डिजिटल अरेस्ट के नाम पर रिटायर्ड अधिकारी से 2.36 करोड़ की ठगी, सोनभद्र में तीन आरोपी गिरफ्तार
रिपोर्ट – ज्ञान प्रकाश चतुर्वेदी
सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में साइबर ठगी के एक बड़े मामले का पुलिस ने खुलासा किया है। साइबर थाना सोनभद्र ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर एक सेवानिवृत्त अधिकारी से करीब 2.36 करोड़ रुपये की ठगी करने वाले कथित गिरोह के तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने पीड़ित को वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों और शासन के अधिकारियों का भय दिखाकर कानूनी कार्रवाई का दबाव बनाया और अलग-अलग बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कराई।
पुलिस की कार्रवाई के दौरान ठगी की रकम में से करीब 75 लाख रुपये होल्ड/फ्रीज कराए गए हैं। इसके अलावा आरोपियों के कब्जे से ठगी के पैसों से खरीदी गई टाटा हैरियर कार, 2.10 लाख रुपये नकद, पांच एंड्रॉयड मोबाइल फोन और इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता का कथित फर्जी पहचान पत्र बरामद किया गया है। मामले की जांच अभी जारी है और पुलिस अन्य संदिग्ध बैंक खातों तथा मोबाइल नंबरों की भी निगरानी कर रही है।
बैंक प्रबंधक की सूचना से खुला मामला
पुलिस के मुताबिक, 22 सितंबर को एसबीआई के एक शाखा प्रबंधक ने साइबर पुलिस को सूचना दी कि एक सेवानिवृत्त कर्मचारी लगातार अलग-अलग बैंक खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर कर रहा है। बैंक स्तर पर पूछताछ के दौरान वह इन लेनदेन के संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं दे पा रहा था। सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच शुरू कर दी।
जांच आगे बढ़ने पर सामने आया कि पीड़ित कथित साइबर ठगों के संपर्क में था। आरोपियों ने खुद को प्रभावशाली सरकारी और न्यायिक अधिकारियों से जुड़ा बताकर पीड़ित पर दबाव बनाया। इसके बाद उसे लगातार कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया गया और डिजिटल अरेस्ट जैसी स्थिति में रखकर पैसे ट्रांसफर कराए गए।
पुलिस के अनुसार, पीड़ित से तीन अलग-अलग बैंक खातों में करीब 2.36 करोड़ रुपये ट्रांसफर कराए गए। साइबर पुलिस ने लेनदेन से जुड़े बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल साक्ष्यों की जांच शुरू की। इसी क्रम में पुलिस को आरोपियों तक पहुंचने में महत्वपूर्ण सुराग मिले।
AI और डीपफेक तकनीक से बनाया गया दबाव
पुलिस की जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने कथित तौर पर AI तकनीक, डीपफेक तस्वीरों और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। इन तकनीकों के जरिए पीड़ित के सामने ऐसा माहौल तैयार किया गया, जिससे उसे लगा कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस गया है।
इसके बाद कथित तौर पर लगातार फोन और डिजिटल माध्यमों से संपर्क कर उस पर रकम ट्रांसफर करने का दबाव बनाया गया। पुलिस का कहना है कि डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर तैयार किए गए फर्जी दस्तावेज और पहचान पत्र भी इस पूरी धोखाधड़ी का हिस्सा थे।
साइबर ठगी के ऐसे मामलों में अपराधी अक्सर पीड़ित को डराकर तुरंत निर्णय लेने के लिए मजबूर करते हैं। हालांकि, पुलिस की ओर से लोगों को लगातार सलाह दी जाती है कि किसी भी अधिकारी या जांच एजेंसी के नाम पर फोन आने पर घबराकर पैसा ट्रांसफर न करें और आधिकारिक माध्यम से मामले की पुष्टि करें।
प्रयागराज से मुख्य आरोपी गिरफ्तार
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और बैंक लेनदेन की जांच के आधार पर साइबर थाना और साइबर सेल की टीम मुख्य आरोपी अरुण कुमार दूबे तक पहुंची। पुलिस ने उसे प्रयागराज स्थित ओमेक्स अपार्टमेंट से गिरफ्तार किया।
पुलिस के अनुसार, पूछताछ और आरोपी की निशानदेही के आधार पर ठगी की रकम से खरीदी गई टाटा हैरियर कार और 2.10 लाख रुपये नकद बरामद किए गए। इसके साथ ही पांच एंड्रॉयड मोबाइल फोन और इलाहाबाद हाईकोर्ट अधिवक्ता का कथित फर्जी आईडी कार्ड भी पुलिस ने बरामद किया।
मामले में सहयोग करने वाली प्रियंका मिश्रा और तेजल को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। पुलिस अब आरोपियों के बीच भूमिका, पैसों के लेनदेन और गिरोह से जुड़े अन्य संभावित लोगों की जानकारी जुटा रही है।
75 लाख रुपये फ्रीज, अन्य खातों की निगरानी
साइबर पुलिस ने ठगी की रकम के प्रवाह का पता लगाने के लिए संबंधित बैंक खातों की जांच की। कार्रवाई के दौरान करीब 75 लाख रुपये होल्ड/फ्रीज कराने में सफलता मिली है। पुलिस का कहना है कि शेष रकम और उससे जुड़े लेनदेन की भी जांच की जा रही है।
इसके अलावा संदिग्ध बैंक खातों और मोबाइल नंबरों पर अलर्ट लगाया गया है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि आरोपियों ने इस तरीके से पहले भी किसी अन्य व्यक्ति को निशाना बनाया था या नहीं।
संयुक्त टीम ने की कार्रवाई
यह कार्रवाई पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा के निर्देशन में की गई। अपर पुलिस अधीक्षक ऑपरेशन ऋषभ रुणवाल और क्षेत्राधिकारी साइबर हर्ष पाण्डेय के पर्यवेक्षण में साइबर थाना, साइबर सेल, स्वाट और ओबरा पुलिस की संयुक्त टीम ने कार्रवाई को अंजाम दिया।
पुलिस ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, बैंक लेनदेन और अन्य तकनीकी जानकारी को जांच का आधार बनाया। फिलहाल गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ जारी है और मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए सावधानी जरूरी
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी में अपराधी अक्सर पुलिस, सीबीआई, कोर्ट या अन्य सरकारी संस्थाओं के नाम का इस्तेमाल करके लोगों पर दबाव बनाते हैं। ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है कि व्यक्ति घबराकर कोई आर्थिक लेनदेन न करे।
यदि किसी व्यक्ति को फोन पर गिरफ्तारी, मुकदमे या जांच के नाम पर बैंक खाते में पैसा जमा करने के लिए कहा जाता है, तो उसे तत्काल संबंधित संस्था के आधिकारिक नंबर या नजदीकी पुलिस स्टेशन से सत्यापन करना चाहिए। साथ ही संदिग्ध कॉल, संदेश, मोबाइल नंबर और बैंक लेनदेन से जुड़ी जानकारी सुरक्षित रखनी चाहिए।
सोनभद्र की इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह दिखाया है कि साइबर अपराधी तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करते समय सतर्कता और किसी भी संदिग्ध मांग की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना बेहद महत्वपूर्ण है।

