2014 के बाद CCL का कायापलट: बढ़ा कोयला उत्पादन, आधुनिक खनन और सतत विकास पर जोर

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Digital UPNews Desk

नई दिल्ली/रांची। भारतीय कोयला क्षेत्र में वर्ष 2014 के बाद उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, बेहतर परिवहन व्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। झारखंड के प्रमुख कोयला क्षेत्रों में काम करने वाली कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनी सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आई है।

पिछले एक दशक में सीसीएल ने केवल कोयला उत्पादन बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि खनन क्षमता के विस्तार, मशीनीकरण, रेलवे कनेक्टिविटी, कोयला निकासी की आधुनिक व्यवस्था, नवीकरणीय ऊर्जा और सामुदायिक विकास के क्षेत्रों में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

50 एमटी से बढ़कर 87.5 एमटी हुआ उत्पादन

सीसीएल के परिवर्तन का सबसे प्रमुख संकेत उसके उत्पादन आंकड़ों में दिखाई देता है। वित्त वर्ष 2013-14 में कंपनी का कोयला उत्पादन करीब 50 मिलियन टन (एमटी) था। वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 में उत्पादन बढ़कर 87.5 एमटी पहुंच गया। यह कंपनी के इतिहास का अब तक का सबसे अधिक वार्षिक उत्पादन बताया गया है।

इस तरह लगभग एक दशक की अवधि में सीसीएल के उत्पादन में करीब 75 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस वृद्धि के पीछे नई खदानों के विकास और मौजूदा परियोजनाओं की क्षमता बढ़ाने की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

कंपनी ने अमरापली, मगध, चंद्रगुप्त ओसीपी और कोट्रे बसंतपुर पचमो जैसी परियोजनाओं के विकास के साथ अपनी उत्पादन क्षमता को विस्तार दिया है। इसके अलावा कारो, कोनार और उत्तरी उरीमारी जैसी मौजूदा खदानों की क्षमता में भी वृद्धि की गई है। वहीं, कई नई खदानें और विस्तार परियोजनाएं भविष्य की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए पाइपलाइन में हैं।

रेलवे और आधुनिक निकासी व्यवस्था पर जोर

हालांकि, उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। खदानों से निकले कोयले को उपभोक्ताओं तक तेजी से और कम लागत में पहुंचाने के लिए मजबूत परिवहन व्यवस्था भी जरूरी है। इसलिए सीसीएल ने रेलवे कनेक्टिविटी, कोल हैंडलिंग प्लांट (CHP), साइलो, फास्ट लोडिंग सिस्टम और फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी (FMC) जैसी परियोजनाओं पर जोर दिया है।

उत्तरी करणपुरा कोयला क्षेत्र के लिए तोरी-शिवपुर रेल कॉरिडोर महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में शामिल है। तीन लेन वाले इस कॉरिडोर की परिवहन क्षमता करीब 100 एमटी प्रतिवर्ष बताई गई है।

इसी क्रम में उत्तरी उरीमारी सीएचपी, जिसकी क्षमता 7.5 एमटीवाई है, चालू हो चुका है। वहीं कोनार, केडीएच-पूर्णाडीह, अमरापली, कारो और मगध में भी सीएचपी परियोजनाओं का विकास किया जा रहा है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य सड़क परिवहन पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ कोयले की लोडिंग और रेल के माध्यम से निकासी को अधिक प्रभावी बनाना है।

घरेलू कोकिंग कोयले पर बढ़ा फोकस

भारत के इस्पात उद्योग के लिए कोकिंग कोयला बेहद महत्वपूर्ण है और इसकी घरेलू उपलब्धता बढ़ाना आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में अहम माना जाता है। इसी उद्देश्य से सीसीएल कुल 14.50 एमटीवाई क्षमता वाली पांच नई कोकिंग कोयला वाशरी विकसित कर रही है।

इन परियोजनाओं से घरेलू स्तर पर गुणवत्तापूर्ण धुले हुए कोकिंग कोयले की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। इसके परिणामस्वरूप इस्पात क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने और आयात पर निर्भरता कम करने में योगदान मिल सकता है।

AI और तकनीक से बदली निगरानी व्यवस्था

तकनीकी बदलाव भी सीसीएल के परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कंपनी ने सुरक्षा, निगरानी और परिचालन गतिविधियों को बेहतर बनाने के लिए AI आधारित Integrated Command and Control Centre (ICCC) स्थापित किया है।

यह केंद्र आधुनिक तकनीकों को एकीकृत करते हुए वास्तविक समय में निगरानी और निर्णय लेने में सहायता करता है। इस प्रकार, पारंपरिक खनन व्यवस्था के साथ डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण

सीसीएल ने ऊर्जा क्षेत्र में भी विविधीकरण की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। कंपनी के पास 32 मेगावाट से अधिक की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता है, जिसमें 29 मेगावाट की संयुक्त क्षमता वाली तीन ग्राउंड-माउंटेड सौर परियोजनाएं शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त गिरिडीह जिले में बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम के साथ 100 मेगावाट की मेगा सौर परियोजना निर्माणाधीन है। इससे कंपनी के ऊर्जा मिश्रण में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने और उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है।

साथ ही, सीसीएल ने सतही खनन यंत्र और निरंतर खनन यंत्र जैसी विस्फोट-रहित तकनीकों को अपनाया है। कंपनी की ओर से ऊपरी परत की मिट्टी का वैज्ञानिक पुनर्स्थापन, वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण और खदान सुधार जैसे उपाय भी किए जा रहे हैं।

2014 से पहले सतही खनन यंत्रों और निरंतर खनन यंत्रों से उत्पादन शून्य था, जबकि अब इनकी हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत तक पहुंचने की बात कही गई है।

वित्तीय स्थिति में भी मजबूती

परिचालन विस्तार के साथ सीसीएल की वित्तीय स्थिति में भी उल्लेखनीय बदलाव दर्ज हुआ है। कंपनी का कर पश्चात लाभ (PAT) वित्त वर्ष 2017-18 में 808 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 4,035 करोड़ रुपये हो गया।

इसी अवधि में कंपनी की नेटवर्थ भी 3,816 करोड़ रुपये से बढ़कर 16,464 करोड़ रुपये हो गई। ये आंकड़े कंपनी की वित्तीय क्षमता में हुए विस्तार को दर्शाते हैं।

CSR के जरिए शिक्षा और खेल को बढ़ावा

सीसीएल के परिवर्तन का सामाजिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने करीब 74 करोड़ रुपये के CSR लक्ष्य के मुकाबले लगभग 86 करोड़ रुपये का CSR व्यय किया।

कंपनी की प्रमुख पहलों में ‘सीसीएल के लाल एवं सीसीएल की लाडली’ कार्यक्रम शामिल है। इसके तहत वंचित पृष्ठभूमि के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आवासीय शिक्षा और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए सहायता दी जाती है। हर वर्ष 40 विद्यार्थियों, जिनमें 20 लड़के और 20 लड़कियां शामिल हैं, का चयन किया जाता है। इस पहल से कई विद्यार्थियों को IIT, NIT और अन्य प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थानों में उच्च शिक्षा के अवसर मिले हैं।

इसी तरह रांची के खेलगांव में सीसीएल और झारखंड सरकार की साझेदारी से स्थापित खेल अकादमी भी युवाओं को खेल और शिक्षा के अवसर उपलब्ध करा रही है। अकादमी के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धियां हासिल की हैं। इस पहल को दो बार राष्ट्रीय CSR पुरस्कार भी मिल चुका है।

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