लखनऊ में बढ़ी आवारा कुत्तों की संख्या, सात साल में 10 हजार से अधिक का इजाफा
रिपोर्ट – डिजिटल उप्रन्यूज़
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या शहर के लिए एक महत्वपूर्ण शहरी प्रबंधन का मुद्दा बनती जा रही है। पशु गणना 2025 की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, शहर में आवारा कुत्तों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2019 में लखनऊ में करीब 75 हजार आवारा कुत्ते दर्ज किए गए थे, जबकि अब इनकी संख्या बढ़कर करीब 86 हजार हो गई है।
इस तरह करीब सात वर्षों की अवधि में आवारा कुत्तों की संख्या में 10 हजार से अधिक का इजाफा दर्ज किया गया है। हालांकि, इस वृद्धि के बीच नगर निकाय और संबंधित विभागों के सामने आवारा कुत्तों के प्रबंधन, नसबंदी और टीकाकरण जैसे कार्यों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने की चुनौती भी है।
सात साल में बढ़ी संख्या
पशु गणना 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में लखनऊ में लगभग 75 हजार आवारा कुत्ते थे। इसके बाद इनकी संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई और अब यह आंकड़ा करीब 86 हजार तक पहुंच गया है। यानी इस अवधि में करीब 11 हजार की वृद्धि हुई है।
शहर के तेजी से विस्तार और आबादी बढ़ने के साथ आवारा पशुओं के प्रबंधन की आवश्यकता भी बढ़ी है। खासतौर पर आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए वैज्ञानिक और मानवीय तरीके अपनाने पर जोर दिया जाता रहा है।
नसबंदी और टीकाकरण पर जोर जरूरी
आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम यानी Animal Birth Control (ABC) के तहत नसबंदी को महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है। इसके साथ ही कुत्तों का एंटी-रेबीज टीकाकरण भी आवश्यक है। इससे एक ओर उनकी आबादी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर रेबीज जैसी बीमारी के प्रसार का जोखिम भी कम किया जा सकता है।
लखनऊ जैसे बड़े शहर में यह काम केवल एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए नगर निकाय, पशुपालन विभाग, पशु कल्याण संगठनों और स्थानीय नागरिकों के बीच समन्वय आवश्यक है। साथ ही नसबंदी और टीकाकरण के बाद पशुओं की निगरानी तथा रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है।
बढ़ती संख्या से सामने आती हैं कई चुनौतियां
आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या का असर शहर के अलग-अलग हिस्सों में देखा जा सकता है। बाजारों, रिहायशी इलाकों, पार्कों और खाली प्लॉटों के आसपास कुत्तों के झुंड दिखाई देना आम बात है। इससे नागरिकों के लिए असुविधा की स्थिति पैदा हो सकती है।
इसके अलावा, भोजन की उपलब्धता और कचरे का खुले में पड़ा रहना भी आवारा कुत्तों की मौजूदगी को बढ़ावा दे सकता है। इसलिए केवल कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करना ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ शहर में कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाना भी जरूरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जहां खुले में खाद्य कचरा अधिक होता है, वहां आवारा पशुओं के जमा होने की संभावना भी बढ़ती है। ऐसे में नगर निकाय को नियमित कूड़ा उठाने, खुले में कचरा न छोड़ने और कचरा निस्तारण की व्यवस्था को मजबूत करने पर भी ध्यान देना चाहिए।
नागरिकों की भी अहम भूमिका
आवारा कुत्तों के प्रबंधन में स्थानीय नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। नागरिकों को खुले स्थानों पर खाने का कचरा नहीं डालना चाहिए। इसके अलावा, यदि किसी इलाके में बड़ी संख्या में आवारा कुत्ते मौजूद हैं तो इसकी सूचना संबंधित नगर निकाय या पशु चिकित्सा विभाग को दी जा सकती है।
वहीं, नागरिकों और पशु प्रेमियों के बीच जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है। आवारा पशुओं के साथ मानवीय व्यवहार बनाए रखते हुए उनकी नसबंदी और टीकाकरण सुनिश्चित करने से समस्या के दीर्घकालिक समाधान की दिशा में काम किया जा सकता है।
वैज्ञानिक तरीके से समाधान की जरूरत
लखनऊ में आवारा कुत्तों की संख्या का 75 हजार से बढ़कर करीब 86 हजार होना यह संकेत देता है कि इस विषय पर दीर्घकालिक योजना की जरूरत है। इसके लिए नियमित पशु गणना, क्षेत्रवार आंकड़ों का रिकॉर्ड, नसबंदी अभियान की निगरानी और टीकाकरण की स्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है।
इसके साथ ही उन इलाकों की पहचान भी की जा सकती है जहां आवारा कुत्तों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। इसके आधार पर प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अभियान चलाकर संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, पशु गणना 2025 के आंकड़े लखनऊ में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। ऐसे में प्रशासन के साथ नागरिकों की भागीदारी भी जरूरी है। वैज्ञानिक पशु जन्म नियंत्रण, नियमित टीकाकरण, बेहतर कचरा प्रबंधन और जनजागरूकता के जरिए इस चुनौती का व्यवस्थित समाधान तलाशा जा सकता है।

