फर्रुखाबाद में पॉक्सो मामले में दो दोषियों को चार-चार वर्ष की सजा, एक आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी

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रिपोर्ट: हर्ष वर्मा

फर्रुखाबाद: उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में वर्ष 2018 में दर्ज एक पॉक्सो (POCSO) मामले में विशेष न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) रितिका त्यागी की अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर दो आरोपियों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को चार-चार वर्ष के कठोर कारावास तथा 28-28 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है।

वहीं, तीसरे आरोपी को पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण बरी कर दिया गया। यह मामला एक नाबालिग से कथित छेड़छाड़ और धमकी से संबंधित था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्णय न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों के बयान और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर दिया गया है।

वर्ष 2018 में दर्ज हुआ था मामला

अभियोजन पक्ष के अनुसार, शहर कोतवाली क्षेत्र निवासी एक महिला ने वर्ष 2018 में अपनी नाबालिग पुत्री के साथ कथित छेड़छाड़ और धमकी दिए जाने की शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि 8 जुलाई 2018 को मोहल्ले के तीन व्यक्तियों पर नाबालिग के साथ अनुचित व्यवहार करने और विरोध करने पर धमकी देने का आरोप लगाया गया।

घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर विवेचना प्रारंभ की।

पुलिस ने जांच के बाद दाखिल किया आरोपपत्र

मामले की जांच के दौरान पुलिस ने शिकायतकर्ता, गवाहों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विवेचना पूरी की।

इसके बाद विवेचक ने तीनों आरोपियों के विरुद्ध संबंधित धाराओं तथा पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया।

इसके पश्चात मामला विशेष पॉक्सो न्यायालय में विचाराधीन रहा, जहां अभियोजन और बचाव पक्ष को अपने-अपने साक्ष्य और तर्क प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया।

अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर सुनाया फैसला

विशेष न्यायाधीश रितिका त्यागी की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलों, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया।

न्यायालय ने अपने निर्णय में दो आरोपियों को दोषी माना, जबकि तीसरे आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध न होने के कारण उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

यह निर्णय भारतीय न्याय प्रणाली के उस सिद्धांत को भी दर्शाता है जिसके अनुसार प्रत्येक आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक उसका अपराध न्यायालय में विधिक रूप से सिद्ध न हो जाए।

दोषियों को चार-चार वर्ष का कठोर कारावास

अदालत ने दोषी ठहराए गए दोनों आरोपियों को चार-चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त प्रत्येक पर 28 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि यदि दोषी निर्धारित जुर्माना जमा नहीं करते हैं, तो उन्हें दो माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

फैसला सुनाए जाने के बाद दोनों दोषियों को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया।

पॉक्सो अधिनियम का उद्देश्य

पॉक्सो (Protection of Children from Sexual Offences) Act, 2012 बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया विशेष कानून है।

इस कानून के तहत बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय गठित किए जाते हैं ताकि मामलों का निस्तारण संवेदनशील और समयबद्ध तरीके से किया जा सके।

साथ ही, पीड़ित की पहचान और निजता की सुरक्षा भी कानून का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी कारण ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग में पीड़ित की पहचान उजागर नहीं की जाती।

साक्ष्य का महत्व

भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी भी आपराधिक मामले का निर्णय साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर किया जाता है। यदि किसी आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं होते, तो न्यायालय उसे दोषमुक्त कर सकता है।

वर्तमान मामले में भी अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का अलग-अलग मूल्यांकन करते हुए दो आरोपियों को दोषी ठहराया, जबकि तीसरे आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।

न्यायिक प्रक्रिया का महत्व

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, वैज्ञानिक साक्ष्य, गवाहों के विश्वसनीय बयान और समयबद्ध सुनवाई न्याय सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

इसके साथ ही, न्यायालय का प्रत्येक निर्णय कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होता है। इसलिए किसी भी मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत के निर्णय से ही तय होता है।

समाज में जागरूकता भी आवश्यक

बच्चों की सुरक्षा केवल कानून के माध्यम से ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता के माध्यम से भी सुनिश्चित की जा सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को बच्चों को उनके अधिकारों, व्यक्तिगत सुरक्षा और किसी भी अनुचित व्यवहार की जानकारी तुरंत विश्वसनीय वयस्क या संबंधित प्राधिकारी को देने के लिए जागरूक करना चाहिए।

साथ ही, बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

फर्रुखाबाद के वर्ष 2018 के पॉक्सो मामले में विशेष न्यायालय द्वारा दिया गया यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर दो आरोपियों को चार-चार वर्ष के कठोर कारावास एवं जुर्माने की सजा सुनाई, जबकि तीसरे आरोपी को पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण बरी कर दिया।

यह निर्णय इस सिद्धांत को भी रेखांकित करता है कि न्यायालय प्रत्येक मामले का फैसला केवल कानून, साक्ष्यों और निष्पक्ष सुनवाई के आधार पर करता है।

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