इलाहाबाद हाईकोर्ट में गूंजा ‘बुलंदशहर मॉडल’, फोरेंसिक ट्रेनिंग को पूरे यूपी में लागू करने के निर्देश
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में आपराधिक न्याय व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में बुलंदशहर की एक पहल को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे प्रदेश के लिए उदाहरण के तौर पर देखा है। कोर्ट के सामने बुलंदशहर पुलिस और न्यायपालिका के बीच समन्वय से शुरू किए गए फोरेंसिक प्रशिक्षण कार्यक्रम का उल्लेख हुआ। इसके साथ ही अदालत ने वैज्ञानिक साक्ष्यों की समझ और उनके प्रभावी इस्तेमाल को मजबूत करने के लिए प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसी तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
हाईकोर्ट के आदेश में बुलंदशहर में जिला न्यायपालिका और पुलिस के बीच समन्वय से आयोजित फोरेंसिक साइंस संबंधी कार्यशाला का उल्लेख किया गया है। आदेश के पैरा नंबर 13 में इस पहल को प्रदेश के अन्य जिलों के लिए मॉडल के रूप में देखा गया है। वहीं, पैरा नंबर 14 में इस प्रयास के लिए संबंधित अधिकारियों की सराहना की गई है।
17 सितंबर को आयोजित हुई फोरेंसिक कार्यशाला
बुलंदशहर में जिला जज संजय कुमार सिंह और SSP दिनेश कुमार सिंह की पहल पर 17 सितंबर 2026 को फोरेंसिक साइंस विषय पर ‘कौशल संवर्धन’ कार्यशाला आयोजित की गई थी। इस कार्यक्रम में पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को वैज्ञानिक साक्ष्यों से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी देने पर जोर रहा।
इस कार्यशाला के आयोजन में यूपी फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के निदेशक के स्तर पर भी समन्वय किया गया। इसका उद्देश्य जांच और न्यायिक प्रक्रिया में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका को बेहतर तरीके से समझना और उनके उपयोग को अधिक प्रभावी बनाना था।
दरअसल, आधुनिक आपराधिक जांच में फोरेंसिक साक्ष्य की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में जांच अधिकारियों के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों के लिए भी वैज्ञानिक साक्ष्यों की प्रकृति, उनकी उपयोगिता और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में समझने की क्षमता महत्वपूर्ण मानी जाती है।
हाईकोर्ट ने की बुलंदशहर पहल की सराहना
हाईकोर्ट ने अपने आदेश के पैरा नंबर 13 में बुलंदशहर की इस संयुक्त पहल को विशेष रूप से रेखांकित किया। अदालत के अनुसार, पुलिस और न्यायपालिका के बीच इस प्रकार का समन्वय आपराधिक न्याय प्रणाली को मजबूत करने में उपयोगी हो सकता है।
इसके बाद पैरा नंबर 14 में अदालत ने इस योगदान के लिए बुलंदशहर के जिला जज और SSP को विशेष प्रशंसा का पात्र बताया। कोर्ट की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसमें एक स्थानीय स्तर पर शुरू की गई पहल को व्यापक स्तर पर लागू करने की संभावना को रेखांकित किया गया है।
इस पहल का मुख्य केंद्र वैज्ञानिक साक्ष्य हैं। यानी जांच प्रक्रिया में उपलब्ध फोरेंसिक जानकारी को बेहतर ढंग से समझना, उसका उचित दस्तावेजीकरण करना और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उसकी प्रासंगिकता को समझना।
सभी जिलों में फोरेंसिक ट्रेनिंग पर जोर
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और विधि विभाग को निर्देशित किया है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों से जुड़े विषयों पर नियमित रूप से ऐसे फोरेंसिक वर्कशॉप आयोजित किए जाएं। इसका उद्देश्य पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के बीच वैज्ञानिक जांच से संबंधित समझ को मजबूत करना है।
इसके लिए प्रमुख सचिव विधि और उत्तर प्रदेश के DGP को बुलंदशहर की तर्ज पर प्रदेश के सभी जिलों में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत जिला जजों को अपने-अपने जिलों में ऐसे फोरेंसिक ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित करने के लिए आवश्यक निर्देश दिए जाने की बात कही गई है।
इस तरह बुलंदशहर में आयोजित एक कार्यशाला अब प्रदेश स्तर पर प्रशिक्षण व्यवस्था का आधार बन सकती है।
वैज्ञानिक साक्ष्यों की समझ क्यों जरूरी?
आपराधिक मामलों की जांच में घटनास्थल से मिलने वाले भौतिक और डिजिटल साक्ष्यों का महत्व बढ़ा है। ऐसे में केवल पारंपरिक जांच प्रक्रियाओं के साथ-साथ वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी भी जांच अधिकारियों के लिए जरूरी होती जा रही है।
फोरेंसिक साइंस के माध्यम से घटनास्थल से प्राप्त साक्ष्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के भौतिक, जैविक, डिजिटल और अन्य तकनीकी साक्ष्य शामिल हो सकते हैं। इन साक्ष्यों की सही पहचान, सुरक्षित रख-रखाव और जांच प्रक्रिया में उचित इस्तेमाल महत्वपूर्ण होता है।
इसी वजह से प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। इससे वैज्ञानिक साक्ष्यों की समझ एक समान स्तर पर विकसित करने में मदद मिल सकती है।
‘बुलंदशहर मॉडल’ से क्या बदलेगा?
बुलंदशहर की पहल की खास बात पुलिस और न्यायपालिका के बीच समन्वय है। सामान्य तौर पर जांच और न्यायिक प्रक्रिया अलग-अलग स्तरों पर आगे बढ़ती है, लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्यों को लेकर साझा प्रशिक्षण दोनों पक्षों के बीच बेहतर समझ विकसित कर सकता है।
अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद यदि प्रदेश के सभी जिलों में नियमित फोरेंसिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो पुलिस अधिकारियों, जांच अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों को वैज्ञानिक साक्ष्यों से जुड़े विषयों पर प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।
हालांकि, इन कार्यक्रमों की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशिक्षण कितनी नियमितता से आयोजित होते हैं और उनमें व्यावहारिक पहलुओं को किस तरह शामिल किया जाता है। इसके बावजूद हाईकोर्ट द्वारा बुलंदशहर की पहल को प्रदेश स्तर पर अपनाने की दिशा में निर्देश देना इसे व्यापक प्रशासनिक और न्यायिक संदर्भ प्रदान करता है।
पूरे प्रदेश में लागू करने की तैयारी
इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद अब निगाहें प्रमुख सचिव विधि और DGP स्तर से जारी होने वाले निर्देशों पर रहेंगी। इन निर्देशों के माध्यम से प्रदेश के जिला जजों और संबंधित पुलिस अधिकारियों को फोरेंसिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी।
कुल मिलाकर, बुलंदशहर में पुलिस और न्यायपालिका के समन्वय से आयोजित ‘कौशल संवर्धन’ कार्यशाला को हाईकोर्ट ने एक ऐसी पहल के रूप में देखा है, जिसे अन्य जिलों में भी अपनाया जा सकता है। इससे उत्तर प्रदेश में वैज्ञानिक साक्ष्यों को लेकर प्रशिक्षण, समन्वय और समझ को संस्थागत रूप देने की दिशा में कदम बढ़ सकता है।

