पश्चिमी यूपी में गुर्जर वोट पर सपा का फोकस, 100 सीटों पर नए सियासी समीकरण की तैयारी

ChatGPT Image Sep 18, 2026, 02_43_38 PM

Digital UP News Desk

मेरठ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर पश्चिमी यूपी में सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) ने क्षेत्र में गुर्जर समाज के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर फोकस किया है। पार्टी के नेताओं का दावा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की करीब 100 विधानसभा सीटों पर गुर्जर मतदाताओं का प्रभाव है और इसी आधार पर सपा अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

पार्टी की रणनीति में गुर्जर समाज को पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, चुनाव में किसी भी दल की सफलता कई सामाजिक, राजनीतिक और स्थानीय मुद्दों पर निर्भर करती है। ऐसे में सपा की यह कवायद फिलहाल चुनावी तैयारी और जनसंपर्क अभियान के तौर पर देखी जा रही है।

पश्चिमी यूपी में जातीय समीकरण पर नजर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान जातीय और सामाजिक समीकरण लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। अलग-अलग चुनावों में क्षेत्र के मतदाताओं की प्राथमिकताओं में बदलाव भी देखने को मिला है। इसी वजह से 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने में जुटे हैं।

सपा का मौजूदा फोकस खास तौर पर गुर्जर समाज पर दिखाई दे रहा है। पार्टी नेताओं के मुताबिक, गुर्जर मतदाताओं की प्रभावशाली मौजूदगी वाली सीटों पर संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ाई जा रही हैं। इसके तहत चौपाल, जनसंवाद और छोटी-बड़ी बैठकों के जरिए स्थानीय स्तर पर संपर्क अभियान चलाया जा रहा है।

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, सपा ने पश्चिमी यूपी और ब्रज क्षेत्र में पीडीए अभियान के तहत अपने गुर्जर नेताओं को भी सक्रिय किया है।

सपा के आंतरिक आकलन में 132 सीटों का दावा

सपा से जुड़े सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि पार्टी के आंतरिक आकलन में उत्तर प्रदेश के करीब 34 जिलों की लगभग 132 विधानसभा सीटों पर गुर्जर मतदाताओं की उल्लेखनीय मौजूदगी बताई गई है। पार्टी के दावे के मुताबिक, इनमें करीब 76 सीटें ऐसी हैं, जहां गुर्जर मतदाताओं की संख्या 10 हजार से अधिक है।

इसी आकलन में लगभग 31 विधानसभा सीटों पर गुर्जर मतदाताओं की संख्या 25 हजार से अधिक होने का दावा किया गया है। पश्चिमी यूपी की करीब 20 से 24 सीटों पर गुर्जर समाज को प्रभावशाली माना जाता है। हालांकि, इन आंकड़ों का स्वतंत्र आधिकारिक सत्यापन उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन्हें राजनीतिक दल के आकलन के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

गौतमबुद्ध नगर की दादरी, जेवर और नोएडा सीटों के साथ-साथ गाजियाबाद की लोनी और मेरठ की हस्तिनापुर जैसी सीटों का भी पार्टी की रणनीति में उल्लेख किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, लोनी में गुर्जर मतदाताओं की संख्या को लेकर अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में अनुमान दिए गए हैं।

गुर्जर नेताओं को दी जा रही अहम जिम्मेदारी

गुर्जर समाज के बीच जनसंपर्क बढ़ाने के लिए सपा ने अपने कई गुर्जर नेताओं को सक्रिय किया है। पार्टी के प्रदेश सचिव लल्ला गुर्जर ने हाल में पश्चिमी यूपी की करीब 100 सीटों पर गुर्जर समाज के प्रभाव का दावा किया था। उन्होंने पीडीए के आधार पर 2027 में पार्टी की सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही।

इसके अलावा सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी, विधायक अतुल प्रधान, प्रदेश सचिव चौधरी दिनेश गुर्जर और अन्य स्थानीय नेताओं को गुर्जर बहुल क्षेत्रों में जनसंवाद और चौपालों की जिम्मेदारी दी गई है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पार्टी ने ऐसे क्षेत्रों में छोटी-छोटी चौपालों और बैठकों के जरिए संपर्क बढ़ाने की योजना बनाई है।

सपा की रणनीति में महिला और युवा नेतृत्व को भी सामाजिक संपर्क अभियान से जोड़ने की कोशिश दिखाई दे रही है। पार्टी की सांसद इकरा हसन समेत कई नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियों के लिए आगे किया गया है।

दादरी रैली से मिला राजनीतिक संकेत

गुर्जर समाज के बीच सपा की सक्रियता का एक प्रमुख उदाहरण मार्च 2026 में दादरी में आयोजित ‘समाजवादी समानता भाईचारा रैली’ रही। 29 मार्च को आयोजित इस कार्यक्रम में सपा प्रमुख अखिलेश यादव शामिल हुए थे। रैली को पश्चिमी यूपी में पार्टी के सामाजिक संपर्क अभियान से जोड़कर देखा गया।

राजनीतिक विश्लेषणों में इस रैली को गुर्जर समाज तक सपा की पहुंच बढ़ाने की रणनीति से भी जोड़ा गया। कुछ रिपोर्टों में दादरी के कार्यक्रम और सम्राट मिहिर भोज से जुड़े प्रतीकों के इस्तेमाल को गुर्जर समाज के साथ संवाद की कोशिश के तौर पर देखा गया है।

जाट-गुर्जर समीकरण भी महत्वपूर्ण

पश्चिमी यूपी की राजनीति में जाट और गुर्जर दोनों समुदायों की सामाजिक मौजूदगी कई विधानसभा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में सपा का गुर्जर समाज पर बढ़ता फोकस क्षेत्र के व्यापक सामाजिक समीकरणों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

हालांकि, किसी भी समुदाय के मतदाता एकसमान तरीके से मतदान करते हैं, ऐसा मानना सही नहीं होगा। स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दे, सरकार के कामकाज, संगठन की स्थिति और गठबंधन जैसे कई कारक चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए केवल जातीय संख्या के आधार पर चुनावी परिणाम का अनुमान लगाना उचित नहीं है।

भाजपा के मुकाबले सपा की चुनौती

पश्चिमी यूपी में गुर्जर समाज के बीच राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश सपा के लिए संगठनात्मक विस्तार का हिस्सा भी है। पार्टी ऐसे क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहती है, जहां उसके संगठन को अभी और मजबूत करने की जरूरत है।

वहीं, भाजपा और उसके सहयोगी दल भी पश्चिमी यूपी के सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपनी राजनीतिक गतिविधियां चला रहे हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले गुर्जर समाज के बीच विभिन्न दलों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है।

फिलहाल सपा की रणनीति का अगला चरण यह होगा कि गुर्जर बहुल क्षेत्रों में चलाए जा रहे चौपाल और जनसंवाद कार्यक्रमों को किस तरह बूथ स्तर के संगठन से जोड़ा जाता है। इसके साथ ही उम्मीदवारों के चयन, गठबंधन की स्थिति और स्थानीय मुद्दों पर पार्टी का रुख भी महत्वपूर्ण रहेगा।

कुल मिलाकर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से काफी पहले सामाजिक समीकरणों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं। सपा का गुर्जर समाज पर बढ़ता फोकस इसी व्यापक चुनावी तैयारी का हिस्सा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जनसंपर्क अभियान किस स्तर तक संगठनात्मक समर्थन में बदलता है और विभिन्न दल इस क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों को किस तरह साधते हैं।

You may have missed