मुख्तार के रिश्तेदारों की संपत्ति क्यों रिलीज हुई? क्या कमजोर है यूपी का गैंगस्टर एक्ट

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Digital UP News Desk

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध और गैंगस्टर गतिविधियों पर कार्रवाई के लिए बनाए गए गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 को लेकर हाल के दो न्यायिक फैसलों ने गंभीर कानूनी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्तार अंसारी के रिश्तेदार मंसूर अंसारी की संपत्ति की कुर्की को रद्द करते हुए उसे रिलीज करने का आदेश दिया, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2026 में यूपी गैंगस्टर एक्ट को ‘स्टिलबॉर्न’ यानी ऐसा कानून बताया जो स्वतंत्र रूप से कोई अपराध परिभाषित नहीं करता।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अर्थ यह नहीं है कि राज्य में गैंगस्टर के खिलाफ सभी कार्रवाई स्वतः समाप्त हो गई है। अदालत ने मुख्य रूप से कानून की उस संरचना पर सवाल उठाया, जिसमें पहले से दूसरे कानूनों के तहत अपराध माने जाने वाले कृत्यों के आधार पर किसी व्यक्ति को ‘गैंगस्टर’ घोषित कर उसके खिलाफ विशेष कानून के तहत कार्रवाई की जाती है।

मुख्तार के रिश्तेदार की संपत्ति क्यों हुई रिलीज?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने मंसूर अंसारी से जुड़ा मामला आया। वह मुख्तार अंसारी का रिश्तेदार है। गाजीपुर में उसकी संपत्ति को गैंगस्टर एक्ट की धारा 14 के तहत कुर्क किया गया था।

हाईकोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण बात कही कि केवल किसी व्यक्ति का किसी कथित गैंगस्टर का रिश्तेदार होना उसकी संपत्ति कुर्क करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। राज्य को यह दिखाना होगा कि जिस संपत्ति पर कार्रवाई की जा रही है, उसका संबंध उस अपराध से है जिसके आधार पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है।

अदालत ने यह भी माना कि संबंधित अधिकारी को संपत्ति के बारे में ‘reason to believe’ यानी ऐसा उचित आधार दर्ज करना जरूरी है कि संपत्ति अपराध से अर्जित की गई है। केवल आरोप या रिश्तेदारी के आधार पर संपत्ति को कुर्क नहीं किया जा सकता।

मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य संपत्ति और कथित अपराध के बीच जरूरी संबंध स्थापित करने में विफल रहा। इसके बाद अदालत ने निचली अदालत के आदेश और जिलाधिकारी की कुर्की कार्रवाई को रद्द करते हुए संपत्ति रिलीज करने का निर्देश दिया।

संपत्ति कुर्क करने का अधिकार सरकार को है, लेकिन…

गैंगस्टर एक्ट का उद्देश्य अपराध से अर्जित संपत्ति पर कार्रवाई करना भी है। इसके तहत जिलाधिकारी को कुछ परिस्थितियों में संपत्ति कुर्क करने की शक्ति मिलती है। लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है।

यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। कानून में प्रशासनिक कार्रवाई के साथ न्यायिक समीक्षा का रास्ता भी मौजूद है। इसलिए यदि राज्य यह साबित नहीं कर पाता कि संपत्ति अपराध से अर्जित हुई है, तो अदालत कुर्की आदेश को रद्द कर सकती है।

दूसरे शब्दों में, गैंगस्टर एक्ट सरकार को कार्रवाई का अधिकार जरूर देता है, लेकिन संपत्ति के मालिक के मौलिक और वैधानिक अधिकारों की अनदेखी करने की छूट नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट ने एक्ट को ‘स्टिलबॉर्न’ क्यों कहा?

20 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने Shiv Pratap Singh alias Chinu vs State of Uttar Pradesh मामले में यूपी गैंगस्टर एक्ट की संरचना पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यह कानून अपने भीतर कोई स्वतंत्र आपराधिक कृत्य यानी distinct offence नहीं बनाता।

कानून में ‘गैंग’ और ‘गैंगस्टर’ जैसी परिभाषाएं दी गई हैं और धारा 3 में सजा का प्रावधान है। लेकिन जिन गतिविधियों का उल्लेख गैंगस्टर की पहचान के लिए किया गया है, उनमें से कई पहले से ही सामान्य आपराधिक कानून के तहत अपराध हैं।

सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति यह थी कि केवल किसी व्यक्ति को प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत तैयार गैंग चार्ट में ‘गैंगस्टर’ बताए जाने से उसे उस विशेष कानून के तहत दंडित करने की स्थिति नहीं बननी चाहिए। अदालत ने इसी कानूनी कमी के संदर्भ में कानून को ‘stillborn’ कहा।

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंगस्टर एक्ट की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया। यानी अदालत का फैसला मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित था कि कानून स्वयं कोई स्वतंत्र अपराध बनाता है या नहीं।

क्या इसका मतलब यूपी का गैंगस्टर एक्ट पूरी तरह खत्म हो गया?

ऐसा कहना सही नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का वास्तविक प्रभाव समझने के लिए कानून की संरचना और उसके इस्तेमाल के तरीके को अलग-अलग देखना होगा।

एक तरफ संगठित अपराध के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जरूरत है। दूसरी तरफ किसी व्यक्ति को केवल प्रशासनिक वर्गीकरण के आधार पर विशेष दंडात्मक कानून के दायरे में लाना न्यायिक कसौटी पर चुनौती पैदा कर सकता है।

यही वजह है कि अब सरकार के सामने कानून में स्पष्टता लाने की चुनौती है। यदि यूपी सरकार इस कानून को भविष्य में मजबूत बनाना चाहती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून में संगठित अपराध की स्वतंत्र और स्पष्ट परिभाषा हो तथा उसके लिए अलग अपराध और सजा का प्रावधान हो।

महाराष्ट्र के MCOCA से क्या सीख सकती है यूपी सरकार?

इस मामले में महाराष्ट्र का MCOCA यानी Maharashtra Control of Organised Crime Act, 1999 अक्सर उदाहरण के रूप में सामने आता है।

MCOCA में ‘organised crime’ और ‘organised crime syndicate’ की विस्तृत अवधारणा दी गई है। कानून की धारा 3 संगठित अपराध के लिए स्पष्ट दंड निर्धारित करती है। इसके अलावा कानून में साजिश, प्रयास, सहायता, गैंग के सदस्य होने तथा संगठित अपराध से जुड़ी संपत्ति के संबंध में भी अलग-अलग प्रावधान हैं।

यानी MCOCA का ढांचा केवल किसी व्यक्ति को ‘गैंगस्टर’ घोषित करने पर आधारित नहीं है। उसमें संगठित अपराध को एक अलग कानूनी श्रेणी के रूप में स्थापित किया गया है।

यूपी सरकार के लिए यही सबसे बड़ा सबक हो सकता है।

सरकार कानून में क्या बदलाव कर सकती है?

सबसे पहले, यूपी गैंगस्टर एक्ट में स्वतंत्र अपराध की स्पष्ट परिभाषा जोड़ी जा सकती है। इसमें यह स्पष्ट किया जा सकता है कि कौन-सी परिस्थितियों में लगातार आपराधिक गतिविधियों को संगठित अपराध माना जाएगा।

दूसरा, ‘गैंग चार्ट’ तैयार करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है। इसमें किसी व्यक्ति को गैंगस्टर घोषित करने से पहले पर्याप्त सामग्री, आपराधिक इतिहास और कथित संगठित गतिविधि के बीच संबंध को स्पष्ट करना जरूरी हो सकता है।

तीसरा, संपत्ति कुर्की के मामले में मनी ट्रेल और अपराध से संपत्ति के संबंध को साबित करने की व्यवस्था और मजबूत की जा सकती है। इससे निर्दोष रिश्तेदारों या ऐसे लोगों की संपत्ति पर कार्रवाई का जोखिम कम होगा, जिनका अपराध से सीधा संबंध नहीं है।

चौथा, संपत्ति कुर्क करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के आदेश में कारण दर्ज करने की बाध्यता को अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। इससे अदालत में कार्रवाई का कानूनी आधार भी मजबूत होगा।

पांचवां, कानून में आरोपी के अधिकारों और राज्य की कार्रवाई के बीच संतुलन बनाया जाना जरूरी है। संगठित अपराध से लड़ने के लिए कठोर कानून जरूरी हो सकता है, लेकिन उसके साथ न्यायिक निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

गुजरात का उदाहरण भी महत्वपूर्ण

गुजरात का कानून भी इस बहस में उपयोगी उदाहरण है। वहां संगठित अपराध से निपटने के लिए गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम कानून बनाया गया था। 2026 में गुजरात विधानसभा ने कानून में संशोधन करते हुए आतंकवाद से जुड़े प्रावधानों को हटाने का फैसला किया, क्योंकि BNS में आतंकवादी कृत्यों के लिए अलग प्रावधान मौजूद हैं। इसका उद्देश्य कानूनों के बीच दोहराव को कम करना बताया गया।

यह उदाहरण दिखाता है कि बदलती आपराधिक कानून व्यवस्था के साथ राज्य के विशेष कानूनों में भी समय-समय पर संशोधन और स्पष्टता जरूरी होती है।

आगे की राह क्या है?

मुख्तार अंसारी के रिश्तेदार की संपत्ति रिलीज होने का मामला केवल एक परिवार या एक संपत्ति तक सीमित कानूनी विवाद नहीं है। यह सवाल उठाता है कि राज्य की शक्तियों और नागरिकों के संपत्ति अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

वहीं सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने कानून की बुनियादी संरचना पर बहस को और तेज कर दिया है। सरकार के सामने अब चुनौती यह है कि वह संगठित अपराध के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की शक्ति बनाए रखते हुए कानून को संवैधानिक और कानूनी कसौटियों के अनुरूप अधिक स्पष्ट बनाए।

इसलिए भविष्य में यदि यूपी सरकार गैंगस्टर एक्ट में संशोधन करती है, तो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यही हो सकता है कि ‘गैंगस्टर की पहचान’ के बजाय ‘संगठित अपराध’ को स्पष्ट रूप से अपराध के रूप में परिभाषित किया जाए। साथ ही संपत्ति कुर्की के लिए अपराध और संपत्ति के बीच ठोस संबंध साबित करने की प्रक्रिया को भी मजबूत करना होगा।

कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का संपत्ति रिलीज करने वाला फैसला और सुप्रीम कोर्ट की ‘स्टिलबॉर्न’ वाली टिप्पणी दोनों मिलकर यूपी के गैंगस्टर कानून की कार्यप्रणाली पर एक बड़ी कानूनी बहस की शुरुआत करते हैं। आने वाले समय में इस बहस का केंद्र यही रहेगा कि अपराधियों पर कठोर कार्रवाई भी हो और निर्दोष लोगों के अधिकार भी सुरक्षित रहें।

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