। आरोपों के अनुसार, भुगतान अलग-अलग वाउचर के माध्यम से किया गया और संबंधित कार्य के लिए एक निजी फर्म को भुगतान दर्शाया गया है।
नाला निर्माण के नाम पर अलग-अलग मदों में भुगतान का दावा
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ‘मेरी पंचायत’ ऐप पर इस कार्य से संबंधित कई भुगतान दर्ज होने की बात कही गई है। इनमें वाउचर संख्या P/7 के माध्यम से 22,244 रुपये, P/18 से 1,71,200 रुपये, P/19 से 97,500 रुपये मजदूरी के नाम पर और P/39 के माध्यम से 3,53,563 रुपये का भुगतान शामिल बताया गया है।
दावा है कि इन भुगतानों को SHRINETRA CONSTRUCTION नामक फर्म के पक्ष में किया गया। विशेष रूप से 10 सितंबर 2026 को 3,53,563 रुपये के भुगतान का उल्लेख किया गया है। इन सभी प्रविष्टियों की वास्तविकता और संबंधित कार्य से उनका संबंध जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस कार्य के लिए सरकारी रिकॉर्ड में भुगतान दर्ज है, वह मौके पर किस स्थिति में है और भुगतान के अनुरूप वास्तव में कितना काम हुआ है।
मौके की स्थिति को लेकर उठे सवाल
मामले में सबसे गंभीर सवाल मौके पर निर्माण कार्य की स्थिति को लेकर उठाया गया है। ग्रामीणों की ओर से बताया गया कि 10 सितंबर 2026 को संबंधित स्थल का निरीक्षण करने पर वहां नाला कचरे से भरा मिला। आरोप है कि मौके पर नया नाला निर्माण दिखाई नहीं दिया।
बताई गई लोकेशन के अनुसार वास्तविक स्थल GW84+2PX बताया गया है। वहीं, सरकारी ऐप पर कार्य से संबंधित अलग लोकेशन HP32+3M6 की तस्वीर अपलोड किए जाने का दावा किया गया है।
यदि जांच में यह अंतर सही पाया जाता है कि भुगतान वाले कार्य की वास्तविक लोकेशन और सरकारी रिकॉर्ड में अपलोड की गई तस्वीर की लोकेशन अलग है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु हो सकता है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम स्थिति संबंधित विभागीय जांच और तकनीकी सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगी।
एक ही कार्य में सचिव बदलने के बाद भी भुगतान का दावा
ग्रामीणों ने पंचायत में प्रशासनिक स्तर पर हुए बदलाव को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, इस कार्य से जुड़े समय में ग्राम पंचायत के सचिव धर्मेंद्र सिंह थे, जबकि वर्तमान में कुंवर पाल सिंह सचिव बताए जा रहे हैं। ग्राम प्रधान के रूप में रागिनी देवी का नाम बताया गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सचिव के बदलने के बावजूद संबंधित कार्य के नाम पर भुगतान की प्रक्रिया जारी रही। ऐसे में वे यह जानना चाहते हैं कि कार्य की स्वीकृति कब हुई, कार्यादेश किसके स्तर से जारी हुआ, मौके पर कितना निर्माण हुआ और अलग-अलग चरणों में भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किया गया।
इन सवालों के जवाब पंचायत के अभिलेख, माप पुस्तिका, भुगतान संबंधी दस्तावेज, तकनीकी रिपोर्ट और मौके के भौतिक सत्यापन से सामने आ सकते हैं।
रिकॉर्ड और मौके के सत्यापन से सामने आएगी वास्तविक स्थिति
ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के लिए सरकारी धनराशि खर्च की जाती है। ऐसे में किसी भी निर्माण कार्य के भुगतान के साथ उसके वास्तविक निष्पादन का सत्यापन महत्वपूर्ण होता है। नाला निर्माण जैसे कार्य में भी स्वीकृत लागत, कार्य की लंबाई-चौड़ाई, इस्तेमाल हुई सामग्री, मजदूरी, कार्य की तस्वीरें और भुगतान रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है।
कमासिन ग्राम पंचायत के इस मामले में भी यदि शिकायत के आधार पर जांच होती है तो अधिकारियों के लिए सरकारी पोर्टल पर दर्ज जानकारी और मौके की स्थिति का मिलान करना महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा संबंधित फर्म को किए गए भुगतान, मजदूरी भुगतान और कार्य की माप से जुड़े दस्तावेजों की भी जांच की जा सकती है।
ग्रामीणों ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग
मामला सामने आने के बाद ग्रामीणों ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में किसी निर्माण कार्य के लिए भुगतान किया गया है, तो मौके पर उसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
ग्रामीणों ने संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि मौके पर जाकर नाले का भौतिक सत्यापन कराया जाए। इसके साथ ही सरकारी ऐप पर अपलोड की गई तस्वीरों और लोकेशन की जांच, भुगतान से जुड़े वाउचर की पड़ताल तथा संबंधित फर्म और पंचायत स्तर के रिकॉर्ड का परीक्षण कराया जाए।
जांच के बाद ही तय होगी जिम्मेदारी
फिलहाल इस मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए भुगतान को लेकर उठाए गए सवालों और कथित अनियमितताओं को जांच के निष्कर्ष आने तक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि बिना निर्धारित निर्माण के भुगतान किया गया या सरकारी रिकॉर्ड में गलत जानकारी दर्ज की गई, तो संबंधित नियमों के तहत जिम्मेदारी तय की जा सकती है। वहीं, यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर किसी तकनीकी या दस्तावेजी कारण से पाया जाता है, तो उसकी भी स्थिति जांच में स्पष्ट हो सकती है।
कमासिन ग्राम पंचायत के इस प्रकरण ने ग्रामीण विकास कार्यों में पारदर्शिता, रिकॉर्ड की शुद्धता और मौके पर कार्य के सत्यापन को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं। अब ग्रामीणों की नजर प्रशासन की जांच और उसके निष्कर्ष पर है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि 6.44 लाख रुपये के भुगतान के पीछे वास्तविक निर्माण कितना हुआ और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी की स्थिति क्या है।

