मुंबई में PMO का फर्जी अधिकारी बनकर घुसने की कोशिश, ChatGPT से दस्तावेज बनाने का आरोप
Digital UP News Desk
मुंबई: मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) स्थित जियो वर्ल्ड प्लाजा में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से जुड़े अधिकारी के तौर पर प्रवेश करने की कथित कोशिश के मामले में पुलिस जांच जारी है। इस मामले में 24 वर्षीय रोहन पारिख और उसके निजी सुरक्षा गार्ड दिलीप कुंडे को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के मुताबिक, रोहन पारिख ने कथित तौर पर अपनी पहचान प्रभावशाली दिखाने और लोगों पर प्रभाव डालने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल ChatGPT की मदद से PMO से संबंधित फर्जी दस्तावेज तैयार किए थे।
पुलिस की जांच में उसके घर से लैपटॉप, हार्ड ड्राइव और PMO से जुड़े कथित दस्तावेज बरामद होने की बात सामने आई है। इसके अलावा, उसके मोबाइल फोन से मिले Google Takeout डेटा में PMO से संबंधित पत्राचार तैयार करने से जुड़ी सर्च हिस्ट्री मिलने का भी दावा किया गया है। हालांकि, इन दस्तावेजों का इस्तेमाल केवल जियो वर्ल्ड प्लाजा में प्रवेश के लिए किया गया था या इसके पीछे कोई अन्य उद्देश्य भी था, इसकी जांच अभी जारी है।
प्रधानमंत्री के संभावित दौरे से पहले हुई गिरफ्तारी
पुलिस के अनुसार, रोहन पारिख और उसके साथ निजी सुरक्षा गार्ड के रूप में मौजूद दिलीप कुंडे को 7 सितंबर को BKC स्थित जियो वर्ल्ड प्लाजा में प्रवेश करने की कथित कोशिश के दौरान पकड़ा गया। यह कार्रवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित दौरे से एक दिन पहले हुई थी।
बताया गया है कि दोनों ने परिसर में प्रवेश के दौरान खुद को PMO से जुड़ा हुआ बताया था। रोहन पारिख ने सुरक्षा कर्मियों को अपने मोबाइल फोन पर PMO का कथित पहचान पत्र भी दिखाया था। इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कर्मचारियों को संदेह हुआ और मामले की जानकारी पुलिस को दी गई।
इस दौरान उनके साथ मौजूद तीसरा व्यक्ति प्रथमेश बागुल कथित तौर पर मौके से निकल गया। पुलिस के अनुसार, वह अभी वांछित है और उसकी तलाश की जा रही है।
ChatGPT से फर्जी दस्तावेज बनाने का आरोप
मामले की जांच कर रही क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट (CIU) के अनुसार, रोहन पारिख ने पूछताछ के दौरान कथित तौर पर स्वीकार किया कि उसने PMO से संबंधित दस्तावेज तैयार करने के लिए ChatGPT का इस्तेमाल किया था। हालांकि, पुलिस की जांच अभी यह निर्धारित करने में जुटी है कि तैयार किए गए दस्तावेजों की प्रकृति क्या थी और उनका इस्तेमाल किन-किन उद्देश्यों के लिए किया गया।
पुलिस ने 8 सितंबर को खार स्थित पारिख के घर की तलाशी ली थी। इस दौरान एक लैपटॉप और हार्ड ड्राइव जब्त किए गए। इसके अलावा PMO से जुड़े बताए जा रहे कुछ दस्तावेज भी बरामद किए गए हैं।
जांच एजेंसी अब इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फोरेंसिक जांच कराने की तैयारी में है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि पारिख ने कथित तौर पर कितने दस्तावेज तैयार किए, उन्हें किसके साथ साझा किया और क्या उनका इस्तेमाल किसी अन्य स्थान या गतिविधि में भी किया गया था।
मोबाइल से मिली सर्च हिस्ट्री की जांच
पुलिस ने बताया कि पारिख के Redmi 5G मोबाइल फोन से Google Takeout डेटा हासिल किया गया। जांच में कथित तौर पर PMO से संबंधित पत्राचार तैयार करने और दस्तावेजों से जुड़ी जानकारी खोजने की सर्च हिस्ट्री सामने आई।
हालांकि, केवल सर्च हिस्ट्री के आधार पर किसी दस्तावेज के वास्तविक इस्तेमाल या किसी व्यापक उद्देश्य का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसलिए पुलिस इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की विस्तृत जांच कर रही है।
जांचकर्ताओं का मुख्य फोकस यह पता लगाने पर है कि कथित फर्जी पहचान और दस्तावेजों का इस्तेमाल केवल सुरक्षा व्यवस्था को पार करने के प्रयास तक सीमित था या इसके पीछे कोई और मकसद था।
प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड की भूमिका भी जांच के घेरे में
इस मामले में रोहन पारिख के साथ गिरफ्तार किए गए दिलीप कुंडे की भूमिका भी पुलिस जांच का हिस्सा है। पुलिस के मुताबिक, कुंडे पूर्व सैन्यकर्मी है और निजी सुरक्षा गार्ड के तौर पर पारिख के साथ मौजूद था।
जांच एजेंसी ने अदालत को बताया कि कुंडे ने पूछताछ के दौरान कथित तौर पर कहा कि उसने हथियार निजी इस्तेमाल के लिए हासिल किया था। पुलिस का आरोप है कि पारिख को बॉडीगार्ड के तौर पर सुरक्षा प्रदान करते समय वह हथियार व्यावसायिक काम में भी इस्तेमाल कर रहा था।
अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कुंडे के पास मौजूद हथियार वैध था या नहीं और उसे रखने तथा इस्तेमाल करने के लिए उसके पास आवश्यक अनुमति थी या नहीं।
इसी कारण पुलिस ने हथियार की जांच के लिए भी समय मांगा है। मामले में हथियार से जुड़े दस्तावेजों और उसके लाइसेंस या अनुमति की स्थिति की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।
पुलिस कस्टडी के बाद न्यायिक हिरासत
मामले में दोनों आरोपियों को शुरुआती तौर पर पुलिस कस्टडी में भेजा गया था। पुलिस कस्टडी की अवधि 11 सितंबर तक थी। इसके बाद CIU ने आरोपियों की आगे की पुलिस कस्टडी की मांग नहीं की।
जांच एजेंसी ने अदालत से कहा कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच और कथित हथियार से संबंधित पड़ताल के लिए समय चाहिए। इसके बाद 37वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट डीएस खेडेकर ने रोहन पारिख और दिलीप कुंडे को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
वहीं, बचाव पक्ष के वकील सतीश मानेशिंदे ने दोनों आरोपियों की ओर से जमानत के लिए आवेदन दाखिल किए हैं। अदालत ने पुलिस को जमानत अर्जियों पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर 2026 को होनी है।
पुलिस के सामने अब ये बड़े सवाल
जांच के दौरान पुलिस के सामने कई अहम सवाल हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि कथित फर्जी PMO पहचान पत्र और दस्तावेज क्यों बनाए गए थे। दूसरा, इन दस्तावेजों का इस्तेमाल केवल जियो वर्ल्ड प्लाजा में प्रवेश के प्रयास के दौरान किया गया या पहले भी कहीं किया गया था।
इसके अलावा, पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या पारिख ने किसी अन्य व्यक्ति को PMO अधिकारी के तौर पर प्रभावित करने के लिए इन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच से इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है।
साथ ही, फरार बताए जा रहे प्रथमेश बागुल की भूमिका भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुलिस यह जानना चाहती है कि वह दोनों आरोपियों के साथ क्यों मौजूद था और घटना में उसकी क्या भूमिका थी।
AI के गलत इस्तेमाल पर भी उठे सवाल
इस मामले ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स के इस्तेमाल को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। ChatGPT जैसे AI टूल सामान्य तौर पर जानकारी जुटाने, लेखन, अध्ययन और उत्पादकता जैसे वैध कार्यों में मदद कर सकते हैं। हालांकि, किसी सरकारी संस्था की पहचान का गलत प्रतिनिधित्व करने या फर्जी दस्तावेज तैयार करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल गंभीर कानूनी सवाल खड़े कर सकता है।
इसलिए किसी भी AI टूल का इस्तेमाल करते समय कानून और नैतिक सीमाओं का ध्यान रखना जरूरी है। खासकर सरकारी संस्थाओं, सुरक्षा एजेंसियों या संवेदनशील प्रतिष्ठानों से जुड़े दस्तावेजों और पहचान का दुरुपयोग गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
जांच पूरी होने के बाद स्पष्ट होगी तस्वीर
फिलहाल पुलिस की जांच इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, कथित दस्तावेजों, पहचान पत्र और हथियार से जुड़े पहलुओं पर केंद्रित है। आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
17 सितंबर को होने वाली सुनवाई में पुलिस की ओर से दाखिल जवाब के बाद मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट हो सकती है। वहीं, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फोरेंसिक जांच से यह पता चलने की संभावना है कि कथित फर्जी दस्तावेजों को तैयार करने और इस्तेमाल करने का दायरा कितना था।
यह मामला यह भी दिखाता है कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल जितना आसान हुआ है, उतनी ही जिम्मेदारी के साथ उसके उपयोग की जरूरत भी बढ़ गई है। जांच एजेंसियों के लिए अब यह पता लगाना अहम है कि कथित फर्जी पहचान के पीछे केवल व्यक्तिगत प्रभाव जमाने की कोशिश थी या इसके पीछे कोई व्यापक उद्देश्य भी था।

